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‘मोदी सरकार हराओ’ : विपक्षी दलों की बैैठक कल पटना मे

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नई दिल्ली। 23 जून को पटना में होने वाली विपक्षी एकता बैठक के लिए अनेक विपक्षी दलों ने मंजूरी दे दी है। विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक किस मुकाम पर पहुंचती है ये देखना दिलचस्प होगा।
विपक्षी एकता की मुहिम इन दिनों फिर सुर्खियों में है। लोकसभा चुनाव 2024 में भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए विपक्षी दल एक बार फिर से एकता बनाने की कवायद में जुट गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बार इस एकता के सूत्रधार बनने जा रहे हैं। 23 जून को पटना में होने वाली विपक्षी एकता बैठक के लिए अनेक विपक्षी दलों ने मंजूरी दे दी है। विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक किस मुकाम पर पहुंचती है ये देखना दिलचस्प होगा। नजरें इस बात पर भी रहेंगी कि विपक्ष में एकता हुई तो नेतृत्व कौन करेगा? शरद पवार से लेकर लालू यादव, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल भी अपने-अपने तरीके से विपक्ष को एकता के धागे में पिरोने में लंबे समय से जुटे हैं।
ये पहला मौका नहीं है जब भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के प्रयास हुए हों। इस बैठक से पहले ही जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा नीतीश सरकार से अलग हो गई है। 75 साल के आजाद भारत में विपक्षी एकता के प्रयास अनेक बार हुए, परवान भी चढ़े लेकिन लंबे समय तक एकता टिक नहीं पाई।
1977 में पहली बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता से तो हटा दिया लेकिन ढाई साल में ही अन्तर्विरोध के चलते खुद की भी सरकार गिर गई। 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में विपक्षी एकता हुई, जनता दल भी बना और उसकी सरकार भी बनी लेकिन एक साल में ही गिर गई। इसलिए विपक्षी दलों की एकता को लेकर हर बार सवाल खड़े होते रहे हैं।वसुंधरा राजे को अब नहीं बढ़ाएगी भाजपा सवाल जिनके जवाबों का है इंतजार है

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विपक्षी दलों में एकता होती है तो इसका नेतृत्व कौन करेगा? मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अथवा नीतीश कुमार, शरद पवार अथवा ममता बनर्जी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि नरेन्द्र मोदी के सामने विपक्ष किसे प्रधानमंत्री पद के लिए आगे करता है? क्या देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस एक साथ उम्मीदवार उतारने पर सहमत होगी? क्या दशकों से केरल में एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा संभालने वाले कांग्रेस और वामपंथी दल वैचारिक मतभेद समाप्त कर एक डोर में बंधेंगे?
क्या नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी, चंद्रबाबू नायडू, एच.डी. देवेगौड़ा और के. चन्द्रशेखर राव की पार्टी भी विपक्षी एकता एक्सप्रेस में सवार होंगी? और यदि नहीं तो विपक्षी एकता के मायने क्या होंगे?
दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार के अध्यादेश को लेकर अनेक विपक्षी दलों ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया है लेकिन प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस इस मुद्दे पर अभी मौन है। तो क्या दो राज्यों में कांग्रेस को बेदखल कर सरकार चला रही आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ ही गठजोड़ करेंगी?
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 37.30 फीसदी वोट के साथ 303 सीटें जीती थी। भाजपा के सहयोगी दलों को 8 फीसदी वोट मिले थे। यानी एनडीए को कुल 45 फीसदी।
कांग्रेस को 19.46 फीसदी वोट के साथ 52 सीटें मिली थी। कांग्रेस के सहयोगी दलों को 6 फीसदी वोट मिले थे। यानी यूपीए को कुल 26 फीसदी।
शेष 29 फीसदी वोट अन्य दलों को मिले थे। इस बार भी नवीन पटनायक, मायावती, चन्द्रबाबू नायडू, जगनमोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल की पार्टी को मिले 11 फीसदी वोट बेहद मायने रखते हैं।
विपक्षी दल दिल्ली में तो भाजपा के खिलाफ एकजुट नजर आते हैं लेकिन बात जब राज्यों तक पहुंचती है तो उनके राजनीतिक स्वार्थ एकता में बाधा बनने लगते हैं। संसद सत्र की समाप्ति के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 17 विपक्षी दलों को रात्रिभोज पर तो बुलाया था, लेकिन कर्नाटक में सिद्धरमैय्या के शपथ ग्रहण में अनेक नेताओं को नहीं बुलाया। इसी तरह भाजपा के विरोध में खड़े अनेक दल नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए।

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1. दिल्ली में भाजपा के खिलाफ एकजुट होने के प्रयासों में जुटा विपक्ष राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी अखाड़े में ताल ठोकता है।

2. कांग्रेस राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा में मज़बूत

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