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कोयले से बनेगा LPG, पेट्रोल-डीजल? प्रॉसेस से रसोई और वाहनों को फायदा

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कोयले से बनेगा LPG, पेट्रोल-डीजल? प्रॉसेस से रसोई और वाहनों फायदा

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टेकचंद्र शास्त्री:

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नई दिल्ली। देश में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी संकट की आहट सुनाई दे रही है. होर्मुज संकट का असर भारत में भी दिख रहा है. ऐसे में सरकार अब ईंधन के लिए वैकल्पिक रास्ता चुन रही है. वैज्ञानिक अनुसंधान के मुताबिक खनिज कोयला मे एक जीवाश्म ईंधन की मात्रा पाई गई है.जो मुख्य रुप से कार्बन के अलावा कई अन्य तत्व पाए जाते हैं.कोयले मे सबसे प्रमुख तत्व 50%से 95%तक हाईड्रोजन जैसे दहनशील तत्व मौजूद है.कोयले मे आक्सीजन भी मौजूद है. वैज्ञानिक अनुसंधान के मुताबिक कोयला में सल्फर गंधक अशूद्धता के रुप मे उपलब्ध है.कोया में सिलिकान एल्युमीनियम लोहा कैल्शियम मैग्नीशियम पोटेशियम और टाइटेनियम जैसे खनिज सूक्ष्म तत्व भी मौजूद पाये जाते है.दरअसल मे कोयले की गुणवत्तामे लिग्नाइट, बिटुमिनस या एन्थ्रेसाइट मे इन्ही तत्वों विशेष रुप स्कार्फ़ की मात्रा के अधार पर अंतर होता है.परिणामत:

अब कोयला से गैस और पेट्रोल-डीजल बनेगा. जी हां, सरकार 37,500 करोड़ की योजना से कोयले से गैस, पेट्रोल और डीज़ल बनाने के प्लांट लगाएगी. BHEL की नई तकनीक से भारतीय कोयले पर ये प्रोजेक्ट संभव होगा. चलिए जानते हैं इसके बारे में डिटेल से.

सौ बात की एक बात ये कि ईरान जंग के बाद पेट्रोल-डीज़ल और गैस बचाने को लेकर जो कदम उठाए जा रहे हैं. उनकी तो सब बात कर रहे हैं, लेकिन एक बहुत बड़ी ख़बर पर पब्लिक का ध्यान ज़्यादा नहीं गया. इसलिए भी नहीं गया क्योंकि थोड़ा टेक्निकल भी है मामला. ख़बर तो आपने भी सुनी होगी कि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने घोषणा की कि कोयले के लिए सरकार 37,500 करोड़ रुपये की योजना ले कर आ रही है. लेकिन असली ख़बर तो ये है कि ये योजना है क्या? असल में ये योजना है देश में ही पेट्रोल-डीज़ल और गैस बनाने की. जी, देश में पेट्रोल-डीज़ल और गैस बनाने की योजना है. अब आप कहोगे कि कच्चा तेल तो चाहिए ना पेट्रोल बनाने के लिए, वो तो बाहर से ही लेना पड़ेगा ना. नहीं, कच्चा तेल नहीं चाहिए. कच्चा तेल ना मंगाना पड़े बाहर से, नैचुरल गैस ना मंगानी पड़े बाहर से, उसी पर तो दुनिया के सारे देश अब काम कर रहे हैं.

कोयले से पेट्रोल डीज़ल गैस बनेगा. 37,500 करोड़ की नई योजना कार्यान्वयन किया जाएगा.

इंडोनेशिया की ख़बर आपने सुनी ही होगी. उसके यहां पाम ऑयल बहुत होता है. इंडोनेशिया में भी और मलेशिया में भी. तो वो अब पाम ऑल बेचने के बजाय पाम ऑयल से बायो-डीज़ल बनाने जा रहे हैं. ताकि उनको बाहर से डीज़ल ना मंगाना पड़े. तो क्या हम भी ऐसे ही देश में पेट्रोल-डीज़ल बनाने का प्लान बना रहे हैं? नहीं, हमारे यहां पाम ऑयल उतना कहां होता है, जो हम उससे डीज़ल बनाएं. तो फिर? एथेनॉल की स्कीम है क्या? ना, एथेनॉल का तो अलग प्रोग्राम चल रहा है. हम बनाने जा रहे हैं पेट्रोल-डीज़ल और गैस भी. अपने यहां. काहे से बनाएंगे? कोयले से. जी, कोयले से पेट्रोल बनाया जा सकता है.

