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(भाग-38) श्रीमद-भगवद गीता के माध्यम से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त की जा सकती है

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श्रीमद्भागवत गीता में मस्तिष्क प्रबंधन का सिद्धांत आसान तरीके से समझाया गया है। इसे साधारण तरीके से समझ कर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त की जा सकती है।

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आधुनिक समय में श्रीमद्भगवद्गीता की महत्वता बढ़ती ही जा रही है, क्योंकि जैसे-जैसे भौतिक उन्नति हो रही है, वैसे वैसे लोगों की जिंदगी में तनाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में मस्तिष्क प्रबंधन होना अति आवश्यक है। इस लेख में हम श्रीमद्भागवत गीता में मौजूद माइंड मैनेजमेंट (mind management the science of Shrimad Bhagwat Geeta) की तकनीक पर ही विस्तार से चर्चा करेंगे और जानेंगे कि किस प्रकार से हम हमारे माइंड को व्यवस्थित रूप से कंट्रोल कर के भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति आसानी से कर सकते हैं।

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शुरुआत श्रीमद भगवत गीता के इस श्लोक से-

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥16॥

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि अर्जुन यह शरीर अनित्य एवं चिरस्थायित्व नहीं है और शाश्वत आत्मा का कभी अन्त नहीं होता है। तत्त्वदर्शियों द्वारा भी इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन करने के पश्चात निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर इस यथार्थ की पुष्टि की गई है। अब सोचने एवं समझने वाली बात यह है कि जब शरीर अनित्य है आत्मा ही स्थिर है और नित्य है तो फिर तनाव किस बात का, भविष्य के प्रति डर, चिंता क्यों? जिस प्रकार से हमें सदैव भय रहता है कि कहीं कुछ गलत ना हो जाए या हमारे साथ कुछ अहित ना हो जाए, उस संबंध में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥17॥

जो पूरे शरीर में व्याप्त है, उसे ही तुम अविनाशी समझो। उस अनश्वर आत्मा को नष्ट करने मे कोई भी समर्थ नहीं है।

हम कौन हैं? यह जानने से क्या लाभ मिलेगा? कठोपनिषद इस बारे में क्या कहता है,

दोनों श्लोक से समझिए माइंड मैनेजमेंट की प्रक्रिया

इन दोनों श्लोकों के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण आत्मा एवं शरीर के मध्य भेद को बताते हैं। आत्मा शरीर में व्याप्त है, श्रीकृष्ण शरीर और आत्मा के बीच के संबंध का निरूपण कर रहे हैं। इससे उनका तात्पर्य क्या है? आत्मा चेतन है अर्थात चैतन्य स्वरूप है। शरीर जड़ पदार्थों से निर्मित और चेतना रहित होता है। जबकि आत्मा अपनी चेतन शक्ति को शरीर में संचारित करने के साथ पूरे शरीर में वास करती है। इस प्रकार आत्मा शरीर में व्याप्त रहकर पूरे शरीर को सचेतन बनाती है। कुछ लोग शरीर में आत्मा के निवास स्थान के संबंध में प्रश्न करते हैं। वेदों में वर्णन किया गया है कि आत्मा हृदय में वास करती है।

डर, भय चिंता शोक से इस प्रकार बाहर निकले

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥25॥

हमें सदैव इस बात का डर रहता है कि यह जीवन खत्म हो गया तो क्या होगा? इसके संबंध में श्रीमद भगवत गीता का श्लोक बहुत कुछ बताता है, इस श्लोक में आत्मा को अदृश्य, अचिंतनीय और अपरिवर्तनशील कहा गया है। यह जानकर हमें शरीर के लिए शोक प्रकट नहीं करना चाहिए।

भगवान श्री राम के दाएं लक्ष्मण जी और बाएं सीता जी क्यों? शरीर एवं कर्म विज्ञान से जुड़ा है इसका रहस्य

“धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र समवेता युयुत्सव। मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सजंय।।” गीता के इस श्लोक का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक रहस्य किस प्रकार हासिल करें भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलता मिल सकती है

श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 2 के आखरी के श्लोकों में माइंड मैनेजमेंट की तकनीक बहुत ही स्पष्ट तरीके से बताई गई है शरीर से लेकर आत्मा तक का निरूपण बहुत ही सुंदर तरीके से किया गया है जिन्हें जानकर हम अपना माइंड कंट्रोल कर सकते हैं एवं इसका सही उपयोग कर सकते हैं, इन श्लोकों से समझिए पूरी बात:-

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥42॥

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं और इन्द्रियों से उत्तम मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि और आत्मा बुद्धि से भी परे है।

निम्न तत्त्व को उसके श्रेष्ठ तत्त्व से नियंत्रित (mind management the science of Shrimad Bhagwat Geeta) किया जा सकता है। श्रीकृष्ण मनुष्य को भगवान द्वारा प्रदत्त अवयवों के मध्य श्रेष्ठता के वर्गीकरण को व्यक्त कर रहे हैं। वे वर्णन करते हैं कि शरीर जड़ पदार्थों से निर्मित है और इससे श्रेष्ठ पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके विषयों को स्वाद, स्पर्श, रूप, गंध और शब्द के बोध से ग्रहण किया जाता है। इन्द्रियों से उत्तम मन और मन से श्रेष्ठ बुद्धि है जिसकी सहायता से हम विभिन्न पदार्थों में भेद करने के योग्य होते हैं किन्तु आत्मा बुद्धि से भी परे है।

इस अध्याय के अंतिम श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के मध्य क्रमानुसार श्रेष्ठता के इस ज्ञान का प्रयोग हमें काम वासना को जड़ से उखाड़ने के लिए करना चाहिए।

एवं बुद्धः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।

जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥43॥

इस प्रकार हे महाबाहु! आत्मा को लौकिक बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर संयम रखो और आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी दुर्जेय शत्रु का दमन करो

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