उत्तर भारतीयों के बिना तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था नहीं चल सकती
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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चेन्नई । तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने तमिलनाडु में रहने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश यानी उत्तरभारतीयों के बिना चल सकती है य नहीं? तमिलनाडू के कृषि मंत्री ने उत्टरभारतीय प्रवासियों को निम्न स्तर का काम करने वाला बताया। क्या काम की प्रकृति से किसी को नीचा दिखाना उचित है? पन्नीरसेल्वम को कुछ कहने से पहले अपने राज्य में प्रवासियों के योगदान पर एक नजर जरूर डाल लेना चाहिए।
बिहार सहित उत्तर भारत के प्रवासी श्रमिकों पर तमिलनाडु के मंत्री एम आर के पन्नीरसेल्वम ने अपमानजनक बयान दिया। उन्होंने बिहार और उत्तरप्रदेश के प्रवासियों की तुलना तमिलनाडु के प्रवासियों से की है। उन्होंने यह बयान देने से पहले जरा भी सोचा कि यदि उत्तर भारत, और खास तौर पर बिहार के मजदूर यदि तमिलनाडु में न हों तो राज्य की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा? यह बात वे तब कह रहे हैं जब तमिलनाडु के कारखाने बगैर उत्तर भारतीय मजदूरों के राज्य के न तो चल सकते हैं, न ही वे राज्य की आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रख सकते हैं।
तमिलनाडु के टेक्सटाइल उद्योग में उत्तर भारतीय बड़ी संख्या में काम करते हैं।
तमिलनाडु में कुल 52,614 फैक्ट्रियों में जिनमें 47,62,810 अपंजीकृत और 4,79,355 रजिस्टर्ड श्रमिक कार्यरत हैं। इनमें से 35 लाख से अधिक मजदूर अन्य राज्यों के हैं। इनमें न तो कृषि मजदूर शामिल हैं और न ही वे मजदूर शामिल हैं जो छोटे अपंजीकृत व्यवसायों में काम करते हैं। इनमें बिहार, यूपी सहित उत्तर भारत के राज्यों के वे प्रवासी भी शामिल नहीं हैं जो पानीपुरी, चाट, फल आदि के छोटे व्यवसाय करके अपनी रोजीरोटी कमाते है।
क्या डोनाल्ड ट्रंप से प्रेरणा लेते हैं पन्नीरसेल्वम?
पन्नीरसेल्वम का बयान कुछ वैसा ही है जैसा अमेरिका केय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उनके देश में रहने वाले प्रवासियों को लेकर देते रहे हैं। ट्रंप यह जानते हुए भी कि अमेरिका प्रवासियों के बिना आगे नहीं बढ़ सकता, उनको अमेरिकियों का हक छीनने वाला बताते रहते हैं। पन्नीरसेल्वम भी उनके राज्य में रोजगार में लगे उत्तर भारतीय मानव बल को हतोत्साहित कर रहे हैं।
तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पन्नीरसेल्वम।
तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने कहा था कि, “उत्तर के लोग यहां टेबल साफ करने, निर्माण कार्य करने और पानीपुरी बेचने आ रहे हैं, क्योंकि उन्होंने केवल हिंदी सीखी है। वहां उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली, इसलिए वे यहां आए हैं।” उन्होंने तमिलनाडु के लोगों की तुलना उत्तर भारतीयों से की और कहा कि, ”तमिलनाडु के दो-भाषा नीति अपनाने और अंग्रेजी की अच्छी शिक्षा के कारण राज्य के बच्चे विदेश जा रहे हैं। यहां के कई युवा अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में जाकर अच्छा वेतन पा रहे हैं।”
काम की प्रकृति से कैसे होगा कोई छोटा या बड़ा?
पन्नीसेल्वम किसी के काम की प्रकृति को लेकर उसे छोटा या बड़ा कैसे कह सकते हैं? यदि बिहार के लोग तमिलनाडु में चाय बेचने का कारण छोटा काम करने वाले हुए, तो अमेरिका या ब्रिटेन में किसी दफ्तर में छोटा काम करने वाले तमिलनाडु के लोग बड़े कैसे हो सकते हैं? क्या वे सिर्फ इसलिए बड़े हैं क्योंकि वे अंग्रेजी जानते हैं? क्या वे भोजपुरी, मैथिली या अंगिका जानते हैं, जो कि बिहार के प्रवासी जानते हैं? भाषा संवाद का जरिया होती है, भाषा सभी हुनरों में जरूरी तो नहीं होती। काम तो बिना कुछ बोले भी किया जा सकता है। आखिर मूक और बधिर लोग भी तो रोजगार करते हैं।
डीएमके मंत्री के इस बयान से बिहार के नेता नाराज हैं। उन्होंने तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके के साथ उसकी सहयोगी कांग्रेस को भी निशाना बनाया और कहा कि इन दलों ने ऐतिहासिक रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को हमेशा दूसरे दर्जे का नागरिक समझा है।
फैक्ट्रियों में 15 प्रतिशत से अधिक प्रवासी श्रमिक
तमिलनाडु देश में सबसे बड़े औद्योगिक कार्यबल वाले राज्यों में से एक है। उद्योग सर्वेक्षण 2023-24 के मुताबिक देश में फैक्ट्रियों में काम करने वाले कुल श्रमिकों में से 15.24 प्रतिशत तमिलनाडु में हैं। इन मजदूरों में बड़ा बड़ा हिस्सा उत्तर भारत के मजदूरों का है। तमिलनाडु में निर्माण और7 Feb 2026, 5:18 pm टैक्सटाइल के क्षेत्र में बहुत से काम ऐसे हैं जो सिर्फ बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के लोग करते हैं। बंगाल और बिहार के कारीगर कलात्मक निर्माण में माहिर हैं। क्या इन निर्माण श्रमिकों के बिना तमिलनाडु में गंगनचुंबी इमारतें, शानदार बंगले और दफ्तर बनाए जा सकते है?
तमिलनाडु में खास तौर पर बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल,झारखंड और असम के प्रवासी श्रमिक आजीविका कमा रहे हैं। यह अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूर इस राज्य के विकास को गति देने में अहम भूमिका निभाते आए हैं। इसे बावजूद वे इस राज्य में सामाजिक-आर्थिक कल्याण की सुविधाओं से वंचित रहे हैं। प्रवासी कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद उन्हें भाषा से जुड़ी बाधाओं और सांस्कृतिक भिन्नता के साथ राजनीतिक कारणों से कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
पानीपुरी दक्षिण भारत में भी काफी पसंदीदा खाद्य पदार्थ है।
प्रवासियों के बिना क्या दौड़ सकते हैं कारखाने?
पन्नीरसेल्वम से सवाल है कि क्या वे या उनके राज्य के लोग बिहार के प्रवासियों के बिना कभी पानीपुरी या चाटा का मजा ले सकते हैं? क्या उनके कारखाने उत्तर भारतीयों के श्रम के बिना दौड़ सकते हैं? क्या उत्तर भारतीय प्रवासियों के बिना वे अच्छे निर्माण कर सकते हैं? एक बार सोच लें, क्या वे उत्तर भारतीयों के बिना तमिलनाडु को वैसा बनाए रख सकते हैं, जैसा वह कई सालों के विकास के सफर में बन सका है?
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