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(भाग:215) विधि का विधान कोई नही टाल सकता है स्वर्ण माया मृग को ढूंढने दौड पडे प्रभु श्रीराम

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भाग:215) विधि का विधान कोई नही टाल सकता है स्वर्ण माया मृग को ढूंढने दौड पडे प्रभु श्रीराम

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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रामचरित मानस आदि ग्रंथों की रामकथा में कहा गया है कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के दौरान चलते-चलते एक जंगल में पहुंचे, जिसका नाम पंचवटी था. वहां माता सीता ने सोने का हिरण देखा था. सवाल खड़ा होता है कि क्या सचमुच सोने का हिरण होता है.

विधाता की माया तो देखिए माता सीता ने मारीच को देखा तो सचमुच में सोने का मृग समझ बैठी थीं.
अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियों के बीच उनके जीवन प्रसंगों और उनसे जुड़े स्थानों की चर्चा भी खूब हो रही है. इन्हीं स्थानों में से एक है पंचवटी, जिसका नाम सोने के हिरण के साथ जुड़ता है. रामचरित मानस आदि ग्रंथों की रामकथा में कहा गया है कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के दौरान चलते-चलते एक जंगल में पहुंचे, जिसका नाम पंचवटी था. वहां माता सीता ने सोने का हिरण देखा था. पर सवाल खड़ा होता है कि क्या सचमुच सोने का हिरण होता है. आइए यही जानने की कोशिश करते हैं. साथ ही यह भी जानेंगे कि कहां है वह वन, जहां राम सोने का मृग ढूंढ़ने निकले थे.

पंचवटी से जुड़ी है सूर्पणखा की कहानी
रामकथा में कहा गया है कि लंका के राजा रावण की बहन शूर्पणखा पंचवटी वन में ही रहती थी. उसने अयोध्या को दोनों राजकुमारों को देखा तो उन पर मोहित हो गई. उसने पहले राम के सामने प्रेम विवाह का प्रस्ताव रखा. उनके मना करने पर लक्ष्मण के पास गई. उन्होंने भी मना किया तो अपने असली रूप में आ गई. यहीं पर लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट दी और वह रोते हुए रावण के पास गई.

रावण ने लिया था मारीच का सहारा

अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने राक्षस मारीच को बुलाया. मारीच सुंद और ताड़का का बेटा था और अगस्त्य मुनि के शाप से राक्षस बना था. महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में यज्ञ में बाधा डालने वाला भी मारीच ही था, जिसे 15 साल की उम्र में ही राम ने सबक सिखाया था. यज्ञ की रक्षा के लिए महर्षि विश्वामित्र जब राम-लक्ष्मण को आश्रम ले गए थे तो श्रीराम ने मारीच को एक बाण मारा था, जिससे वह 100 योजन दूर जाकर गिरा और फिर कभी किसी को तंग नहीं किया था. वह मारीच रिश्ते में रावण का मामा था. उसको बुलाकर रावण ने षडयंत्र रचा, जिसके बाद मारीच सोने का मृग बनकर पंचवटी मे विचरण करने लगा था।प

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सोने के मृग की यह है असली कहानी
माता सीता ने मारीच को देखा तो सचमुच में सोने का मृग समझ बैठी थीं. इसी मारीच की बदौलत रावण ने माता सीता का हरण किया था. वास्तव में वह मारीच का एक बहुरूप था और सोने का मृग नहीं होता है. मारीच के वेश बदलने की इसी कला के कारण आगे मृग मारीचिका जैसे मुहावरे का जन्म हुआ, जिसका मतलब है वह दिखना, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं. अयोध्या के आचार्य स्वामी विवेकानंद भी मानते हैं कि सोने का मृग नहीं होता है. वह कहते हैं कि वो तो माया मृग था और मारीच ने ही रावण के कहने पर स्वर्ण मृग का रूप धारण किया था. वह रामचरित मानस के हवाले से बताते हैं

तेहि बननिकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ॥ अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई ॥

यानी जब रावण उस वन के पास पहुंचा, जिसमें श्री रघुनाथजी रहते थे, तब मारीच कपटमृग यानी मायामृग या सोने का मृग बन गया. वह काफी विचित्र था, जिसका कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता. उसने सोने का शरीर मणियों से जड़कर बनाया था. माता सीता के कहने पर राम इसी को ढूंढ़ने निकले थे

नासिक में हिंदुओं का प्रमुख तीर्थस्थल

जिस पंचवटी वन में यह सब हुआ था, आज भी उसका अस्तित्व है और यह महाराष्ट्र के नासिक में स्थित है. यह हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थान बन चुका है. कहा जाता है कि सूर्पणखा की नासिका काटने के कारण ही इस इलाके का नाम नासिक पड़ा. मुंबई से नासिक करीब दो सौ किलोमीटर दूर है, जहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास ही पंचवटी बसा है. बताया जाता है कि पांच वृक्ष होने के कारण इस जगह का नाम पंचवटी पड़ा.

