चरित्रहीन लोभी-लालची राजा जनता की अपेक्षाएं पूरी करने में असमर्थ?
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
9822550220
महर्षि चाणक्य ऋषि द्धारा रचित चाणक्य नीति शास्त्र के अनुसार चरित्रहीन कपटी कुटिल खल कामी स्वार्थी और लोभी लालची किस्म का कंजूस राजा (मंत्री) अपनी प्रजाजनों की अपेक्षा पूरी नहीं कर सकता है.और एसा राजा ईश्वरीय नियम और विधान का सदैव उलंघन करते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करने मे व्यस्त रहता है. वह सिर्फ समय पर आकर्षित भाषण देकर प्रजाजनों को लुभाने और अपनी लोकप्रियता बढाने के लिए आकर्षकदार भाषण प्रवचन व्यक्त करने वाले लोग पाल पोषकर करना पडता है.
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि एक लोभी, लालची निज स्वार्थी और कंजूस राजा अपनी प्रजा या जनता की अपेक्षाओं को कभी पूरा नहीं कर सकता है। ऐसे राजा का ध्यान जनता के कल्याण की बजाय केवल धन संचय करने पर होता है।
इस कथन के मुख्य कारण और परिणाम इस प्रकार हैं.
धन के प्रति सनक कंजूस राजा अपनी प्रजा की सुख-सुविधाओं की अनदेखी करते हुए, केवल अपना खजाना भरने में लगा रहता है। वह मूलभूत जरूरतों के लिए भी पैसा खर्च करने से कतराता है। वह देखते ही देखते रोडपति से करोडपति बनने का सपना देखते रहता है.
असंतोष और दु:ख: जहाँ का राजा लोभी होता है, वहाँ की प्रजा हमेशा दुखी रहती है। ऐसे राजा के राज्य में विकास कार्य ठप हो जाते हैं।कम बुद्धी कम अकल और कच्चे कान का राजा सत्यवादी और ईमानदार नहीं हो सकता है. एसे राजा का जल्द पतन तय है. उसके अनर्थ का मुख्य कारण लोभ एक ऐसी बीमारी है जो अंत में राजा के पतन का कारण बनती है, क्योंकि लालची राजा की भूख कभी शांत नहीं होती। एसा कपटी धूर्त चोर चुगलखोर और पाखण्डी राजा प्रजाजनो का हितैषी नहीं हो सकता है. सच्चा राजा वही है जो दयालु हो और अपनी जनता की अपेक्षाओं को पूरा करे, न कि वह जो स्वार्थ के वशीभूत होकर धन को इकट्ठा करे।
जिस राजा का दिल छोटा हो और जो धन का लोभी हो, वह कभी भी एक सुखी और समृद्ध राज्य की स्थापना नहीं कर सकता।
लोभी लालची राजा परस्त्री लम्पट व्यभिचारी राजा का एक न एक दिन सर्वनाश तय माना गया है
यह नीतिवचन शत-प्रतिशत सत्य है कि लोभी, लालची और व्यभिचारी राजा या शासक का सर्वनाश निश्चित होता है। भारतीय दर्शन और इतिहास में चरित्रहीनता और लालच को पतन का सबसे बड़ा कारण माना गया है।
इस नीति की पुष्टि करने वाले
सर्वनाश का कारण यह ह कि जो राजा लोभी होता है, वह अपनी प्रजा के सुख-दुःख की चिंता किए बिना केवल धन संचय में लगा रहता है। जब जो राजा पराई स्त्री की ओर आकर्षित होता है या पराई व्यभिचारी होता है, तो वह अपनी नैतिक शक्ति और सम्मान खो देता है। इसका एक रावण का उदाहरण मिलता है. तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ में रावण के माध्यम से यह दर्शाया है कि पराई स्त्री (सीता) का हरण करने और अपनी मर्यादा भूलने के कारण रावण का कुल सहित सर्वनाश हुआ।
लालच का फल लालच मनुष्य को अशांत और पापी बनाता है। जिस राजा के मन में वासना और लोभ हो, वह न खुद संतुष्ट रह सकता है और न ही अपनी प्रजा को सुख दे सकता है। सदाचार के सूत्रों के अनुसार, चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए क्योंकि चरित्रहीन व्यक्ति मरे हुए के समान होता है।
निष्कर्ष:
लोभ और वासना में अंधा होकर राजा न केवल अपना राज्य, बल्कि अपना जीवन और नामोनिशान भी खो देता है। पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं स्पष्ट करती हैं कि जब तक राजा नीतिवान और सदाचारी है, तभी तक उसका सिंहासन सुरक्षित है
विश्वभारत News Website