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(भाग:272) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आचरण और चरित्र का अनुसरण व अनुकरण करने वाला होता है रामभक्त

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भाग:272) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आचरण और चरित्र का अनुसरण व अनुकरण करने वाला होता है रामभक्त

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने आचरणों से हर किसी के लिए एक कीर्तिमान उदाहरण स्थापित किया है. प्रभु श्री राम एक आदर्श मनुष्य,पुत्र,भाई और पति होने के साथ-साथ एक आदर्श कुशल शासक भी थे. उनके शासन काल में व्याप्त सुव्यवस्था के कारण ही आज भी रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है

भगवान राम जी को भगवान विष्णु का 7वां अवतार माना जाता है. मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने अपना पूरा जीवन एक मर्यादा में रहकर व्यतीत किया. भगवान राम जी के चरित्र की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो उन्हें लोगों धका आदर्श बनाती हैं. भगवान राम ने अपने आचरणों से हर किसी के लिए एक उदाहरण स्थापित किया है.

 

प्रभु श्री राम एक आदर्श मनुष्य,पुत्र,भाई और पति होने के साथ-साथ एक आदर्श कुशल शासक भी थे. उनके शासन काल में व्याप्त सुव्यवस्था के कारण ही आज भी रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है. आइये जानते हैं भगवान राम के चरित्र से हमें कौन-कौन सी सीख मिलती है.

 

सहनशीलता और धैर्य

भगवान श्री राम में गजब की सबनशीलता और धैर्य था. कैकेयी की आज्ञा पर राम जी ने 14 वर्ष का वनवास बिताया. समुद्र पर सेतु तैयार करने के लिए तपस्या की. राजा होते हुए भी उन्होंने संन्यासी की तरह जीवन व्यतीत किया. रावण द्वारा माता सीता के अपहरण के बाद भी उन्होंने संयम से काम लेते हुए सही समय की प्रतीक्षा की. सहनशीलता की ऐसी पराकाष्ठा भगवान राम में ही देखने को मिलती है. आज भी हर व्यक्ति को भगवान राम के इस गुण को अपनाना चाहिए.

 

श्रीराम की दयालुता

 

भगवान राम के अंदर दयालुता का भाव कूट-कूट कर भरा था. वह पशु-पक्षी से लेकर हर प्राणी के लिए दयालु स्वभाव रखते थे. भगवान राम ने अपने इसी गुण के कारण हर किसी को अपनी छत्रछाया में लिया. भगवान राम ने सुग्रीव, हनुमानजी, केवट, निषादराज, जाम्बवंत और विभीषण सभी के प्रति दया भाव दिखाई. राजा होते भी उन्होंने इन लोगों को समय-समय पर नेतृत्व करने का अधिकार दिया.

 

श्रीराम की नेतृत्व क्षमता

 

भगवान राम राजा होने के साथ-साथ एक कुशल प्रबंधक भी थे. वो सभी को साथ लेकर चलने में यकीन रखते थे. भगवान राम के बेहतर नेतृत्व क्षमता की वजह से ही लंका जाने के लिए पत्थरों का सेतु बन पाया. भगवान राम ने सामान्य लोगों को जोड़कर ऐसी ताकत का निर्माण किया जिससे रावण जैसे एक शक्तिशाली शासक को भी पराजित होना पड़ा. भगवान राम ने लोगों को संगठन में ताकत की सीख दी.

 

श्रीराम में मित्रता का गुण

 

भगवान राम अपनी अच्छी मित्रता के लिए भी जाने जाते हैं. उन्होंने जिससे भी मित्रता की उससे अपना रिश्ता पूरे दिल से निभाया. महान राजा होते हुए भी राम जी ने हर जाति, हर वर्ग के व्यक्तियों के साथ मित्रता की. केवट हो या सुग्रीव,निषादराज या विभीषण सभी मित्रों के लिए भगवान राम ने कई बार संकट झेले और अपनी सच्ची मित्रता का परिचय दिया.