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दुनिया में जिन देशों के पास सबसे ज़्यादा कोयला है, उनमें भारत है. अश्विनी वैष्णवजी ने बताया ना अगर आपने ख़बर पर ध्यान दिया हो तो कि हमारे पास इतना कोयला है कि 200 साल तक ख़त्म नहीं होगा. लेकिन कोयले से गाड़ी चलाएंगे क्या? जी, चला सकते हैं. ये समझने की ज़रूरत है. सरकार ने बहुत बड़ी योजना की घोषणा की है कि 37,500 करोड़ रुपये खर्च करके कोयले से गैस बनाने के बड़े-बड़े प्लांट लगाए जाएंगे. इस योजना से 7.5 करोड़ टन कोयला हर साल गैस में बदला जाएगा. और ये करने के लिए देश में 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश भी आएगा औऱ 50,000 नौकरियां भी नई बनेंगी. और सबसे बड़ी बात तो ये कि इससे देश में ही गैस ही नहीं, पेट्रोल-डीज़ल भी बना सकते हैं. लेकिन कोयले से गैस तो चलो कोयले को जला कर बनती होगी, कोयले से पेट्रोल कैस बनता है? इसको कहते हैं CTL, कोल टू लिक्विड. इसमें दो स्टेप होता है.

दो स्टेप में समझें कैसे कोयला से बनेगा गैस, पेट्रोल और डीजल

कोल गैसिफिकेशन स्टेप क्या है, ‘गैसिफ़िकेशन’. यानी पहले कोयले से गैस बनाते हैं. पहले कोयले को पीसकर बारीक पाउडर बनाते हैं. फिर उसे एक बड़े रिऐक्टर में डालते हैं. उस रिऐक्टर को कहते हैं गैसिफ़ायर. उसके अंदर बहुत गर्मी होती है 700-1500°C तक की गर्मी. और हाई प्रेशर होता है. फिर उसमें थोड़ी-सी ऑक्सीजन और पानी की भाप मिलाते हैं. इतनी कि कोयला जलता नहीं हैं, बल्कि रासायनिक प्रतिक्रिया से वो गैस में बदल जाता है. इस गैस को कहते हैं सिनगैस, यानी सिंथेटिक गैस. इस सिनगैस में मुख्यतः CO यानी कार्बन मोनोऑक्साइड गैस होती है और उसके साथ होती है

कोल गैसिफिकेशन का दूसरा स्टेप क्या है

फिर शुरू होता है स्टेप 2. इस स्टेप को कहते हैं फ़िशर-ट्रॉप्श सिंथेसिस. या FT प्रोसेस. तो ज़्यादा टेक्निकल चीज़ों में ना जाते हुए समझने की कोशिश करते हैं कि इसमें क्या होता है. इसमें इस सिनगैस को साफ़ करके एक केमिकल के साथ रिऐक्टर में डालते हैं. और हाई प्रेशर और कंट्रोल किये हुए तापमान पर इसमें जो गैस होती हैं यानी CO और H₂ वो मिलकर लिक्विड हो जाती हैं. और ये लिक्विड क्या होता है? ये होता है कच्चा पेट्रोल और डीज़ल. फिर इस लिक्विड से पेट्रोल निकाल सकते है, डीज़ल निकाल सकते हैं, हवाई जहाज़ों में डलने वाला जेट फ़्यूएल निकाल सकते हैं, और भी कई कमिकल निकाल सकते हैं. मतलब स्टेप 1 में कोयले से गैस बन जाती है, जिससे CNG बना सकते हैं, PNG बना सकते हैं और गाड़ियां भी चला सकते हैं, और रसोई में भी पाइपलाइन से भेज सकते हैं. उन्हीं CNG पंपों से जो अभी लगे हुए हैं. ये सिनगैस उस गैस से अलग नहीं होती जो क़तर से आ रही है. वही है. कोयले से बन जाती है.

