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(भाग :110) गीता ज्ञानेश्वरी के अनुसार जिनकी इंद्रियों के उपद्रव नष्ट हो जाते हैं शांतिप्रिय है वही आत्मज्ञानी

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भाग :110) गीता ज्ञानेश्वरी के अनुसार जिनकी इंद्रियों के उपद्रव नष्ट हो जाते हैं शांतिप्रिय है वही आत्मज्ञानी

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

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गीता ज्ञानेश्वरी के अनुसार योगी लोग इन मानस नोश दाणा करते हैं, परम्तु उनके मनमें ह बावका स्पर्श भी नहीं होता, इसलिए वे कर्म उनके लिए बन्धक नहीं होते। जिस समय कोई मनुष्य पिशाचके चित्तके समान भ्रमिष्ट होता है,

उस समय उसकी इन्द्रियोंकी क्रियायें पागलपनकी-सी जान पड़ती है। उसे आस-पासकी सब वस्तुओं और मनुष्योंके रूप और बाकार तो दिखाई देते है, यदि उसे पुकारा जाय तो वह सुनता भी है

वह स्वयं अपने मुख से बोल भी सकता है, परन्तु देखने से यह नहीं जान पड़ता कि वह कुछ सम- झता भी है। परन्तु अब व्यर्थकी और बातोंकी आवश्यकता नहीं ।

जो कर्म सब प्रकारके कारणोंके बभावमें और आपसे आप होते हैं, उन्हे प्रन्दिरय-क्मे कहते हैं । और जो काम समझ-बूझकर किये जाते हैं, वे वास्तवमें बुद्धिके कर्म हैं।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से ये सब बातें कह कर आगे यह भी कहा कि-“वे लोग बुद्धिपूर्वक मन लगाकर सब कर्मों का आचरण तो करते परन्तु अपनी निष्कर्म वृत्तिके कारण वे मुक्त ही रहते हैं।

क्योंकि बुद्धिसे लेकर शरीर तकके सम्बन्धमें उनमें अह-भावका कोई विचार या स्मृति ही नहीं होती और इसी लिए वे सब प्रकारके कर्म करते रहने पर भी गुद्ध हो रहते हैं।

हे अ्जुन, कतृंत्की अहं-भावनाके बिना ही सब प्रकारके कर्म करना “निष्कर्म काम” कहलाता है र सद्गुरु से प्राप्त होनेवाला यह रहस्य-जान उसे प्राप्त रहता है ।

जब ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाती है, तब शान्तिकी नदी में ऐसी बाढ़ आती है कि वह अपने पात्रमें पूरी तरहसे भर जानेके कारण ऊपर चारों ओर फैलने लगती है, हे अर्जुन,

मैंने अभी तुम्हें वह तत्त्व वतलाया है, वाचाकी सहायता से जिसका वर्णन जल्दी हो ही नहीं सकता ।” हे श्रोतागण, जिनको इन्द्रियोंके उपद्रव पूर्णरूप से नष्ट हो जा

उन दिनों विट्ठल पन्तको अवस्था अत्यन्त शोचनीय ही रही थी। उन्हें कहीं भा तक न मिलती थी। कभी कभी उन्हें फल-फूल और कभी कभी केवल तृण और पत्ते यदि खाकर और यहाँ तक कि कभी कभी केवल जल ही पीकर रह जाना पड़ता था।

परन्तु फिर भी कभी उनका मन माया के वशमें न हुआ। हो, सन्तान उत्पन्न होने पर अवश्य ही उन्हें भविष्यकी चिन्ता होने लगी।

परन्तु ये जैसे जैसे अपना समय बिताते चलते थे सौभाग्यवण उनके तीनों पुत्र बहुत ही कुशाग्रबुद्धि वे और स्वयं के अनेक शास्त्रोंके पूर्ण पंडित थे, इसलिए उन पुत्रोंकी शिक्षा बहुत ही सन्तोषजनक रूप होने लगी ।

