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(भाग-44) भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को मोह और धर्म संकट की दुविधा निवारणार्थ करते है समाधान

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✍️टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

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भगवत गीता के दूसरे अध्याय को आसान शब्दों में समझते हैं, हमने पहले अध्याय में अर्जुनविषादयोग अर्थात अर्जुन के विषाद, उनके दुख, उनकी दुविधा के बारे में जाना था, इस अध्याय में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन की इस दुविधा का उत्तर दिया जाता है और इस अध्याय का नाम सांख्य योग है।
इस अध्याय में अर्जुन की कायरता और उनके भ्रम को लेकर विश्लेषण है और यहीं से उस ज्ञान की शुरुआत होती है, जिसके लिए भगवत गीता को दुनिया का महान ग्रंथ और ज्ञान का भंडार माना जाता है।

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संजय उवाच

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच णा

अंहंकार से भरे हुए और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त अर्जुन को भगवान देखते हैं। अर्जुन दुख से घिरा हुआ है और उनकी आशा भी ख़त्म हो चुकी है, साथ ही साथ हिम्मत भी टूट चुकी है और ऐसे में श्री कृष्ण उन्हें समझाना शुरू करते हैं, जहाँ युद्ध का वर्णन होना चाहिए था, वहां दुख और विषाद का माहौल है।
अर्जुन की आँखों में आसूं और मन में निराशा है, यह एक बहुत बड़ी हैरानी की बात थी और धृतराष्ट्र और संजय इसकी आशा बिलकुल भी नहीं कर रहे थे और अर्जुन का दुख देखकर श्रीकृष्ण उनका उत्तर देने के लिए तैयार होते हैं।

श्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम्‌ कीर्तिकरमर्जुन ।।2.2।।

श्री कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन ! तुम्हें इस समय, असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ, क्योंकि न तो ये श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा आचरित है, न स्वर्ग देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है, युद्ध के समय ऐसी शंका, ये तो असमय है।
दोस्तों, इस तरह अपने शत्रु के प्रति मोह दिखाने का काम अर्जुन जैसे योद्धा किस प्रकार कर सकते हैं, अपने कर्म से मुँह मोड़कर किसी मोह या किसी और कारण से यदि हम हताश बैठ जायें, तो वह ठीक नहीं है, इससे कभी कोई लाभ नहीं होता।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ।।2.3।।

यहाँ श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं, हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, अगर तुम युद्ध में आए हो तो युद्ध करो, ऐसे डरो मत और तुम्हारे जैसे धनुर्धर के लिए यह सब ठीक नहीं है, यह सही नहीं है की इस तरह से मन की कमज़ोरी दिखाओ।
दोस्तों, श्रीकृष्ण यहाँ नपुंसकता का अर्थ शक्तिहीनता, कमज़ोर हो जाना और युद्ध से मुँह मोड़ लेने वाली बात कर रहें हैं अर्थात जो धर्म कहता है, उसके अनुसार तो कर्म करना ही चाहिए और स्वयं को कमज़ोर मान कर कार्य को छोड़ देना यह सही नहीं है।
बुरे समय में जब हमें भी आशंका सताए तो यही बात हमें याद रखनी चाहिए कि मन की दुर्बलता छोड़कर हमें उस कर्म के बारे में सोचना चाहिए जो हम करने के लिए आये हैं।

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।।2.4।।

अर्जुन अपनी शंका के बारे में कहते हैं, हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँ, जिनसे मैंने सब कुछ सीखा है, जो मेरे लिए सबसे बड़े हैं, उनपर मैं कैसे बाण चला सकता हूँ?
दोस्तों, यहाँ पर अर्जुन का कहना है, क्या यह सुनने में गलत नहीं लगता है कि जिनसे उन्होंने अपने जीवन में सब कुछ सीखा है, उन पर वे बाण कैसे चला सकते हैं, लेकिन युद्ध का तो यही कार्य है।
बाण शत्रु और अपने में भेद नहीं करता, जब वो चलता है तो प्राण लेने के इरादे से चलता है, जिसे करने में अर्जुन इस समय असफल हो रहें हैं।

गुरूनहत्वा हि महानुभावा ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌ ।।2.5।।

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