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निर्वाचन आयोग पर हेराफेरी का संदेह : मतदान के अंतिम आंकड़े जारी करने में विलंब

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इस आम चुनाव के पहले और दूसरे चरण में कम मतदान के आंकड़े आए, तो निर्वाचन आयोग पर सवाल उठने शुरू हो गए थे कि उसका मतदाता जागरूकता अभियान कारगर साबित क्यों नहीं हो पा रहा। अब उसने अंतिम आंकड़े जारी किए हैं, जो पिछले आंकड़ों से पांच से छह फीसद तक अधिक हैं। यानी दोनों चरण में छियासठ फीसद से अधिक मतदान हुए। यह एक संतोषजनक आंकड़ा कहा जा सकता है।

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मगर विपक्षी दलों ने सवाल उठाया है कि निर्वाचन आयोग ने अंतिम आंकड़े जारी करने में इतना वक्त क्यों लगाया। ये आंकड़े पहले चरण के ग्यारह दिन और दूसरे चरण के चार दिन बाद आए हैं। अभी तक मतदान के चौबीस घंटों में अंतिम आंकड़े जारी कर दिए जाते थे। फिर, विपक्षी दलों ने यह भी पूछा है कि आयोग ने मतदाताओं की संख्या क्यों नहीं बताई है।

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इस तरह चुनाव नतीजों में गड़बड़ी की शंका भी जाहिर की जाने लगी है। पहले ही विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठन मतदान मशीनों में गड़बड़ी की आशंका जताते रहे हैं। निर्वाचन आयोग के चुनाव प्रक्रिया और परंपराओं का उचित निर्वाह न करने से उनका संदेह स्वाभाविक रूप से और गहरा होगा। यह समझना मुश्किल है कि निर्वाचन आयोग ने मतदान के अंतिम आंकड़े जारी करने में इतना वक्त क्यों लगाया।

 

मशीनों के जरिए मतदान कराने के पीछे मकसद यही था कि इससे मतगणना में आसानी होगी, मतदान से संबंधित आंकड़ों को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जा सकेगा। मतदान मशीनों की केंद्रीय इकाई में हर मतदान केंद्र पर पड़े मतों की संख्या दर्ज होती है। इस तरह हर घंटे मतदान के आंकड़े जारी किए जाते हैं। हालांकि अंतिम आंकड़ा मतदान अधिकारियों के रजिस्टर में दर्ज संख्या से मिलान करने के बाद ही तय होते हैं।

 

इसलिए मान कर चला जाता है कि मतदान मशीनों की केंद्रीय इकाई से मिले आंकड़ों में कुछ फीसद की बढ़ोतरी हो सकती है। मगर मतदान अधिकारियों के रजिस्टर में दर्ज संख्या की गणना करने में भी इतना वक्त नहीं लगता। जब इससे पहले मतदान समाप्त होने के अगले दिन अंतिम आंकड़े जारी कर दिए जाते थे, तो इस बार ऐसी क्या अड़चन आ गई कि ग्यारह दिन लग गए। फिर मतदाताओं की संख्या वेबसाइट पर बताने में क्या दिक्कत है। वह तो मतदाता सूची में दर्ज ही होती है। आज के डिजिटल युग में ऐसी सूचनाएं जारी करने में ज्यादा समय नहीं लगता।

 

निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि वह न केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए, बल्कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता भी बनाए रखे। अगर किसी विषय या बिंदु पर आम लोगों या राजनीतिक दलों को किसी प्रकार का संदेह या प्रश्न है, तो उसका निराकरण भी करे। पहले ही आम मतदाता के मन में यह धारणा बैठी हुई है कि मशीनों में गड़बड़ी करके मतों को इधर से उधर किया जा सकता है।

 

फिर राजनेताओं के आपत्तिजनक बयानों और आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी शिकायतों पर पक्षपातपूर्ण रवैए के आरोप भी निर्वाचन आयोग पर लगते रहे हैं। ऐसे में उससे अतिरिक्त रूप से सावधान रहने की अपेक्षा की जाती है। चुनाव की तारीखों का ऐलान करते हुए आयोग ने बढ़-चढ़ कर दावा किया था कि वह नियम-कायदों की किसी भी प्रकार की अनदेखी बर्दाश्त नहीं करेगा। मगर उसके इस दावे पर भरोसा इस बात से बनेगा कि वह खुद नियम-कायदों की कितनी परवाह करता है।

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