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(भाग:242) राजवैध सुषैणवैै द्धारा बताए संजीवनी बूटी लाकर हनुमान जी ने बचाया लक्ष्मणजी के प्राण

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भाग:242) राजवैध सुषैणवैै द्धारा बताए संजीवनी बूटी लाकर हनुमान जी ने बचाया लक्ष्मणजी के प्राण

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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रामलीला मंचन। श्रीराम-रावण युद्ध के समय हनुमान नीति गांव से संजीवनी बूटी के लिए उखाड़ ले गए पर्वत का एक हिस्सा और सुषैण वैध ने किया सफल उपचार के संबंध में सुषैन वैद्य बताते हैं कि लक्ष्मण के प्राण द्रोणागिरि पर्वत पर मिलने वाली संजीवनी बूटी से बचाए जा सकते हैं। इसके बाद हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने चल देते हैं। लेकिन द्रोणागिरि पर्वत पर बूटी को पहचान नहीं पाते तो पूरा पर्वत की उठा लाते हैं। सुषैन वैद्य संजीवनी बूटी से लक्ष्मण को ठीक कर देते हैं।

 

उत्तराखंड के चामोली जिले में जोशीमठ से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित है नीति गांव। इस गांव में द्रोणागिरी पर्वत है। इस पर्वत का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। मान्यता है कि श्रीराम-रावण युद्ध में मेघनाद के दिव्यास्त्र से लक्ष्मण मुर्छित हो गए थे। तब हनुमानजी द्रोणागिरी पर्वत संजीवनी बूटी लेने के लिए आए थे। यहां के लोग इस पर्वत को देवता मानते हैं। हनुमानजी इस पर्वत का एक हिस्सा ले गए थे, इस कारण गांव के लोग हनुमानजी की पूजा नहीं करते हैं।

 

हनुमानजी संजीवनी बूटी को पहचान नहीं पा रहे थे। तब उन्होंने द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा उखाड़ लिया था और इस हिस्से को लंका ले गए थे। ये पर्वत बद्रीनाथ धाम से करीब 45 किमी दूर स्थित है। बद्रीनाथ धाम के धर्माधिकारी भुवनचंद्र उनियाल बताते हैं कि आज भी द्रोणागिरी पर्वत का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ लगता है। इस हिस्से को हम आसानी से देख सकते

द्रोणागिरी पर्वत की ऊंचाई 7,066 मीटर है। यहां शीतकाल में भारी बर्फबारी होती है। इस वजह गांव के लोग यहां से दूसरी जगह रहने के लिए चले जाते हैं। गर्मी के समय जब यहां का मौसम रहने योग्य होता है तो गांव के लोग वापस यहां रहने के लिए आ जाते हैं।

हर साल जून में गांव के लोग द्रोणागिरी पर्वत की विशेष पूजा करते हैं। इस पूजा में गांव के लोगों के साथ ही यहां से अन्य राज्यों में रहने गए लोग भी शामिल होने आते हैं

हनुमान मंदिर में चल रहे नौ दिवसीय रामलीला में शुक्रवार को कलाकारों ने हनुमान-मेघनाद संवाद, कालनेमि की माया, लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने का आकर्षक मंचन किया। मंचन के प्रथम दृश्य में प्रभु श्रीराम वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण की योजना बनाते, युद्ध शुरू होते रावण के एक से बढ़कर एक पराक्रमी योद्धा धराशायी होते जाते हैं। सारे योद्धा के मारे जाने के बाद रावण की तरफ से मेघनाद युद्ध के लिए आता है, मेघनाद की पहली मुलाकात हनुमान जी के साथ होती है। मेघनाद व हनुमान जी के संवाद का कलाकारों ने बखूबी मंचन किया। इसके बाद लक्ष्मण व मेघनाद में भयंकर युद्ध होता है। युद्ध का बैठे दर्शकों ने खूब आनंद लिया एवं तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन भी किया। मेघनाद, लक्ष्मण पर शक्ति बाण का प्रयोग करता है, फलस्वरूप लक्ष्मण मूर्छित होकर जमीन पर गिर जाते हैं।

 

