श्री मद्भ भगवद गीता मे भगवान श्रीकृष्ण चंद्र ने कहा है कि निष्काम कर्म सिद्धांत पर जीवन को चरितार्थ करने वाला मनुष्य साक्षात देवता के तुल्य माना गया है इसलिए हमारा अधिकार केवल कार्य या कार्रवाई करने के लिए है। न कि उसके परिणामों पर, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। हमारे कर्म, हमारी इच्छाएँ “इच्छारहित” होनी चाहिए, हमें किसी सुखद (प्रिय या अप्रिय) परिणाम की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
आध्यात्मिक मुक्ति के मार्गों में से, वैदिक सनातन हिंदू धर्म में कर्म योग या निष्काम कर्म निःस्वार्थ कर्म का मार्ग है, जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है। यह सिखाता है कि एक आध्यात्मिक साधक को अपने धर्म (कर्तव्य) के अनुसार कार्य करना चाहिए, ऐसे कार्य के फल या व्यक्तिगत परिणामों से जुड़े बिना।
आध्यात्मिक प्रगति में कर्म-योग का महत्व कर्तव्य के लिए अपना कर्तव्य करना है। कार्य दुःखदायी नहीं है, उस कार्य के प्रति आसक्ति और अपेक्षित परिणाम की इच्छा ही दुःख लाती है
वैदिक सनातन हिंदू धर्म के ग्रंथों व शास्त्रों में किए वर्णन की मानें तो इसमें 33 कोटि देवी-देवताओं हैं। लेकिन इस एक वाक्य में लोगों के जो सबसे बड़ी असमंजस है वो ये है कि 33 कोटि से क्या अर्थ है। तो आपको बता दें। वैदिक सनातन हिन्दूओं के धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक 33 कोटि का अर्थ 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 प्रकार हैं कोटि यानी प्रकार। जी हां, 33 कोटि देवी-देवता यानि 33 प्रकार के देवी-देवता है। (नोट- उपरोक्त जानकारी केवल धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं पर आधारित हैं, पंजाब केसरी इसकी पुष्टि नहीं करता।
विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में इन 33 देवी-देवता के बारे में बारे में बताया है, लेकिन हिंदू धर्म में त्रिदेव समस्त देवों के भी पूजनीय माने जाते हैं। बता दें भगवान विष्ण, ब्रह्म देव तथा शिव जी को त्रिदेव कहा जाता है। इन तीनों ने समय-समय पर विभिन्न युग में अवतार लिए जिनमें से बात करें विष्णु भगवान की तो यूं तो इन्होंने हर युग में कोई न कोई रूप लिया, लेकिन इनका श्री कृष्ण अवतार अपनी लीलाओं कारण अधिक प्रसिद्ध है। तो वहीं हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक श्रीमद्भगवद्गीता में इनके द्वारा अर्जुन को दिए गए वो उपदेश हैं, जो न केवल उस समय अर्जुन के काम आए थे, बल्कि वर्तमान समय में मानलव जीवन के लिए भी अधिक लाभकारी माने जाते हैं। अपनी वेबसाइट के माध्यम से बताते रहते हैं समय-समय पर आपको इनसे जुड़े पौराणिक किस्सों व जानकारी के बारे में बताते रहते हैं। आज भी एक बार फिर हम आपके लिए लाएं श्रीमद्भगवद्गीता का वो श्लोक जिसमें श्री कृष्ण भगवान के असंख्य रूपों के बारे में उल्लेख किया गया है। यहां श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक:-
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥
अनुवाद एवं तात्पर्य : श्री भगवान ने कहा : तुम्हारे तथा मेरे अनेकानेक जन्म हो चुके हैं। मुझे तो उन सबका स्मरण है, किंतु हे परंतप! तुम्हें उनका स्मरण नहीं रह सकता।वेदों में भी कहा गया है कि अद्वय होते हुए भी भगवान असंख्य रूपों में प्रकट होते हैं। वे उस वैदूर्यमणि के समान हैं जो अपना रंग परिवर्तित करते हुए भी एक ही रहता है। ये सारे रूप विशुद्ध निष्काम भक्त ही समझ पाते हैं; केवल वेदों के अध्ययन से उनको नहीं समझा जा सकता।
अर्जुन जैसे भक्त श्री कृष्ण के नित्य सखा हैं और जब भी भगवान अवतरित होते हैं तो उनके पार्षद भक्त भी विभिन्न रूपों में उनकी सेवा करने के लिए उनके साथ-साथ अवतार लेते हैं। अर्जुन ऐसा ही भक्त है और इस श्लोक से पता चलता है कि लाखों वर्ष पूर्व जब भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता का प्रवचन सूर्यदेव विवस्वान् से किया था तो उस समय अर्जुन भी किसी भिन्न रूप में उपस्थित था।
किन्तु भगवान तथा अर्जुन में यह अंतर है कि भगवान को यह घटना याद रही, किन्तु अर्जुन याद नहीं रख सका। अंश जीवात्मा तथा परमेश्वर में यही अंतर है। अत: भौतिक दृष्टि से जीव चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह कभी परमेश्वर की समता नहीं कर सकता।
वे अद्वैत हैं, जिसका अर्थ है कि उनके शरीर तथा उनमें (आत्मा) कोई अंतर नहीं है। उनसे संबंधित हर वस्तु आत्मा है जबकि बद्धजीव अपने शरीर से भिन्न होता है। चूंकि भगवान के शरीर तथा आत्मा अभिन्न हैं, अत: उनकी स्थिति तब भी सामान्य जीव से भिन्न रहती है, जब वे भौतिक स्तर पर अवतार लेते हैं। असुरगण भगवान की इस दिव्य प्रकृति से तालमेल नहीं बैठा पाते जिसकी व्याख्या अगले में भगवान स्वयं करते हैं
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