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जय महाकाल : भक्तों को अकाल मृत्यु से मुक्त और हर दुख कष्टों को निवारण करते हैं बाबा महाकाल भैरव🙏

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बाबा महाकाल भैरव शिव के पांचवे रूद्रावतार माने जाते है. तंत्र मंत्र और सिद्दियों के देवता महा काल भैरव की जयंती पर उन की पूजा की जाती है। अपने अनन्य भक्तों की सुरक्षा के लिए बाबा महाकाल भैरव सदैव तत्पर रहते हैं!

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाकाल भैरव शिव के पांचवे रूद्रावतार है. तंत्र मंत्र और सिद्दियों के देवता काल भैरव की जयंती पर उन की पूजा की जाती है. जो व्यक्ति काल भैरव की पूजा करता है तथा “भैरव गायत्री मंत्र” का जाप करता है। उसे अकाल मृत्यु, रोग, दोष कष्टादि का कोई भय नहीं होता है. काल भैरव को भगवान शिव का स्वरूप मानते हैं. वे रुद्रावतार कहे जाते हैं. वे शिव के सबसे उग्र रूप हैं. इस साल काल भैरव जयंती नवंबर माह मे मनाई जाती है. हिंदू कैलेंडर के अनुसार, काल भैरव जयंती मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मनाते हैं. भैरव गायत्री मंत्र निम्न है:- “ऊं शिवगणाय विध्महे गौरी सुताय धीमहि तन्नो भैरवा:प्रचोदयात”

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काल भैरव की उत्पत्ति की कथा :- शिव पुराण में काल भैरव को भगवान शंकर का रूप कहा गया है. रुद्र ही भैरव हैं. बाबा काल भैरव के भय से तो यमराज तक कांपते हैं. ये काल से भी परे होने के कारण महाकाल भैरव कहलाते हैं. स्कंदपुराण में काल भैरव की उत्पत्ति की कथा बताई गई है. पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शंकर में कौन सर्वश्रेष्ठ है इस बात पर चर्चा हुई. हर कोई स्वयं को दूसरे से महान और श्रेष्ठ बताता था. जब तीनों में से कोई इस बात का निर्णय नहीं कर पाया कि सर्वश्रेष्ठ कौन है तो यह कार्य ऋषि-मुनियों को सौंपा गया. उन सभी ने सोच विचार के बाद भगवान शंकर को सर्वश्रेष्ठ बताया. ऋषि-मुनियों की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी का एक सिर क्रोध से जलने लगा. वे क्रोध में आकर भगवान शंकर का अपमान करने लगे. इससे भगवान शंकर भी अत्यंत क्रोधित होकर रौद्र रूप में आ गए और उनसे ही उनके रौद्र स्वरूप काल भैरव की उत्पत्ति हुई.

बाबा महाकाल भैरव ने घमंड में चूर सृष्टी रचेता ब्रह्म देव के जलते हुए सिर को काट दिया था। इससे उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया. तब भगवान शिव ने उनको सभी तीर्थों का भ्रमण करने का सुझाव दिया. फिर वे वहां से तीर्थ यात्रा पर निकल गए. पृथ्वी पर सभी तीर्थों का भ्रमण करने के बाद काल भैरव शिव की नगरी काशी में पहुंचे. वहां पर वे ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त हो गए. शिव की नगरी काशी काल भैरव को इतनी अच्छी लगी कि वे सदैव के लिए काशी में ही बस गए. भगवान शंकर काशी के राजा हैं और काल भैरव काशी के कोतवाल यानि संरक्षक हैं. आज भी काशी में काल भैरव का मंदिर है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा करता है, उसे काल भैरव का दर्शन अवश्य करना चाहिए. तभी उसकी पूजा पूर्ण होती है.
काशी के कोतवाल क पूजा से मिलता है अभय
यूं तो काशी शिव की ही नगरी मानी जाती है परंतु यहाँ के कोतवाल अर्थात संरक्षक काल भैरव की पूजन से मिलता है। बाबा काल भैरव अपने निहत्थे निर्दोष और निरपराध भक्तों को अत्याचारी,भ्रष्टाचारी एवं जन शत्रुओं और तंत्र मंत्र से मुक्ति दिलाते हैं! विशेषतः कालभैरव की जयंती पर इनके पंचोपचार पूजन से शिव पार्वती सहित कालभैरव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है .

काल भैरव की कैसे करें पूजा?:- भैरव अष्टमी के दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर नित्य-क्रिया आदि कर स्वच्छ हो जाएं. संभव हो तो गंगा जल से शुद्धि करें. व्रत का संकल्पओ लें. पितरों को याद करें और उनका श्राद्ध करें. इसके बाद काल भैरव के मंदिर या शिव मंदिर में जाकर सच्चे मन से पूजा करनी चाहिए. इस दिन कुश के आसन पर बैठकर ‘ऊँ भैरवाय नमः, ’ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:” मंत्र का कम से कम 11 बार माला जाप करें. इसके आलावा शमी के पेड़ के नीचे शाम के समय शुद्ध सरसों तेल का दीपक जलाना चाहिए. ऐसा करने से जीवन में चल रही सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं. अर्धरात्रि में धूप, काले तिल, दीपक, उड़द और सरसों के तेल से काल भैरव की पूजा करें. व्रत के सम्पूर्ण होने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं

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