श्रीमदभगवतगीता में कर्मयोग संबंध में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के सुविचार
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
9822550220
कैंसर रोगों से पीडित राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज (1909- 1968) एक क्रांतिकारी, प्रगतिशील और मानवतावादी संत हुए हैं. जिन्होंने अध्यात्म को समाज सेवा और ग्राम विकास से जोड़ागया है । श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति उनके विचार पारंपरिक व्याख्याओं से भिन्न और व्यावहारिक थे।
संत तुकडोजी महाराज के गीता पर विचार मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं में देखे जा सकते हैं. उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता में
कर्मयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है.राष्ट्रीय संत तुकडोजी महाराज ने गीता के “कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेशु कर्मणा:”यानी (कर्म करो, फल की चिंता मत करो) संदेश के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने गीता के ज्ञान को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर उसे दैनिक जीवन और कर्म करने पर जोर दिया। उन्होंने कर्मकांड और समाज मे फैल रहा अंधविश्वास का सख्त विरोध किया है. राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज ने गीता की व्याख्या करते हुए ईश्वर को केवल मंदिरों में खोजने के बजाय, उसे निर्जीव मूर्तियों से अलग, जीवित ईश्वर (मानव सेवा) के रूप में देखने की शिक्षा दी है। तत्संबंध मे उन्होंने’ग्रामगीता’ की रचना की थी. और उन्होंने गीता के दार्शनिक ज्ञान को आम ग्रामीणों की समझ से दूर माना है। इसलिए, उन्होंने भगवद्गीता के सिद्धांतों को सरल हिंदी/मराठी भाषा में, ग्राम्य जीवन के संदर्भ में प्रस्तुत करने के लिए ‘ग्रामगीता’ की रचना की। ग्रामगीता को उन्होंने भारत के किसान और ग्रामीणों को समर्पित किया हैं।राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज ने
मानव कल्याण ही सच्ची भक्ति बताया है. तूकडोजी महाराज का मानना था कि दुखी, गरीब और वंचित वर्ग की सेवा ही गीता का वास्तविक सार है। उन्होंने जाति व्यवस्था और छुआछूत का कड़ा विरोध किया और समतामूलक समाज की स्थापना को ही सच्ची गीता भक्ति बताया है।
सामूहिक कर्म के संबंध मे बताया है की भगवत गीता के ज्ञान को व्यक्तिगत मोक्ष के बजाय सामाजिक उन्नति के लिए इस्तेमाल करने का आह्वान किया है। उनके ‘गुरुदेव सेवा मंडल’ के माध्यम से उन्होंने सामूहिक प्रार्थना और सामूहिक श्रम (स्वच्छता, विकास) को गीता की निष्काम कर्मयोग साधना माना है।
राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता को ‘स्व’ से उठाकर ‘समष्टि’ (समाज) के कल्याण के लिए एक सक्रिय दर्शन के रूप में व्याख्यायित किया। उनके लिए गीता जीवन जीने की एक पद्धति थी, न कि केवल एक ग्रंथ है.
नतीजतन कुछ लोग राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज के नाम पर नागरिक जनता-जनार्दन से चंदा के रुप मे धन उगाही करके अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे है.इस संबंध मे विद्धान विशेषज्ञों की माने तो जनता-जनार्दन से राष्ट्र संत तुकडो जी महाराज के नाम पर उघाये गये रुपया-धन को कैंसर पीडितों के रोग निदान और स्वास्थ्य उपचार मे लगाना चाहिए.ताकि तुकडोजी महाराज की आत्मा को शांति प्राप्त हो सकती है. अन्यथा उघाहीखोरों की संताने संस्कार हीन होकर समाज मे वर्णशंकता (हाईब्रीड) मिलावटी संतान उत्पन्न होने का खतरा बन सकता है.
इससे बेहतर होगा कि राष्ट्र संत तूकडोजी महाराज की आड मे एकत्रित किया गया रुपए धन को पचा पाना बडा ही मुश्किल हो सकता है.उसके अनेक जीवित उदाहरण देखने और सुनने को मिले है.उपरोक्त धन और रुपए के बदले मे शरीर में कैंसर और हाथ-पैर मे गैगरीन इन्फेक्शन जैसी असाध्य बीमारियां घर कर सकती है. चुंकि नागरिक जनता-जनार्दन को ही पंच्च परमेश्वर का दर्जा प्राप्त है.
कैंसर रोग संबंध मे संत तुकडो के विचार
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज को अपने जीवन के अंतिम दिनों में स्वयं कैंसर जैसी भयानक और दुखद बीमारी का सामना करना पडा था। इस कष्टकारी अनुभव और उनके विचारों के संबंध में निम्नलिखित बातें महत्वपूर्ण हैं.
बीमारी में भी सेवा और कर्म के संबंध में कैंसर के अंतिम चरण में भी, तुकडोजी महाराज जी ने रुग्णशय्या (बिस्तर) से भी जनसेवा और कर्मयोग का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर नाशवान है, लेकिन कर्म अमर है।
असहनीय कष्ट और धैर्य की आवश्यकता के संबंध में उन्होंने असहनीय दर्द को ईश्वर की इच्छा मानकर सहन किया और अपने अनुयायियों को धैर्य, प्रसन्नता और समाज कल्याण के लिए कार्य करते रहने की प्रेरणा दी।
प्रारब्ध पर विश्वास भी एक भजन मार्ग के अनुसार, ऐसी भयंकर बीमारियां अक्सर पूर्व जन्म के प्रारब्ध (कर्मों) का फल होती हैं, जिसे भोगना पड़ता है। लेकिन वे इसे धैर्य से सहने की सीख देते थे।
सामाजिक स्वास्थ्य का दृष्टिकोण के बारे मे ग्रामगीता में उन्होंने सामुदायिक स्वास्थ्य और स्वच्छता पर बहुत जोर दिया है। उनका मानना था कि अज्ञानता और अस्वच्छता ही रोगों की जड़ है। कैंसर रोग नियंत्रण की दृष्टी से
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज कैंसर अस्पताल की स्थापना करना उनके मानवतावादी दृष्टिकोण और कैंसर जैसी बीमारी के दर्द को समझने के कारण ही, नागपुर में “राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज रीजनल कैंसर हॉस्पिटल” की स्थापना की गई, जो आज भी गरीबों और जरूरतमंदों को कम खर्च में कैंसर का इलाज प्रदान करता है। इसलिए जनता-जनार्दन से संकलित चंदा अनुदान स्वरुप रुपए धन को कैंसर पीडितों की सेवा मे अर्पण समर्पण करना चाहिए.
तुकडोजी महाराज ने कैंसर जैसे भयंकर रोग को भी अपने आध्यात्मिक धैर्य से स्वीकार किया और मृत्यु के क्षण तक “जनसेवा ही ईश्वर सेवा” का संदेश दिया। उनके विचार, उनके भजनों और ग्रामगीता के माध्यम से समाज को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने की प्रेरणा देते हैं।
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