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PM मोदी वसुंधरा राजे को किनारा कर रहे हैं?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

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नई दिल्ली। ऐसी चर्चाएं तो पहले से तेज़ थीं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार दो जनसभाओं में मानो वसुंधरा राजे की विधान सभा उम्मीदवारी पर पर मुहर लगाने का जिक्र नहीं किया है।

PM नरेंद्र मोदी जिस खुली जीप पर सवार होकर आए, उनके साथ सिर्फ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सीपी जोशी थे, पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश की प्रभावशाली नेता वसुंधरा राजे नहीं थीं. मंच का संचालन सांसद दीया कुमारी कर रही थीं. मंच पर प्रदेश भाजपा की कई महिला नेताएं भी मौजूद थीं. दीया कुमारी को संघनिष्ठ नेताओं का अप्रत्याशित समर्थन भी पार्टी के पुराने पहरेदारों को चौंका रहा है.

प्रधानमंत्री ने जयपुर की सभा में न तो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का ज़िक्र किया और न ही उनके नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की उपलब्धियों को गिनाया. राजस्थान में चेहरा विहीन भाजपा की इस स्थिति को लेकर चर्चाएं छिड़ गई हैं. भाजपा ने नई संसद के पहले ही सत्र में ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ को दोनों सदनों में पारित करवाया है.
ऐसे समय में प्रदेश की एक ताक़तवर महिला नेता अगर अग्रणी भूमिका में नहीं दिख रही हैं तो ज़ाहिर है लोगों का ध्यान उस पर जाएगा ही.
हैरान करने वाली बात यह है कि एक अनुभवी नेता की तरह वे अपने ग़ुस्से और मनोभावों को लगातार पी रही हैं. उन्होंने अब तक ऐसी कोई प्रतिक्रिया सार्वजनिक तौर पर नहीं दी है, जिसकी उम्मीद उनसे बहुत से राजनीतिक खेमे लगाए हुए हैं.राजस्थान में परिवर्तन यात्रा से पार्टी के अंदर और बाहर किन समीकरणों को साध रही है
राजस्थान की राजनीति में क़रीब दस साल पहले अपने एक प्रतिद्वंद्वी को दी अशोक गहलोत की एक नसीहत को याद करें, “जो नेता इस प्रदेश में ज़हर पीना सीख जाता है, वह कामयाब हो जाता है और जो नहीं पी सकता, वह दरकिनार हो जाता है.”कुछ लोग मान रहे हैं कि वसुंधरा इस समय गहलोत की पुरानी सलाह पर अमल कर रही है
इस विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक ही चेहरा है और वह कमल, हमारा उम्मीदवार सिर्फ कमल है. इसलिए एकजुटता के साथ कमल को जिताने के लिए भाजपा कार्यकर्ता काम कर रहे है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारे कयासों को दरकिनार करते हुए सोमवार को चित्तौड़गढ़ के सांवरियासेठ में हुई सभा में साफ़ कहा, इस विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ एक ही चेहरा है और वह कमल, हमारा उम्मीदवार सिर्फ़ कमल है, इसलिए एकजुटता के साथ कमल को जिताने के लिए भाजपा कार्यकर्ता काम करें.प्रदेश के इस मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अब प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि भाजपा ने राज्य में किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा क्यों नहीं बनाया है? इसके पीछे क्या वजह है?

और भी कई प्रश्न इससे जुड़ गए हैं, क्या किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन सकी? ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? वसुंधरा राजे की उपेक्षा क्यों हो रही है? क्या ये स्थिति भाजपा के पक्ष में जाएगी? क्या इस स्थिति का भाजपा को नुक़सान हो सकता है

राजस्थान के चुनावी समर को लेकर हम जब भाजपा और संघ के पुराने नेताओं से बातचीत करते हैं तो एक नया सार यह निकलकर आ रहा है कि अब बाक़ी प्रदेशों की तरह भाजपा का चेहरा तो बदला ही जा रहा है, उसकी चाल भी बदली जा रही है, राजस्थान में तो पार्टी का चरित्र भी बदलने की तैयारी में है.किसी दौर में राज्य के कद्दावर नेता और भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे भैरो सिंह शेखावत ने एक बातचीत में 2008 के चुनाव से ठीक पहले मुझसे कहा था, “यह भाजपा सामान्य भाजपा नहीं, मेरी बनाई भाजपा है और इसमें मैंने राजस्थान के 36 राजनीतिक दलों को एक-एक करके मिलाया है.’

भैरोसिंह शेखावत ने तब अखिल भारतीय रामराज्य परिषद, सोशलिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी, कृषिकार लोक पार्टी, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल, लोकदल जैसे कितने ही दलों को राजस्थान भाजपा में मिलाने की सराहनीय ककदम उठाया था.

लेकिन शेखावत जैसे ही दिल्ली गए और उपराष्ट्रपति बने तो राजस्थान भाजपा की कमान प्रदेश अध्यक्ष बनाकर वसुंधरा राजे को सौंपी गई थी.वसुंधरा राजे को 2003 के चुनाव में मिली कामयाबी का ऐसा असर हुआ कि भाजपा में शेखावत और जसवंत सिंह सहित विभिन्न बड़े नेताओं के अधिकतर सिपहसालार राजे के साथ आ जुटे, बड़े नेता हाशिए पर खिसकते गए और वसुंधरा राजस्थान भाजपा में एक नया उल्लास लेकर आईं. साल 2008 में चुनाव हुए तो संघनिष्ठ नेताओं ने वसुंधरा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और नतीजे कांग्रेस के पक्ष में चले गए, राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि वसुंधरा का करिश्मा और बढ़ गया और वे 2013 में 200 सीटों वाली विधानसभा में 163 सीटें लेकर आईं, कांग्रेस महज 21 सीटों पर सिमट गई थी.इस बार शुरू से कुछ संदेह जताए जा रहे थे कि संभवत: वसुंधरा को चुनाव में चेहरा घोषित नहीं किया जाए, लेकिन भाजपा की चारों राजनीतिक यात्राएं जहाँ-जहाँ गईं, वहाँ-वहाँ वसुंधरा की ग़ैर-मौजूदगी के कारण उल्लास की कमी लोगों ने महसूस की

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