राम-सीता और लक्ष्मण से जुड़े मंदिर

यहां पर सुंदर नारायण नामक एक मंदिर है, जिसके गर्भगृह में तीन मूर्तियां हैं. बीच में नारायण और अगल-बदल देवी लक्ष्मी की प्रतिमा वाला यह मंदिर अलग ही है. इसे इस तरह से बनाया गया है कि 20-21 मार्च को सूर्य की किरणें सीधे भगवान और देवी की प्रतिमा के चरणों पर पड़ती हैं. इसी सुंदर नारायण मंदिर से कुछ दूरी पर सीता गुफा भी है. इस गुफा में श्रीराम-सीता और लक्ष्मण की प्रतिमाएं हैं. बताया जाता है कि दंडकारण्य से गुजरते वक्त तीनों इसी स्थान पर ठहरे थे. इसके अलावा पंचवटी में कालेराम नाम से भी एक प्रमुख मंदिर है. माना जाता है कि पंचवटी में श्रीराम ने यहीं विश्राम किया था. इस मंदिर में राम-सीता और लक्ष्मण की काली मूर्तियां हैं.

जटायु का यहीं किया था तर्पण

इसी पंचवटी से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर वह जंगल भी है, जहां श्रीराम ने गिद्धराज जटायु की अंत्येष्टि की थी. रामकथा के अनुसार रावण के हमले में घायल जटायु ने श्रीराम की गोद में प्राण त्यागे थे. उनके तर्ण के लिए राम ने धरती में बाण मारकर यहीं जल निकाला था. आज इसे सर्वतीर्थ कुंड के नाम से जाना जाता है. पंचवटी के पास ही ब्रह्मगिरि पर्वत है, जिससे गोदावरी नदी निकलती है

श्रीरामलीला महोत्सव के अंतर्गत आयोजित लीलाओं में सुर्पणखा मान मर्दन, खर-दूषण वध और सीता हरण लीलाओं का मंचन किया गया। दर्शकों ने प्रभु श्रीराम की लीलाओं का भरपूर आनंद लिया।
रामलीला सभा की ओर से जयंत लीला के दौरान काक रूप में माता जानकी के चरण में चोंच मारने पर श्रीराम ने उसका नेत्र फोड़ दिया। भगवान श्रीराम ने ऋषियों को दर्शन दिए इसके पश्चात वह पंचवटी पहुंच गए जहां दोनों भाइयों के सुंदर रूप को देखकर सूर्पणखा उन पर मोहित हो गई और उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। न मानने पर सूर्पणखा परेशान हो गई और उसने अपना असली रूप धारण कर लिया, इस पर लक्ष्मण ने श्रीराम के इशारे पर उसके नाक और कान काट लिए।

सूर्पणखा खर-दूषण त्रिसरा के पास पहुंची और अपने नाक, कान काट लेने के बारे में बताया। इस पर उन्होंने रघुनाथ पर चढ़ाई कर दी। श्रीराम ने उन सबका वध कर दिया। इसके बाद श्रीराम के नर लीला करने हेतु माता जानकी ने अपना प्रतिबिंब वहां छोड़कर अग्नि में निवास कर लिया।

रावण ने माया मृग मारीच को वहां भेजा, माया मृग को देख कर सीता ने श्रीराम से मृग की खाल लाने को कहा तो वह लक्ष्मण को छोड़कर उस हिरन के पीछे दौड़ लिए। श्रीराम की खोज में लक्ष्मण के जाने के बाद रावण साधू वेष धर माता सीता का हरण कर लिया। सीताजी का विलाप सुनकर जटायु ने रावण को युद्ध के लिए ललकारा इस पर उन दोनों में जमकर युद्ध हुआ। युद्ध करते हुए जटायु घायल हो गए। श्रीराम और लक्ष्मण के आने के बाद जटायु का मोक्ष आदि लीलाओं का मंचन हुआ।

इस अवसर पर श्रीरामलीला सभा के सभापति उमेश चंद्र अग्रवाल, प्रधान सचिव बनवारी लाल गर्ग, सोहन लाल शर्मा, रामगोपाल शर्मा, सर्वेश शर्मा, सुरेंद्र खोना, विपुल पारीक आदि मौजूद रहे।

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