जब उनके बड़े पुत्र निवृत्तिनाथकी अवस्था सात वर्षकी हुई, तब उन्होंने उनका उपनयन संस्कार करनेका विचार किया। वे जानते थे कि इस संस्कारके समय कोई ब्राह्मण न आवेगा, इसलिए उन्होंने ब्राह्मणोंसे बहुत प्रार्थना की कि आप लोग किसी प्रकार मुझे फिरसे जाति में मिला लें।

परन्तु ब्राह्मणोंने उनकी उस प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया।

सब जोरसे निराश होकर अन्तमें विट्ठल पन्तने यह निश्चय किया कि बी और पुत्रोंको लेकर त्र्यम्बकेश्वर चलना चाहिए और वहीं अनुष्ठान करना चाहिए। तदनुसार वे अपने सारे परिवारको लेकर त्र्यम्बकेश्वर जा पहुँचे।

वहाँ उनका नित्यका यह नियम हो गया था कि मध्य रात्रिमें उठकर कुशावर्त में स्नान करते थे और अपने सारे परिवार को लेकर ब्रह्मगिरिको परिक्रमा करते थे।

इस प्रकार छः मास बीतने पर एक दिन उसो आधी रात के समय एक विक्ट और विलक्षण घटना हुई।

जिस समय के बाद बच्चों समेत परिक्रमा कर रहे थे, उस समय सामने से एक भीषण बाप कूदता फोदा का पहुँचा। उसे देखते ही सब लोग घबराकर इधर-उधर भाग निकले।

उनके बड़े विनाथ भी भागते भागते अंजनी पर्वतकी एक गुफा में जा छिपे। उस समय ब नाथ सम्प्रदाय आचार्य श्री गहिनीनाथ अपने दो शिष्योंके साथ तपस्या कर रहे है।

पहुंचते हो श्री निवृत्तिनाथ उनके चरणों पर गिर पड़े।

निवृत्तिनाथ आदि सभी बालकोन और विशेषतः ज्ञानेश्वरने ब्राह्मणका यह निर्णय

पूर्ण रूप से शिरोधार्य किया। पहले निवृत्तिदेव और सोपानदेव यह निर्णय मानने में कुछ संकोच करते थे, परन्तु ज्ञानदेवने उनसे आग्रहपूर्वक यह निर्णय मान्य कराया था।

उन्होंने यह बात अच्छी तरह समझ ली थी कि यद्यपि वर्ण, आश्रम और जाति बादिके भेद निर्मूल है, परन्तु फिर भी वे देखते थे कि हमारे समाजमें ये सब भेद पूरी तरह और हड़तापूर्वक प्रचलित हैं; और यदि इनसे सम्बन्ध रखनेवाले नियमोंका भली भांति पालन किया जाय तो सामाजिक व्यवहारोंमें बहुत सुगमता होती है।

समाजको व्यवस्थित रखने के लिए उसके नियमों और जाज्ञालोंका ठीक तरह से पालन करना आवश्यक है और उन नियमों तथा मालाओंके प्रतिकूल पलना तथा विद्रोह करना हानिकारक है।

और यदि समाजमें किसी प्रकारके सुधारकी आवश्यकता हो तो वह सुधार समाजमें रहकर और सौम्य तथा नन्न उपायोंने ही करना उत्तम होता है।

और यही सब बातें ज्ञानेश्वर महाराजने उस समय अपने दोनों भाइयोंको बहुत अच्छी तरह समझा दी थी।

इस प्रकार पैठणके ब्राह्मणोंके आज्ञानुसार तीनों भाई ब्रह्मचर्यपूर्वक अपने समाज रहने लगे। उन्होंके साथ साथ मुक्ता बाई भी ब्रह्मचारिणी होकर दिन व्यतीत करने लगी।

ब्राह्मणोंने इन बालकोंकी बुद्धिकी व्यवस्था शक संवत् १२०१ या वि० सं० १३४४ में दी थी। इसके उपरान्त ये चारो भाई-बहन पैठणसे चलकर नेवासे पहुंचे बोर वहीं रहने लगे

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