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त्रिशूल धनुष-बाण धारी पंचमुखी हनुमान मंदिर में छिपा युद्ध का रहस्य

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त्रिशूल धनुष-बाण धारी पंचमुखी ‘हनुमान मंदिर में छिपा युद्ध का रहस्य

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:

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9822550220

 

चित्रकूट। चित्रकूट के पंचमुखी हनुमान मंदिर में हनुमानजी महाराज के हाथ में गदा नहीं, धनुष-बाण धारण किए हैं ‘हनुमान’! इस मंदिर में छिपा है शत्रुघ्न और लवणासुर युद्ध का त्रेतायुगीन रहस्य

महावीर हनुमान मंदिर का इतिहास त्रेतायुग से जुड़ा है. यहां श्री राम के अनुज शत्रुघ्न की मूर्ति धनुष-बाण लिए विराजमान है. यह मंदिर लवकुश नगर में स्थित है और महावीर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है.

आज हम आपको एक ऐसे पंचमुखी हनुमान मंदिर की कहानी बताने जा रहे हैं जिनका इतिहास त्रेतायुग से बताया गया है. किंवदंती है कि इस मंदिर में श्री राम के अनुज शत्रुघ्न ही महावीर के रुप में विराजमान हैं. इसलिए यहां हनुमान जी की मूर्ति गदा नहीं धनुष-बाण लिए है. यह मूर्ति भी एक चट्टान से प्रकट बताई जाती है.

मां बंबरबेनी लवकुश नगर समिति के सदस्य और पूर्व मुख्य नगरपालिका अधिकारी मातादीन विश्वकर्मा लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं लवकुश नगर शहर का इतिहास माता बंबरबेनी से जुड़ा है. दरअसल, माता बंबरबेनी मां सीता ही थीं. रामायण में वाल्मीकि आश्रम चित्रकूट बताया जाता है. और यह जगह चित्रकूट से 150 किमी दूर है. यहां भी वाल्मीकि आश्रम का परिसर आता था. यहां मां बंबरबेनी पहाड़ी है. जहां साधु-संत, ऋषि मुनि तपस्या करते रहते थे लेकिन इसी पहाड़ी के सामने एक और पहाड़ी है जहां पर लवणासुर नाम का राक्षस रहता था. यह राक्षस आए दिन साधु-संत की तपस्या और यज्ञ हवन-पूजन में बाधा डालता रहता था.

साधु-संत ने ली रामजी की शरण

फिर एक दिन सभी ऋषि मुनि और साधु-संत प्रभु श्री राम की शरण में गए. प्रभु श्री राम जी उन्हें आश्वासन दिया कि निश्चिंत होकर अपनी तपस्या कीजिए. लवणासुर के वध के लिए मैं अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को भेजता हूं. जैसे ही शत्रुघ्न को जानकारी दी जाती है वह लवणासुर का वध करने के लिए निकल पड़ते हैं.

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लवणासुर का किया वध

सभी ऋषि मुनि शत्रुघ्न का स्वागत करते हैं और लवणासुर की उस पहाड़ी की भी जानकारी देते हैं जहां लवणासुर रहता था. इसके बाद शत्रुघ्न और लवणासुर के बीच भीषण युद्ध होता है. जिसमें लवणासुर मारा जाता है और शत्रुघ्न की जीत होती है. सभी ऋषि मुनि और भक्त शत्रुघ्न महाराज से विनती करते हैं कि आपका इसी पहाड़ी के सामने आपको स्थापित करना चाहते हैं. इसके बाद एक बड़ी सी शिला से शत्रुघ्न महाराज की मूर्ति प्रकट होती है. जिसके बाद यहां शत्रुघ्न भगवान स्थापित कर दिए जाते हैं और कालांतर में यहां मंदिर भी बना दिया जाता है.

वहीं मंदिर के पुजारी बताते हैं कि ये मंदिर तो शत्रुघ्न भगवान का है लेकिन अब इस मंदिर को महावीर मंदिर के नाम से जाना जाने लगा है. ज्यादातर लोग इस मूर्ति को ध्यान से नहीं देखते हैं और वह हनुमान जी की मूर्ति समझ लेते हैं. जबकि इस मूर्ति में शत्रुघ्न भगवान ने गदा नहीं धनुष-बाण ले रखा है. फिर भी जो इस मूर्ति के बारे में जानते नहीं हैं तो वह इसे हनुमान मंदिर ही समझ लेते हैं.

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