जितना दुष्प्रचार घृणा और नफरत फैलाएंगे : हिंदू धर्म उतना ही मजबूत होगा
टेकचंद्र शास्त्री:
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विदेशी आक्रान्ताओं के समर्थक वर्णसंकरित वामपंथी लोग सनातनी हिन्दू धर्म का जितना अधिक से अधिक दुष्प्रचार घृणा और नफ़रत फैलाते रहेंगे. उतना ही सनातनी हिन्दू धर्म संगठित और मजबूती से आगे बढते रहेगा.चुंकि सनातनी हिन्दू धर्म अत्यधिक प्राचीनतम धर्म है.
हिन्दू सनातन धर्म के इतिहास और दर्शन को देखने पर यह बात सच प्रतीत होती है कि जब-जब इस पर बाहरी आघात या दुष्प्रचार हुए हैं, तब-तब यह धर्म और अधिक मजबूती के साथ उभरकर सामने आया है।इसका साक्षात इतिहास गवाह है कि विपरीत परिस्थितियों और आलोचनाओं ने सनातन धर्म को नष्ट करने के बजाय इसके अनुयायियों को अपने धर्म के प्रति अधिक जागरूक और एकजुट संगठित किया है।
इस दृष्टिकोण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
आत्म-मंथन और सुधार मे बृद्धियां हूई है.आलोचनाएं और दुष्प्रचार अक्सर समाज को अपनी कमियों की समीक्षा करने और आवश्यक सामाजिक सुधार करने का अवसर प्रदान करता हैं। हिन्दू धर्म के अनुयायियों मे अपने नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ रही है. जब सनातन धर्म पर सवाल उठाए जाते हैं, तो इसके अनुयायी अपने प्राचीन ग्रंथों, दर्शन और जीवन मूल्यों का गहराई से अध्ययन करते हैं, जिससे उनका विश्वास और प्रगाढ़ होता है।
प्रतिकूल परिस्थितियों में लचीलापन दूर हो रहा है. सनातन धर्म की प्रकृति अत्यंत समावेशी और लचीली है। यह किसी भी नकारात्मक प्रचार के दबाव में टूटने के बजाय नए विचारों को आत्मसात करके और अधिक लचीला और मजबूत बन जाता है।
बाहरी हमलों या नफरत के माहौल में समाज अपने मतभेदों को भुलाकर अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अधिक संगठित हो जाता है।
यह एक निरंतर चलने वाली सामाजिक और दार्शनिक प्रक्रिया है, जो चुनौतियों के माध्यम से सनातन धर्म की आंतरिक शक्ति को उजागर करती है।
वैदिक सनातन हिन्दू अत्याधिक प्राचीनतम धर्म है
वैदिक सनातन हिन्दू धर्म वास्तव में विश्व के सबसे प्राचीन और निरंतर जीवित धर्मों में से एक है। इसे ‘सनातन’ कहा जाता है क्योंकि इसका अर्थ है ‘शाश्वत’ या ‘निरंतर’—जिसका कोई आदि (शुरुआत) और अंत नहीं है। यह केवल एक मत या पंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पद्धति है।
इस धर्म की प्राचीनता और इसके मूल सिद्धांतों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
वेदों की महिमा: हिन्दू धर्म के मूल आधार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) हैं। इन्हें अनादि और ज्ञान का सर्वोच्च स्त्रोत माना जाता है। इतिहासकार इसे वैदिक काल से जोड़ते हैं, वहीं भारतीय मान्यता के अनुसार यह ज्ञान सदियों तक मौखिक परंपरा (गुरु-शिष्य परंपरा) से आगे बढ़ता रहा।
पुरातात्विक साक्ष्य: सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग २५००-१५०० ईसा पूर्व) के दौरान प्राप्त मुहरों पर ‘पशुपति शिव’ की आकृति, यज्ञ कुंड, और स्वास्तिक के चिन्ह इसके प्राचीन अस्तित्व को प्रमाणित करते हैं।
एकेश्वरवाद और दर्शन: यद्यपि इसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन इसका मूल दर्शन एकेश्वरवादी है — “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” अर्थात सत्य एक है, जिसे विद्वान अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।
कर्म और मोक्ष का सिद्धांत: यह धर्म कर्म के सिद्धांत (कर्मफल) और आत्मा की अमरता पर आधारित है। इसका परम उद्देश्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करना है।
सनातन धर्म किसी एक पैगंबर या संस्थापक पर आधारित नहीं है, बल्कि यह ऋषियों और मुनियों द्वारा खोजे गए शाश्वत आध्यात्मिक नियमों और प्राकृतिक सत्य पर टिका हुआ है। यह संपूर्ण मानवता, प्रकृति के सम्मान और “वसुधैव कुटुंबकम्” (संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है) के आदर्श वाक्य पर जोर देता है
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