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(भाग:175)ध्यान योग के द्धारा हम कठिन से कठिन अप्राप्त वस्तुओं को भी प्राप्त कर सकते है

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भाग:175)ध्यान योग के द्धारा हम कठिन से कठिन अप्राप्त वस्तुओं को भी प्राप्त कर सकते है

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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जब हम समर्पण के साथ ध्यान करते हैं तब इससे हमारा मन शुद्ध हो जाता है और हमारी आध्यात्मिक अनुभूति गहन हो जाती है। फिर जब मन शांत हो जाता है तब साधना उत्थान का मुख्य साध बन जाती है। ध्यान द्वारा योगी मन को वश में करने का प्रयास करते हैं क्योंकि अप्रशिक्षित मन हमारा बुरा शत्रु है और प्रशिक्षित मन हमारा प्रिय मित्र है।

चित्त को एकाग्र करके किसी एक वस्तु पर केन्द्रित कर देना ध्यान कहलाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भगवान का ध्यान करते थे। ध्यान की अवस्था में ध्यान करने वाला अपने आसपास के वातावरण को तथा स्वयं को भी भूल जाता है। ध्यान करने से आत्मिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास होता है।
ध्यान एक क्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को चेतना की एक विशेष अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। ध्यान का उद्देश्य कोई लाभ प्राप्त करना हो सकता है या ध्यान करना अपने-आप में एक लक्ष्य हो सकता है। ‘ध्यान’ से अनेकों प्रकार की क्रियाओं का बोध होता है। इसमें मन को विशान्ति देने की सरल तकनीक से लेकर आन्तरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति (की, प्राण आदि) का निर्माण तथा करुणा, प्रेम, धैर्य, उदारता, क्षमा आदि गुणों का विकास आदि सब समाहित हैं।
बंगलुरू में ध्यान मुद्रा में भगवान शिव की एक प्रतिमा
अलग-अलग सन्दर्भों में ‘ध्यान’ के अलग-अलग अर्थ हैं। ध्यान का प्रयोग विभिन्न धार्मिक क्रियाओं के रूप में अनादि काल से किया जाता रहा है।
चित्त को एकाग्र करके किसी एक वस्तु पर केन्द्रित कर देना ध्यान कहलाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भगवान का ध्यान करते थे। ध्यान की अवस्था में ध्यान करने वाला अपने आसपास के वातावरण को तथा स्वयं को भी भूल जाता है। ध्यान करने से आत्मिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास होता है। जिस वस्तु को चित में बांधा जाता है उस में इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहाँ से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।
ऐसा पाया गया है कि ध्यान से बहुत से मेडिकल एवं मनोवैज्ञानिक लाभ होते हैं।
मन शान्त होने पर उत्पादक शक्ति बढती है; लेखन आदि रचनात्मक कार्यों में यह विशेष रूप से लागू होता है। इससे आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है
ध्यान से हमे अपने जीवन का उद्देश्य समझने में सहायता मिलती है। इसी तरह किसी कार्य का उद्देश्य एवं महत्ता का सही ज्ञान हो पाता है।
मन की यही प्रकृति (आदत) है कि वह छोटी-छोटी अर्थहीन बातों को बड़ा करके गंभीर समस्यायों के रूप में बदल देता है। ध्यान से हम अर्थहीन बातों की समझ बढ जाती है; उनकी चिन्ता करना छोड़ देते हैं; सदा बडी तस्वीर देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
दिव्य दर्शन :- प्राचीन समय में ऋषि मुनि और संत लोग ध्यान लगाकर अपने आराध्य देव के दर्शन प्राप्त करते थे और उनसे अपने समस्या का हल भी पुछा करते थे , यह आज के समय में भी संभव है , उदहारण के तौर पर स्वामी राम कृष्ण परमहंस अपने आराध्य देवी काली से ध्यान के द्वारा साक्षात् बाते करते थे |
वैज्ञनिकों के अनुसार ध्यान से व्यग्रता का ३९ प्रतिशत तक नाश होता है और मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ती है। बौद्ध धर्म में इसका उल्लेख पहले से ही मिलता है।[1] अनंत समाधि को प्राप्त करना / मोक्ष प्राप्त करना – ध्यान एक भट्टी के सामान है जिसमे हमारे जन्म जन्मांतरों की पाप भस्म हो जाती है , और हमें अनंत सुख और आनद प्राप्त होता है |

