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(भाग:204) वनगमन के समय निषादराज गुह का मिलन परिचय व रामायण में उनका योगदान

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भाग:204) वनगमन के समय निषादराज गुह का मिलन परिचय व रामायण में उनका योगदान

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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निषादराज गुह आदिवासी समुदाय से थे जो कौशल नगरी की सीमा पर श्रृंगवेरपुर नगरी के राजा था। वे बचपन में भगवान श्रीराम के साथ ही महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पढ़े थे व इस कारण उनके परम मित्र भी बन गये थे । जब भगवान श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास मिला था तब उनकी भेंट अपने मित्र गुह से हुई थी जिन्होंने उन्हें गंगा पार करवाने में सहायता की थी । आइये जाने निषादराज गुह का रामायण में योगदान के संबंध मे कथा।

भगवान श्रीराम को गंगा पार करवाना
जब भगवान श्रीराम को आर्य सुमंत रथ में श्रृंगवेरपुर नगर में लेकर पहुंचे तो वहां निषादराज ने उनका स्वागत किया। उन्होंने भगवान श्रीराम को अपनी नगरी का राजा बनाने का अनुरोध किया किंतु प्रभु श्री राम ने उनका राज्य । इसके बाद निषादराज गुह ने वही गंगा किनारे उनके रात्रि विश्राम का प्रबंध किया (
अगले दिन भगवान राम को गंगा पार करके प्रयागराज पहुंचना था इसलिये निषादराज ने एक केवट को बुलाकर उनको उस पार छोड़ने को कहा। वे स्वयं भी नाव में साथ बैठकर उनके साथ गए। भगवान श्रीराम ने उन्हें लौट जाने को कहा किंतु निषादराज ने उनसे कहा कि आगे रास्ता पार करवाने में वे उनकी सहायता करेंगे व जब भी श्रीराम उन्हें लौट जाने को कहेंगे तो वे लौट जायेंगे
चित्रकूट जाने में सहायता करना
इसके बाद भगवान श्रीराम ने अपने स्थायी निवास के लिए ऋषि भारद्वाज से भेंट की जिन्होंने यमुना पार चित्रकूट को उनके स्थायी निवास के लिए उचित बताया। इसके बाद निषादराज ने यमुना को पार करने के लिए एक बांस की नाव बनायीं जिसमे बैठकर श्रीराम, लक्ष्मण व माता सीता यमुना को पार कर सकते थे। तत्पश्चात श्रीराम ने निषादराज को वहां से वापस श्रृंगवेरपुर नगरी लौटकर अपना राज्य सँभालने को कहा। भगवान श्रीराम से मिले आदेश के अनुसार निषादराज वही से अपनी नगरी लौट गए।

अयोध्या वापस लौटते समय मिलन
जब श्रीराम अपने 14 वर्षों का वनवास समाप्त करके पुष्पक विमान से वापस अयोध्या लौट रहे थे तब वे निषादराज की नगरी में उससे मिलने भी आये। निषादराज भी उनके साथ अयोध्या उनका राज्याभिषेक देखने आये। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वे पुनः अपनी नगरी लौट गए।

अपने राज्याभिषेक के कुछ वर्षों के पश्चात भगवान श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ क आयोजन करवाया जिसमे उन्होंने चारों दिशाओं के राजाओं को भी आमंत्रित किया था। इसमें उन्होंने अपने मित्र निषादराज को भी बुलावा भेजा था। इसी यज्ञ में उनकी पुनः भेंट हुई थी।

निषादराज कौन थे? रामायण में उनका श्री राम जी के साथ क्या संबंध था?

