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महादेव के माथे पर चंद्रमा होना शिव-शक्ति संतुलन का अद्भुत रहस्य

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महादेव के माथे पर चंद्रमा होना शिव-शक्ति संतुलन का अद्भुत रहस्य

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टेकचंद्र शास्त्री:

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9822550220

 

सनातन धर्म के अनुसार भगवान शिव को देवों का देव महादेव कहा जाता है। माना जाता है कि भगवान शिव का स्वरूप जितना ज्यादा अद्वितीय है, उतना ही रहस्यमयी भी है। भगवान शिव जिन भी चीजों से खुद को सुसज्जित करते हैं, वो भिन्न हैं। जैसे भगवान शिव गले में सर्प, शरीर में भस्म, जटाओं में गंगा और मस्तक पर त्रिनेत्र, यह सभी महादेव के स्वरूप को दिव्य और अद्वितीय बनाते हैं। इस तरह से भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा का स्वरूप और स्थान बिल्कुल अलग है।

चंद्रमा महादेव के मस्तक की शोभा को बढ़ाते हैं और इससे उनको चंद्रशेखर का रूप प्रदान करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक के बाईं ओर क्यों स्थित है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि चंद्रमा का मस्तक पर विराजमान होने के लिए ये विशेष स्थान क्यों सुसज्जित किया गया।

भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा कैसे हुए विराजमान

पुराणों के मुताबिक समुद्र मंथन से निकला विष जब भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया, तो शंकर जी की जटाओं से निकलने वाली उग्र गर्मी को शीतलता प्रदान करने के लिए चंद्रमा ने उनके मस्तक पर स्थान लिया। इसी वजह से आज भी चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं और भगवान शिव की शोभा को बढ़ा रहे हैं। चंद्रमा शांति, मानसिक संतुलन और शीतलता का प्रतीक होते हैं, जोकि भगवान शिव के उग्र रूप को संतुलित करते हैं।

चंद्रमा और शिव का संबंध

ज्योतिष में चंद्रमा को भावनाओं, मन, सौंदर्य और शीतलता का प्रतीक माना जाता है। वहीं भगवान शिव वैराग्य, तपस्या और कठोर साधाना के प्रतीक हैं। ऐसे में जब भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित होता है, तो दोनों ऊर्जाओं को संतुलित करने में मदद मिलती है और शिव और चंद्रमा एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। शिव को कठोरता और चंद्रमा को कोमलता से जोड़ा जाता है। दोनों का संतुलन कठोरता में कोमलता और वैराग्य में शीतलता को दर्शाता है। यह स्थिति हमें संदेश देती है कि जीवन में वैराग्य और तपस्या जरूरी है, लेकिन करुणा और भावनाओं का भी उतना ही महत्व है

 

शिव के मस्तक के बाईं ओर क्यों वास करते हैं चंद्रमा

ज्योतिष की मानें, तो मनुष्य का शरीर एक तरह का ब्रह्मांड है, जिसके दो पक्ष हैं- दाहिना और बायां पक्ष। दाहिना पक्ष पुरुष तत्व, पिंगला नाड़ी और सूर्य का प्रतीक है। तो बायां पक्ष स्त्री तत्व, चंद्रमा और इड़ा नाड़ी का प्रतीक होता है। भगवान शिव के मस्तक पर बाईं ओर विराजमान चंद्रमा इस बात का प्रतीक है कि चंद्रमा स्त्री तत्व और भावनात्मक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। क्योंकि बायां भाग इड़ा नाड़ी का स्थान होता है, जोकि ठंडक, शांति और मानसिक स्थिरता का प्रदान करता है, इसलिए चंद्रमा को भगवान शिव के मस्तक के बाएं हिस्से में स्थान मिला।

पौराणिक दृष्टि से चंद्रमा को मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह से भगवान शिव के बाएं हिस्से में मां पार्वती का पास होता है और जिसको अर्धनारीश्वर स्वरूप में देखा जाता है। जब भगवान शिव के बाएं ओर मां पार्वती विराजमान रहती हैं, तो चंद्रमा का भी इस स्थान पर होना स्वाभाविक है। यह दिखाता है कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं।

वहीं भगवान शिव का स्वरूप उग्र और तप्त माना जाता है। क्योंकि उन्होंने गले में विष धारण किया है, त्रिनेत्र में अग्नि है और वह तांडव के संहारक हैं। ऐसे में चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक को शीतलता प्रदान करता है। अगर यह शीतल न हो तो भगवान शिव का तेज और भी प्रचंड हो सकता है। इसलिए चंद्रमा को शिव मस्तक के बाईं ओर रखकर उनके संतुलन को साधा गया है

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