योग मन के प्रवाह को बांधने की विधि है। योग की परिभाषा में कहा गया है कि चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम ही योग है। चित्त की वृत्तियां कभी स्थिर नहीं रहती वह सदैव चंचल रहती हैं इन प्रवाह मान चित्त वृत्तियों को बांधना अत्यंत दुष्कर कार्य है तथापि चित्त वृत्तियों को बांधने पर ही मन को जाना जा सकता है इसके लिए मन को रोकना होगा विचार के सहारे विचारों को काटना होगा। विचार के द्वारा ही विचार के ऊपर उठना होगा। यही विधि है। यह विधि सुनने में बड़ी पहेली सी लगती है विचार के सहारे हम विचारों को कैसे काट सकते हैं? भारतीय साधकों ने इस पहेली को सुलझाया उन्होंने कहा संसार मे
शब्द यदि अक्षर है तो क्या कोई ज्ञानी ध्यान योग के द्वारा अब भी भगवत गीता को सुन सकता है?
प्रिय मित्र पवित्र गीता में ज्ञानदाता द्वारा बोला गया शब्द व अक्षर का मतलब जीव अपने आप नहीं समझ सकता। मनमाना अर्थ निकालकर सब अर्थ का अनर्थ कर देगा। इसलिए कोई भी पवित्र ज्ञान एक परफैक्ट शब्द भेदी गुरु की देखरेख में समझे। यहां अक्षर का भाव आत्मा से है ओर शब्द का भाव परमात्मा से है। जो समझने के लिए बोला गया है लिखे शब्द व बोली का भाव। जब भाव सत्य नहीं पता हो तो ध्यान क्या खाक लगाओगे आप ।अर्थात सब गलत हो जाएगा। नमस्कार
आज के समय में योग एक बहुत ही दिलचस्प विषय बना हुआ है लोगों के लिए। सभी लोग योग को अपनाने में अपनी रुचि दिखा रहे हैं क्योंकि योग के द्वारा चिंता, तनाव, दुःख और बहुत ज्यादा हद तक कई सारे रोगों को भी दूर किया जा सकता है।योग की उपयोगिता को देखते हुए ही अब सारे विश्व में 21जून को योग दिवस मनाया जाता है। लेकिन सवाल ये है कि योग वास्तव में होता क्या है? इसकी हमारे जीवन में क्या आवश्यकता है? और ये कैसे किया जाता है?
योग की परिभाषा महर्षि पतंजलि के शब्दों में ये है-“योगश्चित्तवृत्ति निरोधः”(अपने चित्त की वृत्तियों का निरोध करना(रोकना) ही योग है। और अधिक सरल भाषा में कहा जाय तो हमेशा चंचल रहने वाली इंद्रियों को अपने वश में करना।
लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि”समत्वं योग उच्यते” (प्रत्येक स्थिति में सम रहना चाहे सुख हो या दुःख, सर्दी हो या गर्मी, हानि हो या लाभ) हो सकता है।
गीता के अध्याय-६ में श्रीकृष्ण द्वारा ध्यान की पद्धति का वर्णन किया गया है। ध्यान करने के लिए पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठा जा सकता है। शांत और चित्त को प्रसन्न करने वाला स्थल ध्यान के लिए अनुकूल है। रात्रि, प्रात:काल या संध्या का समय भी ध्यान के लिए अनुकूल है।