रामायण को जब दूरदर्शन ने दोबारा प्रकाशित करने का निर्णय लिए तो सभी लोग बहुत खुश हुए। लग भग हर घर में रामायण देखी जा रही है। सभी किरदारों ने लोगों का दिल जीत लिए है उनमें एक एक किरदार है श्री निशादराज जी का। क्योंकि यह किरदार इतना महत्वपूर्ण था तो लोगों के अंदर इनके बारे में जानने की जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है।

निषादराज निषादों के राजा का उपनाम है। वे ऋंगवेरपुर के राजा थे, उनका नाम गुह था। निषाद समाज के थे और उन्होंने ही वनवासकाल में राम, सीता तथा लक्ष्मण को गंगा पार करवाया था। निषाद समाज आज भी इनकी पूजा करते है।

निषादराज ने प्रभु श्रीराम को गंगा पार कराया। वह श्रृंगवेरपुर के राजा थे। बनवास के बाद श्रीराम ने अपनी पहली रात अपने मित्र निषादराज के यहां बिताई।

निषादराज का महल श्रृंगवेरपुर में मौजूद है।

प्रयागराज से 40 किमी की दूरी पर है वो जगह जो राम के धरती पर आने की वजह बनी। ये जगह है गंगा किनारे बसा श्रृंगवेरपुर धाम जो ऋषि-मुनियों की तपोभूमि माना जाता है। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में बहुत गहराई के साथ किया गया है।

धर्मग्रंथों के अनुसार राम के जन्म से पहले इस धरती पर आसुरी शक्तियां अपने चरम पर पहुंच गई थीं। राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि सभी इनसे परेशान थे। ऐसे में किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। राजा दशरथ ने अपने कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ से जब इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि श्रृंगवेरपुर के श्रृंगी ऋषि ही इस समस्या से निजात दिला सकते हैं।

ऋषि श्रृंगी त्रेता युग में एक बहुत बड़े तपस्वी थे। जिनकी ख्याति दूर-दूर तक थी। राजा दशरथ के अभी तक कोई पुत्र नहीं था। केवल एक पुत्री थी जिसका नाम था शांता। दशरथ के मन में जहां एक ओर आसुरी शक्तियों से छुटकारा पाने की चिंता सता रही थी वहीं अपना वंश बढ़ाने के लिए पुत्र न होने की पीड़ा भी मन में थी। ऐसे में दशरथ को ऋषि वशिष्ठ ने इन समस्याओं के निवारण के लिए श्रृंगी ऋषि की मदद लेने की सलाह दी। तब राजा दशरथ की प्रार्थना पर ऋषि श्रृंगी उनके दरबार पहुंचे।

ऋषि ने राजा दशरथ से कहा कि इन समस्त समस्याओं का एक ही हल है-पुत्रकामेष्ठी यज्ञ। इसके बाद राजा दशरथ के घर पूरे विधिविधान से पुत्रकामेष्ठी यज्ञ कराया गया और कुछ वक्त बाद दशरथ के यहां विष्णु के अवतार में भगवान राम का जन्म हुआ। पूरे बारह दिन तक चला था ये यज्ञ और इस दौरान दशरथ ऋषि श्रृंगी के तप, उनके ज्ञान और शक्ति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी इकलौती पुत्री शांता का विवाह श्रृंगी ऋषि से करने का निर्णय ले लिया और तब श्रृंगी बन गए दशरथ के दामाद।

माना जाता है कि श्रृंगवेरपुर धाम के मंदिर में श्रृंगी ऋषि और देवी शांता निवास करते हैं। यहीं पास में है वो जगह जो राम सीता के वनवास का पहला पड़ाव भी मानी जाती है। इसका नाम है रामचौरा घाट। रामचौरा घाट पर राम ने राजसी ठाट-बाट का परित्याग कर वनवासी का रूप धारण किया था। त्रेतायुग में ये जगह निषादराज की राजधानी हुआ करता था। निषादराज मछुआरों और नाविकों के राजा थे। यहीं भगवान राम ने निषाद से गंगा पार कराने की मांग की थी।

