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(भाग-50) परिवर्तनशील संसार मे परम् पिता परमात्मा के शिवाय यहां कोई किसी का नहीं है

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श्रीमद-भगवद गीता के अनुसार परिवर्तन ही संसार का नियम है इस बात से बस वही असहमत हो सकता है जिसमे सोचने और समझने की क्षमता ना हो. जब से मनुष्य का जन्म होता है तब से वो अपने आस पास अगर कुछ देखता है तो वो परिवर्तन के सिवा और कुछ नहीं होता. तो इस बात से असहमति का तो प्रश्न ही नहीं उठता की परिवर्तन ही संसार का नियम है
इस संसार में कुछ भी अपरिवर्तनशील नहीं है। सब कुछ नश्वर और क्षणभंगुर है। परिवर्तन ही संसार का नियम है जो परिवर्तन को और अनित्यता को समझता है, वस्तुत: वही ज्ञानी है। जीव, जगत और ब्रह्म को सही तरीके से परिभाषित करने की क्षमता भी ज्ञानी-ध्यानी, ऋषि-मुनियों में ही होती है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में संदेश देते हैं कि इस अनित्य जगत में देह को पाकर मनुष्य को इसे समझते हुए विषय-वासनाओं के दलदल में नहीं फंसना चाहिए।
ज्ञानी ही है, जो ऋतुओं के अनुकूल यज्ञ को सफल कर लेता है। ज्ञानी ही है, जो बाधाओं में व्यवधानों में मार्ग ढूंढ़ निकालता है। मनुष्य को पीड़ा तभी होती है, जब उसके जीवन में परमात्मा नहीं होता है। प्रसन्नता और आनंद परमात्मा की उपस्थिति का आभास है। दुनिया के पीछे भागने से बढ़िया है कि हम दुनिया के मालिक परमेश्वर के पीछे भागें, उसकी शरण में स्वयं को उसके श्रीचरणों में समर्पित करें और यह भाव रखें कि यह सब कुछ जो हमें मिला है। वह उसकी कृपा के कारण संभव हो सका है।
यदि जीवन में ज्ञान उतर आए, तो छह संपदाएं स्वत: प्राप्त हो जाती हैं। शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा और समाधान। शम है- सब तरह की शांति। दम का तात्पर्य इंद्रिय संयम से है। तितिक्षा है- द्वंद्व सहन करना, उपरति है- विषयों के प्रति आसक्ति न होना। श्रद्धा का मतलब है- सत्य से प्रगाढ़ प्रेम। जबकि समाधान है-समाधि, और सत्य का दर्शन।
भारत की संस्कृति में विचारों, कर्म अध्यायों की इतनी सुन्दर व्याख्या है कि दुनिया की किसी अन्य संस्कृति से इसकी तुलना नहीं हो सकती. ज्ञात तथ्यों के आधार पर यदि कहा जाय तो किसी कार्य के तीन आयाम होते हैं, जो क्रमशः मन, वचन और कर्म की यात्रा करते हुए अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते हैं. उदाहरणार्थ यदि किसी छोटे बच्चे को विद्यालय भेजने का समय है तो सर्वप्रथम यह विचार हमारे मन में पनपता है, तत्पश्चात हम अपनी वाणी द्वारा घरवालों को, उस बच्चे को अपनी बात बताते हैं, अपने विचार से अवगत कराते हैं और तब आखिर में उस बच्चे का दाखिला सम्बंधित विद्यालय में होता है. लेकिन जरा सोचिये, यदि यह बात हमारे मन में ही दबी रह जाय तो… !! अथवा हम इसे बस विचार के रूप में प्रतिष्ठित करके इतिश्री कर लें तो … !! निश्चित रूप से हमारा कार्य उस स्थिति में सफल अथवा पूरा नहीं कहा जा सकता है
आज कल उन तमाम बातों पर बेहद संकुचित दायरे में पुनर्चर्चा शुरू हो रही है या शुरू की जा रही है, जिन बातों पर आम जनमानस की अगाध श्रद्धा रही है. यह अलग बात है कि महान भारतीय विचारों के कई मर्मज्ञ अपनी चारित्रिक निष्ठा को लेकर इस काल में संदिग्ध साबित हो रहे हैं. सदियों से भगवदगीता के नाम से कोई अनजान नहीं है. इस ग्रन्थ को यदि सर्वाधिक प्रतिष्ठित ग्रन्थ कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. धर्म की कठोर, मगर व्यवहारिकता के साथ स्पष्ट व्याख्या करने वाला ऐसा महाग्रन्थ, जिसके बारे में कहा गया है कि यदि तराजू के एक पलड़े पर समस्त वेद, शास्त्र रख दिए जाएँ तो भी भगवद्गीता की महिमा उन सभी ग्रंथों से ज्यादा ही होगी. यूं तो गीता के प्रत्येक अध्याय में मानव जीवन की तमाम दुविधाओं का निराकरण है, किन्तु उसकी जो सीख सर्वाधिक प्रभावित करने वाली है, वह है ‘परिवर्तन संसार का अटल नियम है’. जो आज है कल वह नहीं होगा, कल कुछ और होगा और इस तरह से यह श्रृंखला अनंत रूप से अनादिकाल तक चलती रहने वाली है. दिलचस्प यह भी है कि दुनिया में कोई भी सिद्धांत तभी मान्यता प्राप्त करता है, जब वह सिद्धांत समय की कसौटी पर खरा उतर सके. कहने को तो कई ‘आदर्शवादी सिद्धांत’ इस विश्व में उत्पन्न हुए, किन्तु व्यवहारिकता के अभाव में उन पर उठ रहे प्रश्नों का निराकरण न करने से वह समय की धारा में लुप्त हो गए! गीता के परिवर्तनशील सिद्धांत को समय ने अपनी कसौटी पर कई बार कसा है, और हर बार वह उतना ही खरा उतरा है.