कृष्ण के अनुसार ध्यान क्या है?
किसी भी चीज को समझने के लिए सबसे पहले मन को शांत रखना चाहिए और फिर काम पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि हम मन से ही प्रश्न खोज लेते हैं और मन में ही जवाब देकर बैठ जाते हैं। भगवान कृष्ण ने मन को शांत रखने के लिए के लिए दो चीजें बताइए हैं। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, मन का बैचेन होना उसका स्वभाव है।
गीता में योग के बारे में क्या लिखा है?
भगवत गीता के अनुसार, योग हमारे कार्यों को शुद्ध करने के लिए है, योग मन को नियंत्रित करता है और इंद्रियां और योग को भक्ति के साथ सर्वोच्चता से जोड़ता है। योग नतीजे या अंत परिणामों की अपेक्षा किए बिना निःस्वार्थ कार्यों का मार्ग है। धर्म के अनुसार आध्यात्मिक साधक कार्य करता है
हम सभी लोग जन्म से ही अज्ञानी होते हैं और जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं तो दूसरों को देख-देखकर और स्कूलों में पढाई के द्वारा चीजों को समझते हैं और सीखते हैं,इस तरह हम बड़े होते हैं लेकिन एक चीज हमसे हमेशा ही छिपी रहती है और वो है आत्मज्ञान। आत्मज्ञान का अर्थ होता है अपने आपको जानने से कि मैं कौन हूँ?,क्यों इस संसार में सुख-दुःख भोग रहा हूँ?,मेरा शरीर क्यों मेरी इच्छा के बिना बीमार होता है, वृद्ध होता है और क्यों एक दिन समाप्त हो जाता है?,मैं कौन से तरीक़े से कार्य करूँ कि कार्य करते हुए भी मुझे कभी कोई तनाव या दुःख न हो? इस दुनिया में कैसे हमेशा के लिए अपने आपको सुखी रखा जा सकता है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर जाने बिना कोई भी पूर्ण रूप से सुखी नहीं हो सकता है।और अपने आपको न जानने के कारण ही लोग परिस्थितियों को सहन करते रहते हैं और यही सोचते हैं कि सभी ऐसे ही जीवन जी रहे हैं तो हम भी ऐसे ही जी लेंगे इस तरह लोग अपने मनुष्य जीवन का जो चरमलक्ष्य है आत्मसाक्षात्कार उसकी उपेक्षा कर देते हैं और दुःख का रास्ता चुन लेते हैं। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इस संसार से ऊबकर अपने भले के लिए ऊपर बताए गए प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए कोशिश करते हैं।जब उनको ये पता चलता है कि ईश्वर जैसी सत्ता भी कोई चीज है जिसके नियंत्रण में सबकुछ है और उसीके सम्पर्क से सारी स्थिति को संभाला जा सकता है तो वो उस ईश्वर से जुडना चाहते हैं और इसी जुडने को योग कहा जाता है। योग का एक सीधा और सरल अर्थ होता है जोड़ना। लेकिन हम उस ईश्वर से जुड़ें कैसे इसके भी कई तरीक़े हैं जैसे-ज्ञान के द्वारा, ध्यान के द्वारा,भक्ति के द्वारा इत्यादि।लेकिन इन माध्यमों के द्वारा भी ईश्वर से तभी जुड़ सकते हैं जब हम अपनी इंद्रियों को वश में करेंगे नहीं तो इंद्रियाँ अपनी तृप्ति चाहती हैं और उनमें समय बर्बाद होता है और अंत में दुःख भी होता है।और यही कारण है कि महर्षि पतंजलि कहते हैं कि चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है क्योंकि जब मन से सारी विषयों की वासनाऐं खत्म हो जाएंगी तो प्रत्येक व्यक्ति के पास समय ही समय होगा और तब ईश्वर से जुड़ने के अलावा और कोई कार्य नहीं बचेगा तब व्यक्ति ये बात अच्छे से जान सकेगा कि सारी समस्याओं का एक ही हल है और वो है ईश्वर के संबंध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जान लेना।
तो इस तरह श्रीमद्भगवद्गीता पढऩे के बाद योग का यही अर्थ निकलता है कि ईश्वर के संबंध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जान लेना और फिर ईश्वर के पूर्ण ज्ञान सहित आनंदमग्न होकर कार्य करना जैसा कि अर्जुन ने किया था क्योंकि युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करना चाहता था कि मेरे सगे-संबंधी जीवित रहेंगे तो मैं सुखी रह पाउंगा लेकिन वो वास्तव में सुखी नहीं हो पा रहा था लेकिन जब उसने ईश्वर के ज्ञान को सुना और ईश्वर से अपने संबंध को जाना तो वो एकदम सुखी हो गया और उत्साह में भरकर युद्ध किया और विजयी भी हुआ। यही योगी की पहचान होती है जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स सन्यासी च योगीच न निरग्निर्न चाक्रियः।।

“जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है वही सन्यासी तथा असली योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला सन्यासी नहीं है तथा क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।”
लेकिन ये जो भिन्न-भिन्न प्रकार के आसन हैं उनक काम है शरीर को स्वस्थ रखना और एक ही स्थिति में काफी देर तक बैठने में महारत हासिल करना जिससे कि अपने मन को किसी एक बिन्दु पर स्थिर किया जा सके और बाकी के विचारों का दमन किया जा सके।

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