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(भाग:200) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कभी भी समाजिक और धार्मिक के मर्यादाओं का उल्लघंन नहीं किया था। 

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भाग:200) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कभी भी समाजिक और धार्मिक के मर्यादाओं का उल्लघंन नहीं किया था।

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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न्यायप्रिय श्रीराम के गुण:- भगवान राम विषम परिस्थितियों में भी नीति सम्मत रहे। उन्होंने वेदों और मर्यादा का पालन करते हुए सुखी राज्य की स्थापना की। स्वयं की भावना व सुखों से समझौता कर न्याय और सत्य का साथ दिया। फिर चाहे राज्य त्यागने, बाली का वध करने, रावण का संहार करने या सीता को वन भेजने की बात ही क्यों न हो। इसलिए श्रीराम एक मर्यादा पुरुष हैं। उन्हें पुरुषोत्तम इसलिए कहा जाता है क्यूंकि वे उत्तम गुणों का भंडार हैं। वाल्मीकी रामायण में उनके गुणों का उल्लेख कुछ इस प्रकार से मिलता है –

श्रीराम बड़े ही रूपवान् और पराक्रमी थे। वे किसीके दोष नहीं देखते थे। भूमण्डलमें उनकी समता करनेवाला कोर्इ नहीं था। वे अपने गुणोंसे पिता दशरथके समान एवं योग्य पुत्र थे॥ ९ ॥

वे सदा शान्त चित्त रहते और सान्त्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे; यदि उनसे कोर्इ कठोर बात भी कह देता तो वे उसका उत्तर नहीं देते थे॥ १० ॥

श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम और श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम’ ऐसा क्यों कहा जाता है?

प्रभु ‘श्रीराम सूर्यवंशी ‘थे और सूर्य की १२ कलाएं मानी जाती हैं इस कारण मान्यता है कि प्रभु श्रीराम में सूर्य देव की समस्त कलाएं मौजूद थीं।

श्रीराम जी ने अपने अवतार में भगवान जैसा रूप नहीं दर्शाया है बल्कि उन्होंने मानव के लिए आदर्श प्रस्तुत किया है इसीलिए उन्हें “मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम चंद्र जी ” कहते हैं ।

 

पुरूषोत्तम शब्द दो शब्दों को जोड़ने से बना है ( पुरुष + उत्तम ) अर्थात् पुरूषोत्तम , जो पुरुषों में उत्तम आदर्श एवं मर्यादित जीवन प्रस्तुत करे वही पुरूषोत्तम कहलाता है ।

मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं, जिन्होंने त्रेता युग में रावण का संहार करने के लिए धरती पर अवतार लिया। उन्होंने माता कैकेयी की 14 वर्ष वनवास की इच्छा को सहर्ष स्वीकार करते हुए पिता के दिए वचन को निभाया। उन्होंने ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाय पर वचन न जाय’ का पालन किया। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन्होंने कभी भी कहीं भी जीवन में मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। माता-पिता और गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए वह ‘क्यों’ शब्द कभी मुख पर नहीं लाए

उन्होंने मानव मात्र के लिए मर्यादा पालन का जो आदर्श प्रस्तुत किया वह संसार के इतिहास में कहीं

भगवान राम ने ऐसा क्या किया, जिससे उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम के नाम से जाना जाता है?

भगवान श्री राम चन्द्र को मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है? भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, क्या उन्होंने कभी झूठ बोला था?कभी नहीं?

केंद्र सरकार में काम किया है (1978–2017)4वर्ष

हिंदू धर्म में श्री राम सबसे श्रद्धेय देवताओं में से एक हैं। ये भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे। हम बचपन से ही रामायण से जुड़ी कई कहानियां सुनते आ रहे हैं और ये सारी कहानियां हमें काफी प्रेरित भी करती हैं। अपने भक्तों के लिए श्री राम पूर्णता का अवतार हैं लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है। आज हम आपको इसके पीछे का सत्य बताएंगे। तो चलिए जानते हैं आखिर क्यों कहलाते हैं प्रभु श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम।

 

