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शारीरिक जनस्वास्थ्य के रामबाण है अमृत संजीवनी बूटियां

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शारीरिक जनस्वास्थ्य के रामबाण है अमृत संजीवनी बूटियां

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टेकचंद्र शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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केदारनाथ। हिमालय की तलहटी में पाए जाने वाली संजीवनी बूटियों के कोई निश्चित वैज्ञानिक नाम नहीं हैं अपितु संजीवनी बूटिया वनौषधीय मानी गई है. जिन्हे सिर्फ और सिर्फ वनवासी कोल भील किरात कोरखू बैगा जनजाति समुदाय जानते और पंहचानते हैं. दरअसल में वालमीकि रामायण के अनुसार चार प्रमुख संजीवनी जड़ी-बूटियाँ हैं. जिन्हें मृतसंजीवनी, विशल्याकरणी, सुवर्णकर्णी, और संधान्या के नाम से जाना जाता है। वहीं, आधुनिक संदर्भों में सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस को संजीवनी बूटी के रूप में पहचाना जाता है, जिसमें जीवनरक्षक गुण होते हैं। ये संजीबनी बूटियां वालमीकि रामायण में वर्णित है.

जब हनुमान जी लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए गए थे, तब वैद्य सुषेण ने चार प्रकार की बूटियों की सूची दी थी

मृतसंजीवनी: यह जीवन रक्षक बूटी है.

विशल्याकरणी: यह घावों या अस्त्रों के प्रभाव को दूर करने वाली बूटी है।

सुवर्णकर्णी: यह घावों को भरने और रक्तस्राव रोकने वाली बूटी है।

संधान्या: यह टूटी हड्डियों को जोड़ने में मदद करती है .

आधुनिक संदर्भ में संजीवनी बूटी सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस इसे संजीवनी बूटी के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह पौधा एक टेरिडोफाइटिक पौधा है जो सूखी परिस्थितियों में भी खुद को ठीक करने की क्षमता रखता है। इसे “लाइफ-गिविंग” जड़ी-बूटी भी कहा जाता है। इसे कुछ विद्वानों द्वारा कस्तूरी कमल और प्लुरोस्पर्मम कैंडोलेली जैसे पौधों के साथ भी जोड़ा जाता है।यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि रामायण में वर्णित बूटियों की पहचान पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है और सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस को एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जाता है।

संजीवनी बूटी कैसी दिखती है और उसकी क्या महता है ?

संजीवनी बूटी

भारतीय मिथकों और पौराणिक कथाओं में एक प्रसिद्ध औषधि है।

इसे मिथकों में एक चमत्कारिक औषधि के रूप में दिखाया जाता है जो मृतकों को जीवित करने की क्षमता रखती है।हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, संजीवनी बूटी हनुमान जी द्वारा प्राप्त की गई थी।

रामायण में, हनुमान जी लंका में लक्ष्मण जी को जीवित करने के लिए संजीवनी पहाड़ से संजीवनी बूटी लाए थे।

 

संजीवनी बूटी हिन्दू पौराणिक कथाओं और वेदों में उल्लेखित एक विशेष औषधि है। इसे वनस्पति दुर्लभ अथवा अमृत वनस्पति माना जाता है। विशेष रूप से रामायण में इसे महर्षि हनुमान द्वारा प्राप्त किया गया था।

संजीवनी बूटी की महत्ता इसमें स्थित होने वाली जीवनदायिनी शक्ति से जुड़ी हुई है। इसे माना जाता है कि इस बूटी की प्राप्ति श्री राम द्वारा श्रीलंका युद्ध में लक्ष्मण को जीवित करने के लिए की गई थी। संजीवनी बूटी का उपयोग जीवन प्राणों को पुनर्स्थापित करने और मरे हुए को जीवित करने में किया जाता है। इसलिए, यह आयुर्वेदिक औषधि के रूप में महत्वपूर्ण मानी जाती है जो शरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती है।

संजीवनी बूटी को आज किस नाम से जाना जाता है?

संजीवनी एक वनस्पति का नाम है जिसका उपयोग चिकित्सा कार्य के लिये किया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम सेलाजिनेला ब्राहपटेर्सिस है और इसकी उत्पत्ति लगभग तीस अरब वर्ष पहले कार्बोनिफेरस युग से मानी जाती हैं। लखनऊ स्थित वनस्पति अनुसंधान संस्थान में संजीवनी बूटी के जीन की पहचान पर कार्य कर रहे पाँच वनस्पति वैज्ञानिको में से एक डॉ॰ पी.एन. खरे के अनुसार संजीवनी का सम्बंध पौधों के टेरीडोफिया समूह से है जो पृथ्वी पर पैदा होने वाले संवहनी पौधे थे। उन्होंने बताया कि नमी नहीं मिलने पर संजीवनी मुरझाकर पपड़ी जैसी हो जाती है लेकिन इसके बावजूद यह जीवित रहती है और बाद में थोड़ी सी ही नमी मिलने पर यह फिर खिल जाती है। यह पत्थरों तथा शुष्क सतह पर भी उग सकती है।

इसके इसी गुण के कारण वैज्ञानिक इस बात की गहराई से जाँच कर रहे है कि आखिर संजीवनी में ऐसा कौन सा जीन पाया जाता है जो इसे अन्य पौधों से अलग और विषेष दर्जा प्रदान करता है। हालाँकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी असली पहचान भी काफी कठिन है क्योंकि जंगलों में इसके समान ही अनेक ऐसे पौधे और वनस्पतियाँ उगती है जिनसे आसानी से धोखा खाया जा सकता है। मगर कहा जाता है कि चार इंच के आकार वाली संजीवनी लम्बाई में बढ़ने के बजाए सतह पर फैलती है

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