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समय के साथ इस पर सवाल भी उठे हैं और सवाल उठाना जरूरी इसलिए भी है, क्योंकि लाखों लोगों की भीड़ में गीता के मर्म की व्याख्या करने वाले कई विशेषज्ञ, उन्हें आप संत कह लें या कुछ और आज सलाखों के पीछे पड़े हैं. आखिर क्यों? तर्क यह भी दिया जा सकता है कि गीता को ये लोग जानते तक नहीं, सिर्फ दिखावा करते हैं. वैसे यह सच ही है कि यह लोग गीता को मानने और समझने की बजाय सिर्फ उसकी क्रेडिबिलिटी को कैश कराने में ज्यादा यकीन करते रहे हैं. मार्केटिंग के दौर में गीता जैसा पवित्र ग्रन्थ भी अछूता नहीं बचा है. एक से एक सजावटी पुस्तकें, जिनकी जिल्दें और फ्रेम्स आपको किसी महँगी पेंटिंग का अहसास कराएंगी, वह वर्ग विशेष के ड्राइंग हाल में या कार की डैशबोर्ड पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही होंगी, बेशक उस किताब को कभी खोला तक न गया हो.

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उद्धृत करना थोड़ा अजीब होगा, किन्तु गीता तो इस मामले में बहुत पहले से प्रचलन में रही है. आज़ादी के काल में महात्मा गांधी इसको अपने हाथ में लेकर घुमते थे तो वर्तमान प्रधानमंत्री ने इसे कई अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों को भेंट किया है. पिछले दिनों इसके ‘राष्ट्रीय ग्रन्थ’ बनाने का प्रश्न जोर शोर से उठा था, किन्तु जिस ग्रन्थ के सिद्धांत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रतिष्ठित हों, उसे राष्ट्रीय-ग्रन्थ की मान्यता देने की बात कहने से सिवाय विवाद के आखिर क्या हासिल हो जायेगा? खैर यह बात अपनी जगह है, किन्तु विवाद से परे हटकर देखें तो जब कभी कर्म की बात होगी तो सबसे पहले गीता का ही स्मरण होगा. गीता अपने प्रथम क्षण से ही धर्म, जाति, क्षेत्र, सम्प्रदाय से ऊपर होकर सभी के लिए है इसलिए इसकी अंतरराष्ट्रीय मान्यता सर्वत्र स्वीकृत है. अनेक विदेशी विद्वानों तक ने गीता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है. यहाँ तक कि जर्मनी जैसे देश में संस्कृत और गीता को जानने वाले बहुत हैं, क्योकि गीता कर्म की बात करते हुए ‘फल’ की चिंता न करने का उपदेश देती है. गीताकार ने स्पष्ट कहा है
श्रीमद्भागवत गीता श्लोक-

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदॢशभि।।

अनुवाद और तात्पर्य : तत्वदॢशयों ने निष्कर्ष निकाला है कि भौतिक शरीर का तो कोई चिरस्थायित्व नहीं है किन्तु सत् (आत्मा) अपरिवर्तित रहता है। उन्होंने इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है।

परिवर्तनशील शरीर का कोई स्थायित्व नहीं है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी यह स्वीकार किया है कि विभिन्न कोशिकाओं की क्रिया प्रतिक्रिया द्वारा शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है। इस तरह शरीर में वृद्धि तथा वृद्धावस्था आती रहती है किन्तु शरीर तथा मन में निरंतर परिवर्तन होने पर भी आत्मा स्थायी रहता है। यही पदार्थ तथा आत्मा का अंतर है।

स्वभावत: शरीर नित्य परिवर्तनशील है और आत्मा शाश्वत है। तत्वदृशयों ने चाहे वे निवशेषवादी हों या सगुणवादी, इस निष्कर्ष की स्थापना की है। विष्णु-पुराण में (2.12.38) कहा गया है कि विष्णु तथा उनके धाम स्वयं प्रकाश से प्रकाशित हैं (ज्योतिषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु:)। सत तथा असत शब्द आत्मा तथा भौतिक पदार्थ के ही द्योतक हैं। सभी तत्वदृश्यों की यह स्थापना है। यहीं से भगवान द्वारा अज्ञान से मोहग्रस्त जीवों को उपदेश देने का शुभारंभ होता है। (क्रमश

सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-
उपरोक्त लेख श्रीमद-भगवद गीता सार एवं अनेक संत महात्माओं के प्रवचनों से संकलन किया है। आध्यात्म प्रेमियों को सामान्य आध्यात्मिक ज्ञानार्जन के उद्देश्य से प्रस्तुत है।

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