भाग:186) महात्मा सिद्धार्थ गौतम को बुद्धत्व का ज्ञान प्राप्त हुआ इसलिए वे भगवान बुद्ध कहलाए
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट
बौधगया । महात्मा सिद्धार्थ गौतम को बुद्धत्व कि प्राप्ति हुई, इसलिए वे भगवान बुद्ध कहलाए। इसका मतलब उन्होंने दुःख के बारें में चिंतन-मनन किया, प्रयोग किये उसके बाद उनको जो दुःख मुक्ति का मार्ग ढूंढ निकाला (अरिय अष्टांगिक मार्ग), चार अरिय सत्य, अनात्मवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद, निब्बान का सम्पूर्ण ज्ञान के खोज को ही बुद्धत्व प्राप्ति कहते हैं.
सिद्धार्थ गौतम को जो बुद्धत्व का ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसके कारण वे “बुद्ध” कहलाए,
जो ज्ञान उन्हें प्राप्त हुआ, सीधी सी भाषा में बस इतना ही है :इस संसार में सभी दु:खी है और सुखी कोई नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि दु:ख को दु:ख के रूप में स्वीकार किया जाए। एक बार स्वीकार कर लिया जाए कि दु:ख है : तो फिर उसका कारण, उसका निदान, उस से बचने के उपाय इत्यादि के बारे में सोचा जा सकता है। फिलहाल तो हमारा हाल बिल्कुल इस जानवर जैसा ही है ।हमने इन माया मोह बंधनों को स्वीकार किया हुआ है।
मतलब : हम मानते ही नही कि हम बंधे हुए है।सिद्धार्थ गौतम को जो ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसके कारण वे “बुद्ध” कहलाए, वह ज्ञान क्या है? सिद्धार्थ गौतम को जो ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसके कारण वे “बुद्ध” कहलाए, वह ज्ञान क्या है? सिद्धार्थ गौतम को “मोक्ष” का ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसके कारण वे “बुद्ध” कहलाए। मोक्ष/कैवल्य यानी शरीर में रहते हुए भी शरीर और सांसारिक माया से अछूते रहने की अवस्था में स्थित होना। मोक्ष के बोधत्व की अवस्था प्राप्त होने पर व्यक्ति विशेष की चैतन्यता साक्षी भाव (आत्मलीन रहने की स्थिति में कायम रहने) की अवस्था में स्थिर रहती है। ऐसी अवस्था की उपलब्धि होने पर व्यक्ति अपनी इच्छा से जब तक चाहे शरीर में रह सकता है और अपनी इच्छा से शरीर को त्यागने का समय सुनिश्चित कर सकता है।
मोक्ष की अवस्था प्राप्त होने पर व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती है। वो निर्वाण लेता है, यानी सांसारिक विकार लोभ, मोह, माया, काम, क्रोध से मुक्ति पाने पर मोक्ष अवस्था की स्थिति में आत्मलीन, मौन के आनंद में पूर्ण चैतन्य अवस्था में अपने शरीर रूपी आवरण को त्यागता है। जैसे साधारण जन सांसारिक जीवन में होशपूर्वक पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र धारण करते हैं।
बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में और कुशीनगर में देह त्याग
सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी 5 महत्वपूर्ण जगह मानी जाती है। बैशाख माह की पूर्णिमा यानी 18 मई को बुद्ध जयंती मनाई जाएगी। क्योंकि इस दिन गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को हुआ था। 528 ईसा पूर्व वैशाख माह की पूर्णिमा को ही बोधगया में एक वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। माना जाता है कुशीनगर में इसी दिन उन्होंने 80 वर्ष की उम्र में देह त्याग दी थी। लगभग 2500 वर्ष पहले बुद्ध के देह त्यागने पर उनके शरीर के अवशेष (अस्थियां) आठ भागों में विभाजित हुए। जिन पर आठ स्थानों पर 8 स्तूप बनाए गए। 1 स्तूप उनकी राख और एक स्तूप उस घड़े पर बना था जिसमें अस्थियां रखी थीं। नेपाल में कपिलवस्तु के स्तूप में रखी अस्थियों के बारे में माना जाता है कि वह गौतमबुद्ध की हैं। इसके अलावा उनके जीवन से जुड़ी 5 महत्वपूर्ण जगहें और हैं।
1. लुम्बिनी
उत्तर प्रदेश के ककराहा गांव से 14 मील और नेपाल-भारत सीमा से कुछ दूर पर बना रुमिनोदेई नामक गांव ही लुम्बिनी है, जो गौतम बुद्ध के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है
2. बोधगया
यह स्थान बिहार के प्रमुख हिंदू पितृ तीर्थ \’गया\’ में स्थित है। गया एक जिला है। इसी स्थान पर बुद्ध ने एक वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया।
3. सारनाथ
यह जगह उत्तरप्रदेश के वाराणसी के पास स्थित है, जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना पहला उपदेश दिया था। यहीं से उन्होंने धम्मचक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया था
4. कुशीनगर
उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले में स्थित इसी जगह पर महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण (मोक्ष) हुआ था। गोरखपुर जिले में कसिया नामक जगह ही प्राचीन कुशीनगर है। यहां पर बुद्ध के आठ स्तूपों में से एक स्तूप बना है, जहां बुद्ध की अस्थियां रखी थीं
5. श्रावस्ती का स्तूप
बहराइच से 15 किमी दूर सहेठ-महेठ नामक गांव ही प्राचीन श्रावस्ती है। बुद्ध लंबे समय तक श्रावस्ती में रहे। कहा जाता है कि इस स्थान पर 27 सालों तक भगवान बुद्ध रहे थे। यहां भगवान बुद्ध ने नास्तिकों को सही दिशा दिखाने के लिए कई चमत्कार किए। इन चमत्कारों में बुद्ध ने अपने कई रूपों के दर्शन करवाए। अब यहां बौद्ध धर्मशाला है तथा बौद्ध मठ और भगवान बुद्ध का मंदिर भी है।
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