मर्यादा पुरुषोत्तम का अर्थ मर्यादा पुरुषोत्तम संस्कृत का शब्द है मर्यादा का अर्थ होता है सम्मान और न्याय परायण, वहीं पुरुषोत्तम का अर्थ होता है सर्वोच्च व्यक्ति। जब ये दोनों शब्द जुड़ते हैं तब बनता है सम्मान में सर्वोच्च। श्री राम ने कभी भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। उन्होंने सदैव अपने माता पिता और गुरु की आज्ञा का पालन किया। साथ ही अपनी समस्त प्रजा का भी ख्याल रखा। वे न सिर्फ एक आदर्श पुत्र थे बल्कि आदर्श भाई, पति और राजा भी थे। क्यों कहा जाता है श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपने सभी भक्तों को बहुत ही प्रिय हैं और सभी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। इतना ही नहीं श्री राम अपने परिवार और पूरे अयोध्या में भी सबके चहेते थे क्योंकि वह अपने सभी कर्त्तव्यों का पालन पूर्णता के साथ करते थे। श्री राम हर रूप में सभी के लिए एक आदर्श थे। एक पुत्र के रूप में श्री राम श्री राम राजा दशरथ के पुत्र थे और अयोध्या के राजकुमार। इस संसार में जहां भाई बहन संपत्ति के लिए आपस में ही लड़ रहे हैं, वहीं श्री राम ने अपने भाई भरत के लिए पूरा अयोध्या राज्य त्याग दिया था जब उनकी सौतेली माता कैकेयी ने उन्हें वनवास जाने का आदेश दिया था। हालांकि श्री राम के पिता राजा दशरथ ऐसा कभी नहीं चाहते थे लेकिन कैकेयी को दिए हुए अपने वचन के कारण वे विवश थे। अपने पिता के वचन को निभाने की खातिर श्री राम ने वनवास जाने का निर्णय लिया था और चौदह वर्षों तक अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में रहे थे। यह इस बात का प्रमाण है कि वह किसी भी हालत में अपने माता पिता का अनादर नहीं कर सकते थे। श्री राम एक भाई के रूप में श्री राम के तीन भाई थे भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। तीनों अपने बड़े भाई का बहुत आदर करते थे। श्री राम इन तीनों के लिए एक आदर्श थे। राम जी के वनवास जाने के पश्चात सारा राजपाट भरत को सौंप दिया था लेकिन फिर भी अपने छोटे भाई के प्रति उनका प्रेम कम नहीं हुआ। वनवास के दौरान जब भी भरत राम जी से मिलने आते श्री राम हमेशा एक बड़े भाई की तरह उनका मार्गदर्शन करते। श्री राम एक पति के रूप में श्री राम हमेशा अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे। कभी वे ऋषि मुनियों के साथ मिलकर अपने राज्य की उन्नति पर चर्चा करते तो कभी अपने भक्तो को दानवों के अत्याचारों से मुक्त कराने में लगे रहते थे। किन्तु इतनी व्यस्तता के बावजूद वे अपनी पत्नी देवी सीता का पूरा ध्यान रखते। वे उनकी सुरक्षा को लेकर इतने गंभीर रहते थे कि उन्होंने माता सीता को आदेश दिया था कि उनकी गैर हाजिरी में वे कहीं बाहर न निकलें। वनवास के दौरान एक दिन जब माता सीता ने सोने के हिरण की मांग की तो श्री राम उनकी इच्छा पूर्ति के लिए अपनी कुटिया से बाहर गए। तब उन्होंने लक्ष्मण जी को माता सीता की रक्षा करने के लिए कहा। लक्ष्मण जी ने एक रेखा खींच कर अपनी भाभी से अनुरोध किया कि वे इसे पार करके बाहर न आएं। इतने में रावण एक साधु का वेश धारण कर वहां पहुंच गया और माता सीता से भिक्षा मांगने लगा जैसे ही माता लक्ष्मण रेखा लांघ कर बाहर निकली रावण ने उनका अपहरण कर लिया। श्री राम एक राजा के रूप में बाकी सबसे ज़्यादा, श्री राम एक आदर्श राजा थे। कहा जाता है कि वनवास के बाद जब वे अयोध्या के राजा घोषित हुए तब उनके राज्य में कभी कोई चोरी, डकैती नहीं होती थी न ही कोई भी भूख से मरता था। साथ ही उनके अंदर निर्णय लेने की क्षमता गजब की थी। जब कुछ लोगों ने देवी सीता के चरित्र पर उंगली उठाई और कहा कि उन्हें वापस वनवास भेज दिया जाए तो श्री राम के लिए यह निर्णय लेना बहुत ही कठिन था लेकिन फिर भी उनके लिए अपने रिश्तों से ज़्यादा उनकी प्रजा मायने रखती थी इसलिए उन्होंने अपनी प्रजा को हमेशा ज़्यादा महत्त्व दिया

