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आयुर्वेद के अनुसार जितनी लंबी उम्र, उतना अधिक आक्सीजन देता है पाकड़,फल पेड

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आयुर्वेद के अनुसार जितनी लंबी उम्र, उतना अधिक आक्सीजन देता है पाकड़,फल पेड

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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गोरखपुर । दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र की विभागाध्यक्ष डा.पूजा के अनुसार पाकड़ जुझारू पेड़ होता है। इसकी शाखा भी पनप जाती है। इसका पेड़ घना होकर शीतल छाया देता है। इससे आक्सीजन उत्सर्जन अधिक होता है।

गोरखपुर, जितेंद्र पांडेय पंचवटी यानी वट, पीपल, पाकड़, करील और रसाल में शामिल प्रमुख पेड़ पाकड़ मानव शरीर के साथ पर्यावरण के लिए औषधि का काम करता है। सैकड़ों साल तक जीवित रहने और किसी भी परिस्थिति में पनपने की क्षमता, सबसे कम पतझड़ काल, सर्वाधिक पत्तियों के कारण पाकड़ बढ़ती उम्र के साथ आक्सीजन उत्सर्जन बढ़ाता है। महर्षि पतंजलि ने प्लक्ष (पाकड़ का संस्कृत नाम) का वर्णन औषधि के रूप में किया है। बरगद, पीपल व गूलर की तरह दूध युक्त इस पेड़ के फल, जिसे पकुआ कहते हैं, खाने के काम आता है। थाईलैंड में तो इसकी पत्तियां साग के तौर पर खाई जाती हैं। घर के उत्तर में पाकड़ का पेड़ लगाना ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ माना जाता है। पाकड की पत्तियां मधुमेह नियंत्रित रखने के काम आती हैं

चोट लगने या कटने पर छाल का चूर्ण डालने से रक्त स्नाव बंद हो जाता है

नासूर के लिए पाकड़ रामबाण औषधि है। पाकड़ की छाल का काढ़ा पीना लाभप्रद होता है

छाल को पानी में उबालकर उस पानी से नहाने से पसीने की बदबू धीरे-धीरे खत्म होने लगती है

पाकड़ की छाल घी में पीसकर लगाने से त्वचा की जलन शांत होती है, त्वचा संबंधी रोग दूर होते हैं

छाल के काढ़े का कुल्ला दांत दर्द और मुंह की बदबू से निजात दिलाता है। छाल का चूर्ण भी लाभप्रद होता है। पाकड की छाल के सेवन से रक्त पित्त दोष व वायु दोष से भी निजात मिलती है। इसका फल भी वायु दोष से मुक्ति दिलाता है

श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) और रक्त प्रदर में पाकड़ की छाल का काढ़ा लाभप्रद होता है। रक्त प्रदर में छाल का चूर्ण भी प्रयोग कर सकते हैं

नमी में तेजी से पनपता: प्रभागीय वन अधिकारी अविनाश कुमार के अनुसार पाकड़ के लिए उत्तरी भारत की जलवायु बेहद मुफीद होती है। यह नमी में तेजी से पनपता है। किसी भी मिट्टी में आसानी से उग जाता है, पर हल्की बलुई व चिकनी मिट्टी बेहतर रहती है। बरसात के समय इसके पौधे रोपना अच्छा रहता है।

जुझारू पेड़ है पाकड़: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र की विभागाध्यक्ष डा.पूजा के अनुसार पाकड़ जुझारू पेड़ होता है। इसकी शाखा भी पनप जाती है। इसका पेड़ घना होकर शीतल छाया देता है। अधिक उम्र तक जीवित रहने, अधिक पत्तियों और सबसे छोटा पतझड़ काल होने के कारण पाकड़ में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हमेशा होती है। इससे आक्सीजन उत्सर्जन अधिक होता है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र की विभागाध्यक्ष डा.पूजा का कहना है कि हर पौधे का अपना एक गुण होता है। पाकड़ फाइकस वायरन ग्रुप व मोरेसी कुल का वृक्ष है। अन्य वृक्षों की तुलना में यह अधिक समय तक हरा-भरा रहता है।

कोरोना काल ने हमें आक्सीजन की महत्ता बताई है । हमें एक बार फिर से उन वृक्षों की याद आई है जो अन्य की तुलना में अधिक आक्सीजन देते हैं। इन वृक्षों में एक नाम पाकड़ का भी है। यह अन्य वृक्षों की तुलना हमें अधिक आक्सीजन देता है। कोई इसकी वजह इसका अधिक समय तक हरा-भरा रहना मानता है तो कोई इसकी लंबी अवधि को मानता है। पाकड़ से हमें सिर्फ आक्सीजन ही नहीं मिलता है। पाकड़ औषधीय गुणों की खान है। तमाम रोगों के उपचार में इससे मदद मिलती है।

शहर में सिर्फ दो दर्जन पाकड़ के पुराने पेड़

शहर में अभी दो दर्जन से अधिक पुराने पाकड़ पेड़ हैं, जिनकी उम्र लोग 70 वर्ष से अधिक बताते हैं। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र की विभागाध्यक्ष डा.पूजा का कहना है कि हर पौधे का अपना एक गुण होता है। पाकड़ फाइकस वायरन ग्रुप व मोरेसी कुल का वृक्ष है। अन्य वृक्षों की तुलना में यह अधिक समय तक हरा-भरा रहता है। अधिक समय तक जीवित रहता है। इसमें पत्तियां अधिक होती हैं तो इसमें प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी अधिक होती है, जिस वृक्ष में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अधिक होती तो वह हमें आक्सीजन भी उतनी ही मात्रा में देगा। पाकड़ में कभी पूरी तरह से पतझड़ नहीं होता है। यह बहुत ही जुझारू किस्म का वृक्ष है। अधिक समय तक टिकता है। इसका औषधीय महत्व भी अधिक है।

पाकड़ मूलत: भारत सहित दक्षिण पूर्व एशिया, मलेशिया में पाया जाता है। यह मध्य आकार का वृक्ष है। यह 27 मीटर तक बढ़ सकता है। ज्यादातर नमी युक्त मिट्टी व क्षेत्र में पाया जाता है। घर के उत्तर की तरफ पाकड़ का पौधा लगाया जाना शुभ माना जाता है। पाकड़ की छाल का महिलाओं में होने वाली कई बीमारियों में उपयोग किया जाता है। इसका काढ़ा घाव को जल्दी भर देता है। इससे रक्त पित्त दोष को ठीक किया जा सकता है। थाइलैंड में लोग इसकी पत्तियों को साग के रूप में खाते हैं। त्वचार संबंधित रोगों में इसका उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों को खाने से मधुमेह का रोग ठीक होता है। जांडिस के उपचार में भी इससे मदद मिलती है। इसके फल के सेवन से पेट की बीमारियां ठीक होती हैं। डीएफओ अविनाश कुमार का कहना है कि पाकड़ के रहने की अवधि अधिक है। यह अधिक समय तक आक्सीजन देता है। इस लिहाज यह महत्वपूर्ण है। बरसात के समय इसके पौधों के रोपण के लिए ठीक समय रहता है।

सहर्ष सूचनार्थ नोट्स-:

उपरोक्त लेख आयुर्वेदाचार्यों का अभिकथन और वनस्पती शास्त्रों से संकलित करके जन सामान्य ज्ञान के लिए प्रस्तुत है? आयुर्वेद विशेषज्ञों से विधि व मात्रा के बारे में सलाह लेकर ही इसका प्रयोग कर सकते हैं,

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