लक्ष्मण जी को लगी शक्ति हनुमान संजीवनी बूटी

 

मुरार में चल रही रामलीला में गुरुवार को लक्ष्मण शक्ति लीला का मंचन किया गया। रामलीला के प्रारंभ में भगवान श्रीराम की आरती उतारी गई।इसके बाद शुरू हुई रामलीला में अंगद ने लंका से लौटकर श्रीराम को संपूर्ण वृतांत सुनाया। श्रीराम ने अपने सलाहकारों के साथ मंत्रणा कर निष्कर्ष निकाला कि अब युद्ध ही एक मात्र उपाय है। रावण मेघनाद को युद्ध भूमि पर भेजता है। युद्ध के दौरान मेघनाद लक्ष्मण पर वीरघातनी शक्ति का प्रयोग करता है, जिससे लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। सुषैन वैद्य बताते हैं कि लक्ष्मण के प्राण द्रोणागिरि पर्वत पर मिलने वाली संजीवनी बूटी से बचाए जा सकते हैं। इसके बाद हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने चल देते हैं। लेकिन द्रोणागिरि पर्वत पर बूटी को पहचान नहीं पाते तो पूरा पर्वत की उठा लाते हैं। सुषैन वैद्य संजीवनी बूटी से लक्ष्मण को ठीक कर देते हैं। रामलीला मंडल मुरार के मीडिया प्रभारी निरंजन सिंह घुरैया ने बताया कि शुक्रवार को सुलोचना सती की लीला का मंचन किया जाएगा

हनुमान जी उन्हें वहां से उठाकर भगवान श्रीराम के पास ले आते हैं। जहां प्रभु राम लक्ष्मण जी की हालत को देखकर बिलख-बिलख कर रो पड़ते हैं। रामजी का विलाप सुनकर दर्शक भी अपने आंसू नहीं रोक सके। इसी बीच जामवंत ने लंका से सुषेण वैद्य को लाने की बात कही जाती है। जिस पर हनुमानजी लंका जाकर सुषेण वैद्य को ले आते हैं। वैद्य ने संजीवनी बूटी द्वारा ही लक्ष्मण जी के उपचार करने की युक्ति बताने के साथ ही कहते हैं यदि सूर्योदय से पूर्व संजीवनी बूटी नहीं आई तो लक्ष्मण जी का प्राण बचाना असंभव होगा। उसी समय तत्काल हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए चले जाते हैं। रास्ते में कालनेमि नामक अपनी तमाम माया फैलाकर हनुमान जी का रास्ता रोकने का प्रयास करता है। कालनेमि स्वयं एक साधु का रूप धारण कर हनुमान जी से गुरुमंत्र लिए जाने को कहता है। तालाब में स्नान करने गए हनुमानजी को एक मछली ने कालनेमि की माया के बारे में बता देती है। हनुमान जी कालनेमि की माया को समाप्त करते हैं। पर्वत सहित संजीवनी बूटी लेकर लंका पहुंचते हैं। यहां लक्ष्मण जी की संजीवनी बूटी खाकर जान बच जाती है। इसके बाद वह फिर युद्ध में चले जाते हैं। रामलीला को सफल बनाने में पूर्व मुखिया राजेश साव, कृष्णा साव, विनोद सिंह, मनीष कुमार, वीरेंद्र साव, निर्मल महतो, प्रमोद साव सहित अन्य लोग मौजूद थे।

सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए राम और रावण के बीच छिड़े युद्ध में रावण के बड़े बेटे मेघनाद ने लक्ष्मण को बाण मार दिया था, जिसके बाद संजीवनी बूटी की मदद से लक्ष्मण के प्राण बचाए गए थे।संजीवनी बूटी क्या है और क्या है इसके फायदेमुख्य बातेंहिंदुओं के प्रसिद्ध धर्मग्रंथ रामायण में संजीवनी बूटी का जिक्र मिलता हैराम और रावण के बीच छिड़े युद्ध में रावण के बड़े बेटे मेघनाद ने लक्ष्मण को बाण मार दिया थासंजीवनी बूटी के मदद से राम के भाई लक्ष्मण के प्राण बचाए गए थे

