चरित्रहीन पर स्त्रीगमन और पर पुरुष व्यभिचरिणी के यहां जलपान वर्जित
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: संयुक्त संपादक रिपोर्ट
भारतीय सनातन संस्कृति और हिंदू शास्त्रों (विशेषकर गरुड़ पुराण, मनुस्मृति और पंचतंत्र) के अनुसार जनसाधारण ग्रहस्थ जीवियों, विप्रवर्ण, ब्रम्हचर्य का पालन करने वाले उपासकों और साधू संत महात्माओं ने दुष्ट चरित्र वाली पराऐ पुरुषों के साथ अनैतिक व्यभिचारिणियों और पराई स्त्रियों के साथ अनैतिक व्यभिचार करने वाले अधर्मियों के यहां भोजन प्रसाद व जलपान विलकुल ही नहीं करना चाहिए.चुंकि भोजन प्रसाद और जलपान अल्पोहार
केवल शरीर का पोषण के लिए नहीं? बल्कि प्राण आत्मा-मन और अपनी बुद्धि को भी दुष्प्रभावित करता है। अनैतिक, पथभ्रष्ट चरित्र और परस्त्री व्यभिचारी तथा पराये पुरुष के साथ व्यभिचार करने वाली व्यभिचारिणी औरतों से उत्पन्न संतान को वर्णसंकरित ( हाईब्रीड)यानी अन्य पुरुष से उत्पन्न हुई दोगली नश्ल संतान को कहते हैं.ऐसे अनैतिक (दुराचारी) महिला-पुरुषों के घर खानपान वर्जित माना गया है, जिसके पीछे आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपा हुआ हैं। एसे अनैतिक आचरण वाले दुराचारियों और अत्याचारियों के घर खानपान वर्जित होने के मुख्य कारण यह है कि अन्न का प्रभाव (जैसा अन्न वैसा मन): शास्त्रों में कहा गया है कि “जैसा अन्न, वैसा मन जैसा पानी वैसी वाणी जो व्यक्ति अनैतिक तरीकों से, चोरी, झूठ छल कपट विश्वासघात या व्यभिचार जैसे पापों में लिप्त रहकर धन कमाता है, उसके द्वारा कमाए गए धन से बने भोजन में नकारात्मक ऊर्जा का दुष्प्रभाव उत्पन्न होता है।चुकि ऐसी व्यभिचारिणी नव युवतियां बार-बार गर्भपात की औषधीय का उपयोग कर गर्भपात कराती हैं और एसी कुटला कर्कशा और कलमुही औरतों के हाथ का भोजन य अल्पोहार खाने से व्यक्ति की सोच और स्वभाव भी उसी के समान दुष्ट या निर्दयी और चरित्रहीन हो सकता है।
पाप का भागीदार (अशुद्धता का हस्तांतरण) के संदर्भ में गरुड़ पुराण के अनुसार, दूसरों के घरों में भोजन करने से उनके पापों का असर हमारे जीवन पर भी पड़ता है। व्यभिचार को एक गंभीर सामाजिक और आध्यात्मिक पाप माना जाता है, जो व्यक्ति की आत्मा को अशुद्ध करता है।
भोजन बनाते समय रसोइए के भाव का भोजन पर असर पड़ता है। एक व्यभिचारी या अनैतिक व्यक्ति के भाव में पवित्रता नहीं होती, इसलिए उनके हाथ का बनाया भोजन तामसिक हो जाता है, जो मन को कामोत्तेजित और मन बुद्धि को अपवित्र करता है।
जो महिला-पुरुष अनैतिकता का समर्थन करते हैं. ऐसे लोगों के घर खाना खाने का मतलब है उनके अनैतिक आचरण का समर्थन करना। यह सामाजिक और नैतिक मूल्यों के विरुद्ध है।
शास्त्रों के अनुसार वर्जित भोजन की श्रेणी (गरुड़ पुराण) के अनुसार
व्यभिचारी या अनैतिक जीवन जीने वाले व्यक्ति का भोजन।
क्रूर या निर्दयी राजा (या शासक) के यहाँ का भोजन।
चुगलखोर या विश्वासघाती व्यक्ति के यहाँ का भोजन।
नशीली चीजें बेचने वाले या व्यसनी व्यक्ति का भोजन।
पवित्रता, मानसिक शांति और आध्यात्मिक प्रगति के लिए सात्विक और सदाचारी लोगों के हाथ का बना भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। अनैतिकता से अर्जित धन या अनैतिक व्यक्ति के घर का भोजन व्यक्ति के सात्विक गुणों का नाश कर देता है।
पंडित सुरेश पांडेय से जानिए शास्त्रों में सात्विक भोजन का महत्व और कैसे बढ़ेगी i
धोखेबाज कपटी धूर्त चोर चुगलखोर भ्रष्टाचारी और रण्डीबाज की संगत से सदैव बचके रहना चाहिए
यह एक अत्यंत व्यावहारिक और नैतिक सलाह है। दुष्ट, अनैतिक और चरित्रहीन लोगों की संगति का सीधा असर हमारे व्यक्तित्व, मान-सम्मान और भविष्य पर पड़ता है.
ऐसे लोगों की संगत से बचने के पीछे मुख्य कारण ये हैं:
चरित्र पर प्रभाव: कहावत है, “जैसा संग, वैसा रंग।” कुसंगति धीरे-धीरे आपके अच्छे विचारों को भी नष्ट कर देती है. दोगले दोमुहे के हाथ का जलपान करने से विश्वासघात का खतरा बढता है. धोखेबाज और धूर्त लोग अपने फायदे के लिए कभी भी आपको किसी झूठे मनगढंत और बेबुनियाद प्रकरण में फंसा सकते हैं?
मान-हानि: भ्रष्टाचारी या चरित्रहीन लोगों के साथ उठने-बैठने से समाज में आपकी अपनी छवि भी खराब होती है. और उनकी संगत और खानपान से
नैतिक पतन का खतरा बढता है. ऐसे लोगों की संगत में सही और गलत का अंतर मिटने लगता है.
विदुर नीति और अन्य नीतिशास्त्रों में भी सज्जन लोगों की संगति (सत्संगति) करने और दुष्टों से दूर रहने की सलाह दी गई है, क्योंकि संगति ही इंसान को ऊंचा उठाती है या गिराती है.
पंच्चशील नियमों का पालन
सर्व विदित है कि महात्मा सिद्धार्थ गौतम बुद्ध द्धारा निर्मित पंच्चशील नियमों मे भी झूठ बोलना,नशा पान और पर पुरुष गमन और पर स्त्री गमन का त्याग पर जोर दिया है.
सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-
उपरोक्त लेख समाचार सामान्य ज्ञान पर अधारित सत्य सनातन हिन्दू धर्म को मानने और अपनाने वाले विद्धान ग्रहस्थ जीवी सनातनी हिन्दुओं के लिए है.उपरोक्त लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं आहत पंहुचाना हमारा उद्देश्य नहीं? अपितु अपने अपने धर्म सांस्कृतिक की मर्यादाओं का पालन करने से मनुष्य का जीवनकाल धन्य हो जाएगा.
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