 

जब कुत्ता आया श्रीराम से न्याय मांगने

 

ऐसे ही लोग रामराज्य को उत्तम शासन का उत्कर्ष नहीं मानते हैं। रामराज्य में हर एक को न्याय मिलता था, सभी सुखी थे, सबमें समरसता, समता का भाव था। सभी रोग, ताप से मुक्त थे। पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास ने रामराज्य के बारे में अपने महन काव्य ग्रंथ रामचरित मानस में लिखा है- राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।। बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।। दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

जो प्रसंग हम यहां दे रहे हैं वह राम की न्यायप्रियता और सबके प्रति समान भाव रखने का एक उत्तम उदाहरण है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के साम्राज्य में कोई भी व्यक्ति, प्राणी,जीव आदि को कोई बीमारी नही रही ओर सबके प्रति श्रीराम के सौम्यतापूर्ण व्यवहार के कारण प्रजा समस्याग्रस्त नहीं थी। श्रीराम की न्यायसभा में धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र के ज्ञाता रहते थे ओर उनकी न्यायसभा इन्द्र, यम और वरुण की न्यायसभा जैसी ही सुशोभित थी जिसका उल्लेख आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने अपनी श्रीमदवाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के प्रथम सर्ग में इस तरह किया है –सभा यथा महेन्द्रस्य यमस्य वरुणस्य च। शुशुभे राजसिंहस्य रामश्याक्लिष्टकर्मणा:। एक दिन राम न्यायसभा में मामलों का निपटारा

 

कर रहे थे। सभी मामले निपटाने के बाद राम लक्ष्मण से बोले- लक्ष्मण जरा बाहर जाकर देखो कोई न्याय चाहने वाला प्रार्थी हो तो उसे आदर सहित यहां ले आओ। लक्ष्मण ने आदेश पाते ही न्यायसभा के बाहर आकर देखा तो उन्हे कोई व्यक्ति नहीं दिखा क्योंकि वे खुद जानते थे कि धर्मशासित राज्य में कोई न्याय का प्रार्थी कैसे हो सकता है,उन्होने राम को सूचित किया कि कोई भी प्रार्थी नहीं है। लक्ष्मण का जबाव सुनने के बाद रामजी विहंसे और बोले एक बार और जाओ और प्रार्थी की तलाश करो। लक्ष्मण पुन: द्वार पर आए तो बाहर एक कुत्ते को बैठा देखा। लक्ष्मण को देख कर कुत्ता खड़ा हो गया ओर रोने लगा। लक्ष्मण ने कुत्ते से पूछा-तुम क्यों रो रहे हो निडर होकर मुझसे कहो।

 

कुत्ता बोला- मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ राम जी से कहूँगा, आप कृपया कर मेरा संदेश प्रभु को पहुंचा दीजिए। लक्ष्मण ने कुत्ते कि बात सुनी और श्रीराम से कुत्ते की पूरी बात सुनायी। श्रीराम ने अपनी न्यायसभा में कुत्ते को फरियाद सुनाने की अनुमति देकर लक्ष्मण को उसे बुलाने भेजा। लक्ष्मण कुत्ते के पास पहुंचे और प्रभु के सामने अपनी बात रखने को कहा। प्रभु की सहमति मिलने के बाद कुत्ते ने लक्ष्मण से कहा कि- “देवता के मंदिर में, राजा के भवन में और पंडित के घर में हम जैसे जीवों का प्रवेश निषिद्ध है। ऐसे में मैं वहाँ नहीं जा सकता। राम साक्षात शरीरधारी धर्म हैं, वे सत्यवादी हैं, रण में दक्ष ओर समस्त प्राणियों के हित में तत्पर है। इसलिए लक्ष्मण जी आप प्रजापालक श्रीराम को कह दीजिये कि उनकी आज्ञा के बिना मैं उनके न्यायमंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहता हूँ।’

 