और स्टेप 2 से यानी जिस FT प्रोसेस की बात हमने की उससे, फिर इस गैस से पेट्रोल-डीज़ल भी बना सकते हैं. और सीधा गाड़ियों में डाल सकते हैं. कोई अलग इंजन नहीं लगाने होंगे. कोयले से ही पेट्रोल बन जाएगा. आप कहोगे दुनिया में ये कहीं हो भी रहा है या बस ऐसे ही हवा-हवाई बाते हैं. हो रहा है. कई साल से दक्षिण अफ़्रीका में हो रहा है ये. वो अपने कोयले से पेट्रोल-डीज़ल बना रहे हैं और वहां चल रही हैं गाड़ियां इससे. सवाल ये कि इस वाले पेट्रोल से इंजन तो नहीं ख़राब हो जाएगा? नहीं, उल्टा ये ज़्यादा साफ़ होता है. इसमें सल्फ़र बहुत कम होता है, इंजन तो और ज़्यादा बढ़िया चलता है.

कोयले से पेट्रोल डीज़ल गैस बनेगा. 37,500 करोड़ की नई योजना को मिली है मंजूरी.

अब आप कहोगे कि महाराज अगर ये हो सकता है और हमारे पास 200 साल का कोयला पड़ा हुआ है तो अब तक हम क्या कर रहे थे? ये किया क्यों नहीं? तो पहली वजह तो ये कि ये बहुत महंगा पड़ता है. अगर सीधा कच्चा तेल ही इससे सस्ता मिल रहा हो तो ये कोयले से बना हुआ महंगा तेल क्यों बनाएं, ये सवाल था. लेकिन उससे भी बड़ी वजह ये थी कि भारत में जो कोयला है वो साफ़ कोयला नहीं है. उससे बहुत ज़्यादा राख बनती है. अभी तक कोयले से गैस और पेट्रोल-डीज़ल बनाने की जो तकनीक थी, वो ऐसे कोयले के लिए थी जिसमें राख कम बनती है. भारतीय कोयले के लिए तकनीक नहीं थी. और इसको करने में कार्बन डायॉक्साइड का धुआं बहुत निकलता था. तो प्रदूषण से तो वैसे ही हम परेशान चल रहे हैं, इसका धुआं झेलने की हालत में ही नही थे.

अब आ गई है खास तकनीक

तो अब ऐसा क्या हो गया? अब हुआ यह है कि हमारी सरकारी कंपनी BHEL ने हमारे राख वाले कोयले के लिए भी एक ख़ास तकनीक बना ली है. इस तकनीक को कहते हैं PBFG यानी प्रेशराइज़्ड फ़्लुइडाइज़्ड बेड गैसिफ़िकेशन.

BHEL ने हैदराबाद में एक पायलट प्लांट चलाया और भारतीय कोयले से गैस बना कर दिखा दी. और दुनिया में कई और कंपनियां भी राख वाले कोयले से गैस बनाने की तकनीक पर काम कर रही हैं. और जो धुआं निकलता था पुरानी तकनीक से उसको पक़ड़ने के लिए भी कार्बन कैप्चर की तकनीक आ चुकी है.

यानी पहले एक तो तकनीक नहीं थी और कच्चा तेल मिल ही रहा था, इसलिए कोयले से गैस बनाने पर दुनिया में कोई ध्यान नहीं दे रहा था. लेकिन अब तकनीक भी आ चुकी है और कच्चे तेल तो लेकर जो अनिश्चितता दुनिया तो ईरान युद्ध ने दिखाई है उसको देखकर कोयले पर सबका ध्यान जा रहा है. और भारत सरकार ने तो स्कीम लॉन्च भी कर दी है.

इतना कोयला है भारत में कि 200 साल तक ख़त्म नहीं होगा. लेकिन पहले बहुत ख़र्चा करना होगा इसके प्लांट लगाने के लिए. और अभी कुछ साल लगेंगे इनको तैयार होने में. लेकिन क़दम तो बढ़ा दिए गए हैं इस दिशा में. कि आगे कभी ऐसा संकट आए तो जैसे दुनिया तैयारी कर रही है, भारत भी तैयार रहे और अपने लिए गैस तो कम अज़ कम हम बना सकें. अब भी आधी प्राकृतिक गैस तो हमारे यहां ही निकलती है, बाक़ी आधी हम क़तर से मंगा रहे थे. जो अब दूसरे देशों से मंगानी पड़ रही है. लेकिन अगर अपने कोयले से ही बनने लग जाएगी गैस तो वो ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, ऐसी कोशिश है. और गैस के बाद तो पेट्रोल-डीज़ल भी उससे बना सकते हैं अगर ये स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मूज़ जैसा संकट कभी फिर खड़ा हो तो. यानी जिस कोयले को हमने काल कोठरी की तरह कोने में रख छोड़ा था, वो हीरा ही नहीं, खरा सोना साबित हो सकता है.

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