हिंदुओं के प्रसिद्ध धर्मग्रंथ रामायण में संजीवनी बूटी का जिक्र मिलता है। ये वही संजीवनी बूटी है जिसके बारे में रामायण में कहा गया है कि इसी की मदद से लक्ष्मण के प्राण वापस आए थे। रणभूमि में रावण के साथ युद्ध के दौराण लक्ष्मण को बाण लग जाने के कारण वे वहीं पर मूर्छित हो गए थे जिसके बाद राम अपने भाई की वियोग में करुणा विलाप करने लगे थे। इसके बाद ही पवनपुत्र हनुमान ने कैलाश पर्वत पर जाकर वहां से संजीवनी बूटी लेकर आए थे जिससे लक्ष्मण की जान बची थी।

 

सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए राम और रावण के बीच छिड़े युद्ध में रावण के बड़े बेटे मेघनाद ने लक्ष्मण को बाण मार दिया था। लक्ष्मण को मूर्छित देखकर हनुमान ने लंका के वैध सुशेन से इसका उपाय पूछा फिर उन्होंने ही बताया कि हिमालय के पास कैलाश पर्वत की द्रोणगिरी हिल्स से से उन्हें संजीवनी के चार पौधे लाने होंगे उसी से लक्ष्मण की जान बच सकती है। ये चार पौधे थे- मृतसंजीवनी (प्राण लौटाने वाला), विशाल्यकरणी (बाण निकालने वाला), संधानकरणी (त्वचा को सजीव करने वाला), सवर्ण्यकरणी (त्वचा का रंग वापस करने वाला)।

 

महर्षि वाल्मिकी के द्वारा लिखे गए रामायण के 74वें अध्याय के युद्धकांड में इस बात का वर्णन किया गया है। इस अध्याय के मुताबिक जब हनुमान पर्वत पर गए तो वे उन जड़ी बूटी वाले पौधों को खोज नहीं पाए इसके बाद वे समय बचाने के लिए पूरा पर्वत ही अपने हाथों पर उठा कर युद्धभूमि में ले आए जहां पर लक्ष्मण मूर्छित अवस्था में पड़े थे। इसके बाद लक्ष्मण की जान बचाई गई। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार संजीवनी एक ऐसी दवाई (औषधि/जड़ी बूटी) है जिसमें प्राण बचाने तक की क्षमता होती है।

 

क्या है संजीवनी बूटी का रहस्य

रामायण की इस घटना के बाद सवाल ये उठता है कि क्या संजीवनी बूटी वास्तव में धरती पर है और अगर है तो कहां है। हिंदू माइथोलॉजी के अनुसार यह एक जादुई जड़ी बूटी है जो किस भी प्रकार की जटिल समस्या को खत्म कर सकता है। ऐसा माना जाता है कि इस जड़ी बूटी की मदद से बनाए गए दवाइयों से किसी के मृतक के भी प्राण तक बचाए जा सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ वैज्ञानिक तर्कों की मानें तो हिंदू माइथोलॉजी में बताया गया संजीवनी बूटी धरती पर पाया नहीं गया है। पूराने ग्रंथ भी इस बात की पुष्टि नहीं कर पाए हैं कि धरती पर पाया गया कोई पौधा संजीवनी बूटी ही है। कहीं-कहीं ग्रंथों में लिखा गया है कि संजीवनी अंधेरे में चमकता है।

हम जानते हैं कि प्रकृति में ऐसे कई पौधे हैं जिनमें दवाईयों का गुण पाया जाता है जैसे तुलसी, धनिया, पुदीना इत्यादि। लंबे समय से इसका इस्तेमाल मानव जाति के द्वारा किया जाता रहा है। बहुत से लोगों के मन में ये भी सवाल उठता है कि क्या आज भी संजीवनी बूटी अस्तित्व में है। आपको बता दें कि कुछ लोगों ने ये दावा किया था कि द्रोणगिरी हिल्स पर आज भी दो ऐसे पौधे पाए गए हैं जो संभवत: संजीवन बूटी हैं। ये जगह जोशीमठ गढ़वाल के पास है जहां से 15,000 फीट की ऊंचाई पर ये बूटी पाई गई है

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