निषाद अपने पूर्वजन्म में कभी कछुआ हुआ करता था। एक बार की बात है उसने मोक्ष के लिए शेष शैया पर शयन कर रहे भगवान विष्णु के अंगूठे का स्पर्श करने का प्रयास किया था। उसके बाद एक युग से भी ज्यादा वक्त तक कई बार जन्म लेकर उसने भगवान की तपस्या की और अंत में त्रेता में निषाद के रूप विष्णु के अवतार भगवान राम के हाथों मोक्ष पाने का प्रसंग बना। राम निषाद के मर्म को समझ रहे थे, वो निषाद की बात मानने को राजी हो गए।निषादराज का राजमहल आज भी भी श्रृंगवेरपुर में मौजूद है

निषाद राज (गुह ) और श्री राम जी की पहली मुलाकात का दृश्य संत लोग बहुत सुंदर बताते हैं | निषाद राज के पिता से और चक्रवर्ती महराज से मित्रता थी | वे समय समय पर अयोध्या आया करते थे | जिस समय दसरथ जी के यहाँ प्रभू का प्रादुर्भाव हुआ | उस समय वे अत्यन्त बृद्ध हो चुके थे , लेकिन लाला की बधाई लेकर वे स्वयं अयोध्या आये थे | अवध के चारों लाला का दर्शन कर परम आनन्द की अनुभूति हुई थी |

जब बृद्ध निषाद अयोध्या से वापस आये तो छोटे निषाद और परिवार मे लाला की सुंदरता का वर्णन करते | यह सब सुनकर छोटे निषाद को लाला को देखने का बड़ी उत्कंठा हुई | इसी तरह पाँच वर्ष का जब हो गया छोटा निषाद और पिता और वृद्ध हो गये तो एक दिन बूढ़े पिता ने आज्ञा दे दी कि जावो लाला का दर्शन कर आवो | साथ मे सहायक भी भेज दिये |

बूढ़े पिता ने सुंदर मीठे फल तथा रुरु नामक मृग के चर्म की बनी हुईं छोटी छोटी पनहिंयाँ भेंट स्वरूप देकर बिदा किया | फल वगैरह तो छोटे निषाद ने साथियों को ले चलने के लिए दे दिया | लेकिन उन चारों पनहियों को अपना काँख मे दबाये दबाये छोटे निषाद ने सारा रास्ता तय किया |

किसी तरह अयोध्या पहुँच कर छोटे निषाद ने अपनी गठरी सरयू जी के किनारे रखी और स्नान करने लगे | उन्हे पिता द्वारा बताया गया था कि स्नान करके महल मे जाना | जब वे स्नान कर रहे थे तो निगाह तो गठरी पर ही थी |

छोटे निषाद ने देखा कि चार छोटे छोटे बालक खेलते हुए आये और गठरी के पास बैठ गये , और गठरी खोलने लगे | निषाद ने पुकारा — हे गठरी न खोलो —- लेकिन इतने मे चारों कुमारों ने चारों पनहियाँ पहन ली और उछल कूद करने लगे | इतने मे छोटा निषाद भागता हुआ आया और कहा तुम जानते नही यह मै राजा दशरथ जी के चारों लल्ला के लिए ले जा रहा हूँ | प्रभु ने कहा मित्र तब तो और अच्छा हुआ , हमी हैं चारों लल्ला | सुनते ही छोटा निषाद वहीं बालू मे लोट गया | उठाकर प्रभु ने सीने से लगा लिया |

अब पाँचो लोग हाथ मे हाथ डाले महल की ओर चल पड़े | वहाँ पहुँच कर चारों भाइयों ने महराज को प्रणाम किया तो उसी तरह निषाद ने भी प्रणाम किया | प्रभु ने परिचय कराया कि यह मेरा मित्र है | राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए | उन्होने देखा कि निषाद के साथ ये चारों भाई बहुत प्रसन्न रहते हैं | राजा दशरथ ने बहाने से निषाद को अयोध्या मे धनुर्विद्या सिखाने के बहाने रोक लिया |

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