 

श्रीराम के आदर्श भाई

 

भगवान राम एक आदर्श भाई थे. लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न के प्रति उनके प्रेम,त्याग और समर्पण के कारण ही उन्हें आदर्श भाई कहा जाता है. भगवान राम ने अपने सभी भाइयों के साथ एक समान व्यवहार करते थे. बड़े भाई की तरह हर मुश्किल में साथ दिया और उन्हें सही मार्ग दिखाया. भाईयो का भी उनके प्रति अथाह प्रेम था. वनवास जाते समय लक्ष्मण जी भी उनके साथ वन गए. वहीं भरत ने राजपाट मिलने के बावजूद सिंहासन पर बड़े भाई राम की चरण पादुका रख जनता की सेवा की.

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दयालु व्यक्ति ही अपनी छवि को निखार पाता है. दयालु स्वभाव मानव और पशु सभी के प्रति होनी चाहिए. भगवान राम ने अपने इसी गुण के कारण सभी को छत्रछाया में लिया. भगवान राम ने स्वयं राजा होते हुए भी सुग्रीव, हनुमानजी, केवट, निषादराज, जाम्बवंत और विभीषण सभी को समय-समय पर नेतृत्व करने के अधिकार दिए.

भगवान राम राजा और एक कुशल प्रबंधक होते हुए भी सभी को साथ लेकर चले. इसी नेतृत्व क्षमता के कारण समुद्र में पत्थरों से सेतु का निर्माण हो सका.

आज भाई-भाई में लड़ाई-झगड़े घर-घर में होते हैं. परिवार में कलह-क्लेश की यह भी एक अहम वजह है. जिस घर में भाई-भाई के बीच मित्रता होती है, वहां पूरा परिवार खुशहाल जीवन व्यतीत करता है. इसके लिए आपको भगवान राम की तरह एक आदर्श भाई की भूमिका निभाने की जरूरत है. भगवान राम के लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के प्रति प्रेम, त्याग और समर्पण के कारण ही उन्हें आदर्श भाई कहा जाता है.

भगवान राम ने मित्रता का रिश्ता भी दिल से निभाया. केवट, सुग्रीव, निषादराज और विभीषण सभी उनके परम मित्र थे. मित्रता निभाने के लिए भगवान राम ने कई बार स्वयं भी संकट झेले.

‘जीवन मर्यादा’ अर्थात ‘आचरण की सभ्यता’ के पहले पाठ भारत ने ‘राम की कठिन जीवन पाठशाला’ से गृहण किए हैं और सहस्राब्दियों में भी भारत ‘आचरण की मर्यादा’ के इस पाठ को ही अपने ‘मूल्यबोध’ के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ पाठ’ मानता है। समाजवादी चिंतक और राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारतीय देवलोक के कुछ महान अवतारों और चरित्रों पर केंद्रित बड़ा दिलचस्प विमर्श किया और लिखा है। जैसे शिव, राम, कृष्ण, द्रौपदी, राधा और सावित्री आदि पर। इसमें दृष्टि देवलोक पर ‘आस्था’ और ‘दिव्यता’ की नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय है, फिर भी यह विमर्श रोचक और मूल्यवान है। राम और कृष्ण अवतारों पर उन्होंने लिखा-

 

‘राम और कृष्ण विष्णु के दो मनुष्य रूप हैं, जिनका अवतार धरती पर धर्म का नाश और अधर्म के बढ़ने पर होता है। राम धरती पर त्रेता में आए, जब धर्म का रूप इतना नष्ट नहीं हुआ था- वह आठ कलाओं से बने थे इसलिए मर्यादित पुरुष थे। कृष्ण द्वापर में आए जब अधर्म बढ़ रहा था। वे सोलह कलाओं से बने थे और इसीलिए संपूर्ण पुरुष थे। जब विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया तो स्वर्ग में थे और अंशत: धरती पर।’ ‘राम मर्यादा पुरुष थे। ऐसा रहना उन्होंने जानबूझकर और चेतन रूप से चुना था। बेशक नियम और कानून आदेश पालन के लिए एक कसौटी थे- लेकिन यह बाहरी दबाव निरर्थक हो जाता यदि उनके साथ-साथ अंदरूनी प्रेरणा भी न होती।

