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शक्की पती से परेशान महिलाओं के हित में हाईकोर्ट का अहम फैसला

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शक्की पती से परेशान महिलाओं के हित में हाईकोर्ट का अहम फैसला

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टेकचंद्र शास्त्री:

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9822550220

 

केरल हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि अगर पति अपनी पत्नी पर लगातार शक करता है, उसकी आजादी में दखल देता है या उसके चरित्र पर सवाल उठाता है, तो यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में पत्नी तलाक मांग सकती है। अदालत ने इसे वैवाहिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया।

पति के शक से हैं परेशान महिलाओं के यह तलाक का आधार बन सकता है.

पति का लगातार शक मानसिक क्रूरता माना जाएगा।

पत्नी इस आधार पर तलाक मांग सकती है।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलट दिया है.

भारत में तलाक के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई बार इनकी वजह आपसी मतभेद या किसी एक साथी का अफेयर होता है, लेकिन हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने वैवाहिक रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

अदालत ने कहा है कि अगर पति अपनी पत्नी पर लगातार शक करता है, उसकी आजादी में हस्तक्षेप करता है या उसकी गतिविधियों पर नजर रखता है, तो यह गंभीर मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।

जानिए क्या था पूरा मामला?

यह मामला केरल के कोट्टायम जिले का है, जहां एक महिला ने अपने पति के खिलाफ तलाक की अर्जी दाखिल की। महिला ने बताया कि उसकी शादी 2013 में हुई थी और एक बेटी भी है। शादी के शुरुआती दिनों से ही पति उस पर शक करने लगा। वह किसी पुरुष से बात करती तो पति मारपीट करता है तो पति ने शक के कारण उसको नर्सिंग की नौकरी छोड़ने के लिए भी मजबूर कर दिया है।

महिला ने आगे बताया कि दोनों विदेश गए तो पति का व्यवहार और खराब हो गया। वह अक्सर पत्नी को कमरे में बंद कर देता था, फोन पर बात करने से रोकता था और कई बार मारपीट भी करता था। महिला ने इसे अपनी स्वतंत्रता और मानसिक शांति पर हमला बताया है।

महिला की अर्जी को पहले फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी। उसके बाद महिला ने हाईकोर्ट में अपील की। केरल हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा कि एक शक्की पति शादीशुदा महिला जिंदगी को नर्क बना सकता है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि विवाह भरोसे पर टिका होता है और जब विश्वास की जगह शक ले लेता है, तो रिश्ता टिक नहीं सकता। लगातार शक करना, स्वतंत्रता में दखल देना जैसा है. और पत्नी की ईमानदारी पर सवाल उठाना यह मानसिक उत्पीड़न के बराबर माना जाएगा.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तलाक अधिनियम 1869 की धारा 10(1)(x) का हवाला दिया। इस धारा के तहत अगर पति का व्यवहार मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है, तो पत्नी को तलाक का अधिकार है।

यह फैसला उन सभी मामलों के लिए मिसाल बन गया है, जहां रिश्तों में शक ने भरोसे की जगह ले ली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शक से भरा रिश्ता, प्रेम से खाली विवाह है और ऐसे विवाह का अंत होना ही न्यायसंगत है।

दरअसल में तलाक की प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम निर्णय (डिक्री) जारी होने से पहले दूसरी शादी करना आम तौर पर अवैध माना जाता है और इसे द्विविवाह का अपराध माना जा सकता है।

भारत में कानून स्पष्ट है कि जब तक पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हो जाती, तब तक कोई भी पक्ष दूसरा विवाह नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति तलाक की कार्यवाही लंबित होने के दौरान दूसरी शादी करता है, तो यह दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य (Illegal/Void) मानी जाएगी। हिंदू विवाह अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (पहले आईपीसी) के प्रावधानों के तहत, पहली पत्नी/पति के जीवित रहते और कानूनी तलाक हुए बिना दूसरी शादी करना एक दंडनीय अपराध है, जिसके लिए जेल और जुर्माने का प्रावधान हो सकता है। आमतौर पर, तलाक की डिक्री जारी होने के बाद भी, दूसरी शादी करने से पहले एक निश्चित अपील अवधि (सामान्यतः 90 दिन) तक इंतजार करना पड़ता है, ताकि किसी भी पक्ष को फैसले के खिलाफ अपील करने का समय मिल सके। यदि इस अवधि के दौरान अपील दायर की जाती है, तो मामला लंबित माना जाता सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में यह स्पष्ट किया है कि यदि दोनों पक्ष सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग हो गए हैं और तलाक के फैसले का विरोध नहीं करने का फैसला किया है, तो कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में दूसरी शादी वैध हो सकती है, भले ही अपील अवधि तकनीकी रूप से लंबित हो। हालांकि, यह एक जटिल कानूनी बिंदु है और सामान्य नियम यही है कि अंतिम डिक्री का इंतजार किया जाए। तलाक की प्रक्रिया के बीच की गई शादी गंभीर कानूनी परिणाम ला सकती है। उचित कानूनी सलाह लेना और तलाक की प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त होने का इंतजार करना ही बुद्धिमानी है

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