लक्ष्मण वापस श्रीराम के पास आकर कहा- “”हे प्रभु आपके आदेश से मैं बाहर प्रार्थी को तलाशने गया था। एक कुत्ता बाहर खड़ा है ओर आपके समक्ष उपस्थित होने कि आज्ञा चाहता है।“” श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- “”फरियादी कोई भी जाति या योनि का क्यों न हो, उसे शीघ्र ले आओ।“” श्रीराम की आज्ञा पाकर कुत्ता उनकी न्यायसभा में आ गया। प्रभु राम ने देखा कि उसका सिर घायल है ओर रक्त बह रहा है। श्रीराम कुत्ते से बोले- मै तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ? तुम्हें जो कुछ कहना है बिना डरे कहो।

 

कुत्ता प्रभु राम से बोला कि अज्ञानतावश मैंने कोई चूक कि हो तो मैं उसके लिए आपसे क्षमा चाहता हूँ आप क्रोध ना करें तो मैं अपनी व्यथा आपसे कहूं।

 

श्रीराम ने कहा- तुम निडर होकर कहो तुम्हारी जो भी इच्छा है पूरी की जायेगी।

 

कुत्ते ने भगवान श्रीराम कि न्यायसभा में अपनी व्यथा-कथा कहनी प्रारंभ की कि मैं एक भिक्षुक ब्राह्मण के घर में रहता हूँ। उसने ही बिना किसी अपराध के मेरा सिर फोड़ दिया।

 

श्रीराम ने द्वारपाल को उस भिक्षुक ब्राह्मण को बुलाने भेज दिया। आते ही उस भिक्षुक ब्राह्मण ने प्रभु श्रीराम को प्रणाम कर पूछा कि उसे किस कारण से दरबार में बुलवाया गया है।

 

श्रीराम ने उस ब्राह्मण से प्रश्न किया – तुमने इस कुत्ते को क्यों मारा ? इसने ऐसा क्या किया जो तुमने इसका सिर फोड़ दिया?

 

ब्राह्मण ने कहा – हाँ मैंने क्रोध में इस कुत्ते को मारा है। मैं भिक्षा के लिए घूम रहा था और भिक्षा का समय निकल गया था। यह गली के बीचोबीच बैठा था, मैंने कई बार इसे हटने को कहा,तब यह गली के एक छोर में ऐसी जगह खड़ा हो गया जिससे मेरी राह रुक गयी। मैं भूखा था ही इसलिए क्रोध में मैंने इसे मार दिया। अब आप मुझे जो भी दंड देना चाहे दे दें। श्रीराम ने सभासदों समेत सहित अपनी न्यायसभा के सदस्यों से पूछा कि इस ब्राह्मण को क्या दंड दिया जाये?

 

सभी ने कहा कि शास्त्रों के अनुसार दंड द्वारा ब्राह्मण अवध्य है। न्यायसभा ने श्रीराम को ब्राह्मण के बारे में खुद निर्णय लेने को कहा। यह मामला भी एक पशु और मानव के बीच है। इस पर कोई निर्णय सुनाना आसान नहीं है। अब प्रभुआप ही निर्णय लें कि इस पर क्या किया जाये।

 

उन्होंने कुत्ते को पूछा, ‘ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा तो तुम क्या दंड देना चाहते हो? ‘

 

कुत्ते ने कहा,’भगवान इसे कालंजर का मठाधीश बना दिया जाए।’ कुत्ते की बात सुनकर भगवान राम मुस्करा दिए और मुस्कराते हुए कुत्ते से पूछा,’ इस ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा बदले में तुम इन्हें मठाधीश बनाना चाहते हो। मठाधीश बनने से इनकी बहुत सेवा होगी, काफी चेले बन जाएंगे। इससे तुम्हारा क्या फायदा होगा।’

 

कुत्ता बोला, मैं भी पूर्व जन्म में मठाधीश था। मुझ से कुछ गलत काम हुआ आज मैं कुत्ते की योनि में हूं और लोगों के डंडे खा रहा हूं। यह ब्राह्मण भी मठाधीश बनेगा फिर कुत्ते की योनि में जाएगा, फिर लोगों के डंडे खाएगा तो इसकी सजा पूरी हो जाएगी।

 

कुत्ते की राय सुन भगवान राम मुसकराये और उन्होंने ब्राह्मण को वही सजा सुना दी जो कुत्ते ने सुझायी थी।

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