विधान के बाहरी नियंत्रण और मन की अंदरूनी मर्यादा एक-दूसरे को पुष्ट और मजबूत करती है।’ लोहिया के ये विमर्श मुझे बौद्धिक रूप से प्रेरित करते हैं- इसलिए भी क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले उत्तर भारत में ‘राष्ट्रीय रामायण मेले’ की चित्रकूट में स्थापना की थी, जहां भगवान राम ने अपनी वनवास अवधि का अधिकतम समय व्यतीत किया था। हमारी बौद्धिकता के पास परंपरा और परंपरा की रचना समझने और व्याख्यायित करने, इतिहास का समय, समाजशास्त्र- नृतत्व और मनोविज्ञान की दृष्टियां हैं। इनके साथ और इनके भीतर इस महान आख्यान का सर्वभौम नहीं समझा जा सकता- उसे समझने परंपरा का अपना देश-काल उस परंपरा की ही प्रज्ञा सृष्टि चाहिए। इस दृष्टि के अभाव में हमारी पीढ़ी की सर्जना और विमर्श से जुड़ी प्रतिभा कभी समाजशास्त्र की यांत्रिकता से इसके पात्रों की आलोचनात्मक पुनर्संरचना करती है- कभी भालू-बंदर, असुर, कोल, भील, किरात ‘नृतत्व की कसौटी’ पर परखे जाते हैं और कभी यथार्थवाद की आंखों से इसमें ‘सामंती वर्ग संघर्ष’ की कुटिलता समझी जाती है अथवा यह कथा ‘दलित और स्त्री विरोधी’ निरूपित की जाती है और ‘बदमाश ब्राह्मणवाद’ का पोषण करती प्रतीत होती है।

 

भारतीय आर्य परंपरा में ‘आख्यान’ कथा की एक और भूमि पर रचे गए थे। वे सिर्फ कथा नहीं है, उसमें ज्ञान, कथा, काव्य और गान संगीत की एक समष्टि है- वे दिव्य और लौकिक एक साथ हैं। उसमें प्रकृति का परिवर्तनशील मृत जीवन और परा प्रकृति के अनंत के समय की एक विचित्र समग्रता है- उसमें देव-दानव, ऋषि और मनुष्य, पशु-पक्षी और प्राणिक सत्ता में मूर्त जीवधारियों और प्रकृति के साथ इनके अद्वैत की एक पूर्णता है- वे कालविद्ध और कालातीत, विशेष स्थानों और सार्वभौम में एक साथ हैं।

 

इस आख्यान के महानायक श्रीराम मूल्यों का कोई दर्शन, तत्व मीमांसा, व्याख्या और प्रस्तावना नहीं करते। वे एक सच्चे जीवन व्यवहार में हैं और उनका ‘आचरण’ ही एक ‘वास्तविक दर्शन’ है। यह भारतीय समाज और परंपरा का ‘मूल्य केंद्र’ है और यहीं से ‘आचरण की मर्यादा’ का पाठ हमारे देश ने सीखा। इस महान आख्यान और राम के आचरण ने ही, भारतीय ‘मूल्यबोध का स्थापत्य’ रचा है। आज देश में कोई भी ‘आचरण की मर्यादा’ में नहीं है ऐसे समय एक बार फिर ‘रामायण’ और ‘श्रीराम’ की ओर देखने की जरूरत है।

 

नोट्स:- वर्तमान परिवेश में अनेकों पापी पाखण्डी दुराचारी झूठ छल कपट विश्वासघात बेईमानी और भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेताओं की जमात अपने को राम भक्त का चोला पहनकर वैदिक सनातन हिन्दू धर्म को कलंकित करने में पीछे नहीं है?

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