दुुर्भावनाओं के आवेश में गंधी राजनीति की वजह से हिंदू धर्म बदनाम
टेकचंद्र शास्त्री:
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वर्तमान परिवेश में देश की राजनीति मे व्याप्त भ्रष्टाचार और अपराधीकरण की वजह से सनातन हिन्दू धर्म हलकान और बदनाम हो रहा है.
यह एक कडुआ सच यह है कि जब राजनीतिक दल वोट बैंक की खातिर या आपसी रंजिश खुन्नस अलगाववाद के आवेश में अभद्र और ओछी बयानबाजी करते हैं.एक दूसरे के प्रति उकसाने- भडकाने घृणा और नफरत फैलाते हैं.एक दूसरे के प्रति ओछी हरकतों से पेश आने. धनबल और बाहुबल के प्रभाव से खूबसूरत अधेड महिलाओं को बहला फुसलाकर अय्याशी करने और मतदाता जनता-जनार्दन को गुलामी की तरफ ढकेलने के लिए महापाप और पाखण्ड का मार्ग प्रशस्त करने का गोरख धंधा बडी तेजी से फलफूल रहा हैं.जागरूक नागरिकों का मानना है कि नेता अपनी पत्नि से संतुष्ट नहीं है? इसलिए वह मदहोश कुत्ते की भांति बाहर मुंह मारता फिरता है.
तो इससे सनातन धर्म की महान परंपराओं और विचारधारा की छवि धूमिल हो रही है इस तरह के कृत्यों से सनातन धर्म के प्रति आस्था का अनादर हो रहा है。
सनातन हिन्दू धर्म को बदनाम होने से बचाने के लिए निम्नलिखित बातों को समझना आवश्यक है:
राजनीति बनाम धर्म के संबंध में बतादें कि सनातन धर्म एक शाश्वत जीवन शैली और दर्शन है, जिसका मूल उद्देश्य वसुधैव कुटुंबकम (अर्थात सारा विश्व एक परिवार है) की भावना है. वहीं, चुनावी लाभ के लिए की जाने वाली ओछी राजनीति स्वार्थी और विभाजनकारी होती है。
राज नेताओं के विवादित बयान की वजह से सनातन हिन्दू धर्म पर बिखराव बढ रहा है.
समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता (जैसे द्रमुक या अन्य विपक्षी गठबंधनों के नेता) सनातन धर्म पर अमर्यादित टिप्पणियां करते हैं, जो कि पूरी तरह से निंदनीय हैं इन बयानों का धर्म के वास्तविक सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं होता。
सांस्कृतिक हमला: कई राजनीतिक विश्लेषक इसे हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान और प्रतीकों को कमजोर करने की एक सोची-समझी साजिश मानते हैं。
सनातन धर्म की गरिमा इस बात में है कि हम उसे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर रखें और उसके मूल मूल्यों (सत्य, अहिंसा, और शांति) को अपने आचरण में अपनाएं धर्म को वोट की राजनीति का अखाड़ा बनाने से बचना ही समाज के हित में है。
दरअसल में राजनेताओं की संतानो मे संस्कारहीनता बढने से हिन्दू धर्म खतरे गर्त मे डूब रहा है.
चुंकि राजनेताओं की संतानों के आचरण का सीधा असर समाज पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें अक्सर युवा पीढ़ी अपना आदर्श मानती है। हालांकि, केवल उनके संस्कारहीन होने से सनातन धर्म खतरे में पड़ जाए, यह धारणा उचित नहीं है। हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं जो व्यक्तिगत आचरण से कहीं अधिक मजबूत हैं।
सनातन धर्म और इसके मूल्य
व्यक्तिगत कर्म और जिम्मेदारी: हिंदू धर्म में व्यक्ति की पहचान उसके स्वयं के कर्मों और विचारों से होती है。 धर्म का मूल व्यक्तिगत साधना, ज्ञान, और जीवन शैली पर आधारित है。
षोडश संस्कार: धर्म की रक्षा के लिए हमारे शास्त्रों में जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह संस्कारों का विधान है。 यदि आने वाली पीढ़ी को अपने धार्मिक ग्रंथों (जैसे रामायण, गीता) और संस्कारों से जोड़ा जाए, तो धर्म हमेशा सुरक्षित रहता है。
परिवार की भूमिका: समाज में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों की पहली पाठशाला घर और परिवार ही होता है。 संस्कृति की रक्षा किसी एक वर्ग या राजनेता पर निर्भर न होकर जन-जन के विश्वास और आस्था में निहित है。
हालांकि राजनेताओं के बच्चों का समाज में एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना आवश्यक है, फिर भी हिंदू धर्म की मूल विचारधारा किसी एक वर्ग या व्यक्ति के आचरण पर निर्भर नहीं करती है। यह सनातन परंपराओं के पालन और समाज की सामूहिक जागरूकता से संरक्षित होती है।दरअसल मे जनता-जनार्दन से चुना गया जनप्रतिनिधि समाज का मालिक नहीं अपितु जनता का सेवक होता है न कि मालिक? फिर जनता के सेवक ने सेवक की भांति जनसेवा का कार्य करना चाहिए. फिर अनेकानेक नेतागण संविधान की शपथ लेने के बाद एक डोडपति देखते ही देखते करोडपति कैसे और क्यों बन जाते हैं.यह तो भारत वर्ष की राजनीति के समक्ष बदनुमा दाग है.और इसी वजह से भारतीय संस्कृति सनातन हिन्दू धर्म बुरी तरह बदनाम और हलकान हो रहा है.
सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-
उपरोक्त समाचार सामान्य ज्ञान पर अधारित जनहितार्थ और समाज सुधारने की नियति से ओत-प्रोत है.इस लेख समाचार किसी की भावनाओं को आहत पंहुचाया नहीं है. अगर जिस किसी को बुरा लगता है तो वह अपने गिरेबान मे झांककर देख ले तो ही बेहतर होगा. अधिक जानकारी के लिए सनातन धर्म की साध्वी सुश्री ऋतुंभरा दीदी और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती देवी के विचार और भाषण सुनने का प्रयास कर सकते हैं.
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