पश्चिम बंगाल में चुनाव पूर्व- पश्चात देखने मिलती है राजनीतिक हिंसा
टेकचंद्र शास्त्री:
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कोलकात्ता। पश्चिम बंगाल मे चुनाव पूर्व और पश्चात हिंसात्मक रुख देखने को मिलता है, उसकी तुलना देश के किसी और राज्य से नहीं की जा सकती है.
ग्रामीण इलाकों में ऐसा होना आम बात है कि हारने वाली पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को उनके घरों से भगा दिया जाता है और उन्हें महीनों तक दूसरी जगह रहना पड़ता है. राज्य में ऐसे दृश्य बिल्कुल भी दुर्लभ नहीं हैं.
यहां तक कि जिन राज्यों की छवि क़ानून-व्यवस्था को लेकर ख़राब रही है, वहां भी आमतौर पर ऐसी घटनाएं नहीं दिखतीं है.इसका बुरा असर आम जनजीवन प्रभावित हो जाता है.
राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े भी बताते हैं कि चुनावों के दौरान राजनीतिक हमलों में सबसे ज़्यादा जानें पश्चिम बंगाल में जाती हैं.
इसकी एक बड़ी संरचनात्मक वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में खेती की ज़मीन सीमित है, जबकि आबादी का घनत्व बहुत ज़्यादा है. कम ज़मीन पर बहुत सारे लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा टकराव के लिए ज़मीन तैयार कर देती है.
इसके ऊपर से, चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो, वहां ‘जो जीता सब कुछ उसी का’ वाला रवैया हावी रहता है- यानी सत्ता में आई पार्टी समाज के हर स्तर पर अपना नियंत्रण कायम करने की कोशिश करती है.
नतीजतन, सत्तारूढ़ पार्टी या उससे जुड़े संगठनों का असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हर जगह दिखाई देता है. पश्चिम बंगाल के गांवों में हों या कोलकाता शहर और उसके आसपास के इलाकों में, लोग धीरे-धीरे इस हक़ीक़त के आदी हो चुके हैं.
पढ़े-लिखे और सुसंस्कृत बुद्धिजीवियों के शहर के रूप में कोलकाता की छवि से इतर, एक ग्रामीण पश्चिम बंगाल भी है जहां राजनीतिक हिंसा रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है.
1940 के दशक में अविभाजित बंगाल के भागा आंदोलन से लेकर बाद की घटनाओं, जैसे मारीचझापी, नानूर, छोटो आंगारिया और बोगटुई हत्याकांड तक, इस पैटर्न की जड़ें इतिहास में गहराई तक फैली हुई हैं.
चुनावों के समय ऐसी हिंसा आम तौर पर कई गुना बढ़ जाती है, और इस साल इसके अलग होने की कोई खास वजह दिखाई नहीं देती.
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