गीता के अनुसार संसार सागर मे ज्ञानी ही सर्वश्रेष्ठ
टेकचंद्र शास्त्री:
9822550220
श्रीमदभगवत गीता मे श्रीकृष्ण चंद्र भगवान ने ज्ञानी को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है. श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार संसार सागर मे ज्ञानीजनों को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है.
ज्ञान ही वह सर्वोच्च शक्ति है जो मनुष्य को भौतिक बाधाओं से ऊपर उठाती है। सही मायनों में ज्ञानी वही है जो अपनी बुद्धि का उपयोग जनकल्याण, विनम्रता और सत्य की खोज के लिए करता है। ज्ञान के बिना बाकी सभी बल समय के साथ फीके पड़ जाते हैं.जरुरत से अधिक अथाह धन,दौलत पद प्रतिष्ठा और शारीरिक बल समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, लेकिन ज्ञान का प्रकाश और अनुभव जन्म-जन्मांतर तक व्यक्ति के साथ रहते हैं. सच्चा ज्ञान कभी अहंकार नहीं लाता。 ज्ञानीजन परिस्थिति के अनुसार समभाव में रहते हैं और सही-गलत का निर्णय विवेक से करते हैं।
समाज का मार्गदर्शक: अपने विचारों और आचरण की शुद्धता से ज्ञानी व्यक्ति न केवल अपना बल्कि पूरे समाज का मार्गदर्शन करते हैं。
संसार में ज्ञानीजन इसलिए भी पूजनीय हैं क्योंकि वे सत्य और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए दूसरों को भी सही राह दिखाते हैं. अर्थात ज्ञान से श्रेष्ठ और कोई संपत्ति नहीं है
दरसल में संसार के लोगों में शुद्ध ज्ञान भी होता है, और अशुद्ध भी। *”अशुद्ध ज्ञान को अविद्या कहते हैं। और शुद्ध ज्ञान को विद्या कहते हैं।”*
शुद्ध ज्ञान अर्थात विद्या के भी दो स्तर हैं। *”एक शाब्दिक ज्ञान और दूसरा तत्वज्ञान।” “जब व्यक्ति कुछ शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब उसमें अभिमान नामक दोष उत्पन्न होता है, जैसे रावण और दुर्योधन में उत्पन्न हो गया था। यह अभिमान व्यक्ति की बुद्धि को नष्ट कर देता है। उसे व्यावहारिक जीवन में भी असफल बनाता है, तथा ईश्वर साक्षात्कार में तो अत्यंत ही बाधक है।”*
परंतु जब व्यक्ति को तत्वज्ञान हो जाता है/ वास्तविक ज्ञान हो जाता है, तब उसका अभिमान नष्ट हो जाता है। *”जैसे श्री रामचंद्र जी महाराज और श्री कृष्ण जी महाराज का अभिमान नष्ट हो गया था। जिसके कारण उनकी बुद्धि ठीक चलती थी, तथा उनमें वीरता विद्या सेवा परोपकार बुद्धिमत्ता न्यायकारिता आदि उत्तम गुण थे। इन गुणों के कारण वे अपने जीवन में सफल हो गए। इसीलिए आज तक संसार में उनका सम्मान होता है।”*
*”यदि आप भी रावण और दुर्योधन के समान शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करके रुक जाएंगे, और तत्वज्ञान को प्राप्त नहीं करेंगे, तो आपके अंदर भी अभिमान उत्पन्न होगा, और वह आपके विनाश का कारण बनेगा।”*
*”और यदि आप शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करके तत्वज्ञान की ओर बढ़ेंगे, तो अभिमान नहीं आएगा। जो भी शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करते हुए थोड़ा बहुत अभिमान उत्पन्न हुआ भी होगा, तो वह भी नष्ट हो जाएगा।” “तब आप भी श्री रामचंद्र जी महाराज एवं श्री कृष्ण जी महाराज के समान शुद्ध व्यवहार करेंगे। तभी आपका जीवन सुखमय एवं सफल हो पाएगा। शुद्ध ज्ञान/तत्त्वज्ञान प्राप्त करना कठिन तो है, परंतु असंभव नहीं है।”*
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