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नैसर्गिक परमात्मा सबकुछ देख रहा है उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता

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नैसर्गिक परमात्मा सबकुछ देख रहा है उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता

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टेकचंद्र शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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नई दिल्ली। जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज ने कहा कि हमारे वैदिक सनातन धर्मशास्त्रों के मुताबिक “प्राकृतिक परमात्मा सबकुछ देख रहा है”उसे कोई असलियत से गुमराह नहीं कर सकता है.कहने का अर्थ यह है कि प्रकृति (निसर्ग) और ब्रह्मांड में मौजूद सब कुछ परमात्मा का ही प्रगट रूप है, और वह हर क्षण, हर जगह, और हर चीज को देख रहा है, जो उसके सर्वज्ञ होने और हर जीव के भीतर रहने का प्रमाण है। यह विचार कि परमात्मा प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, कई धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में पाया जाता है, जहाँ प्रकृति को परमात्मा का ही रूप माना जाता है।

प्रकृति परमात्मा का रूप है के संबंध में विद्धान लोगों का मतों के अनुसार, प्रकृति स्वयं परमात्मा का ही रूप है, या परमात्मा का ही प्रगट रूप है। यानी, प्रकृति में जो भी दिख रहा है, वह परमात्मा की क्रियाशीलता है।

परमात्मा हर जगह है यानी कण कण मे व्याप्त है. परमात्मा हर जीव के भीतर और हर वस्तु में विराजमान है, इसलिए उसकी दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता।

परमात्मा की सर्वज्ञता का

अर्थ यह है कि सर्वज्ञ का अर्थ है कि वह सब कुछ जानने वाला। परमात्मा को हर छोटे-बड़े जीव के बारे में सब कुछ पता है। परमात्मा प्रत्येक जीव के भीतर विराजमान होने के कारण, उसकी चैतन्य दृष्टि से कोई बच नहीं सकता।

जब हम यह समझते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापी है और प्रकृति उसके अस्तित्व का ही प्रकटीकरण है, तो हम उस दिव्य सत्ता को हर जगह अनुभव कर सकते हैं।

प्रकृति से जुड़ना, अपने मन को परमात्मा से जोड़ने के समान है, क्योंकि प्रकृति ही परमात्मा की अनुपम देन है जो हमें जीवन का चक्र संचालित करने और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने का मार्ग दिखाती है।

“प्राकृतिक परमात्मा को कोई असलियत से गुमराह नहीं कर सकता है” इस वाक्य का अर्थ है कि प्रकृति के मूलभूत स्वरूप को कोई भी भ्रम या वास्तविकता से जानबूझकर नहीं बदल सकता है, क्योंकि प्रकृति का मूल स्वभाव ही ‘परमात्मा’ या सर्वोच्च सत्य है, जिसे बदलने का प्रयास निरर्थक है। वास्तव में, यह प्रकृति ही है जो ‘परमात्मा’ या ब्रह्म का स्वरूप है।

प्रकृति ही परमात्मा है जो कि कुछ आध्यात्मिक विचारकों के अनुसार, प्रकृति कोई अलग इकाई नहीं है जो परमात्मा से बंधी हो, बल्कि प्रकृति स्वयं ही परमात्मा का एक रूप है। जब आप इंद्रियों के परे की अवस्था में पहुँचते हैं, तो आपको प्रकृति भी ब्रह्म के समान प्रतीत होती है, जिसका अर्थ है कि सब कुछ ब्रह्म ही है। परमात्मा एक सर्वोच्च सत्ता है जो जन्म और पुनर्जन्म, सुख और दुख, तथा कर्म और कर्मफल से परे है। वह जन्म, मृत्यु, सुख, दुख, और जन्म-पुनर्जन्म के द्वैत से परे एक स्थिर, शाश्वत, आनंदमय, ज्ञानमय, और शक्तिशाली सर्वोच्च आत्मा है।

भ्रम से परे वास्तविकता: इस संदर्भ में, ‘असलियत से गुमराह करना’ का अर्थ है सच्चाई को छिपाना, या जानबूझकर गलत जानकारी देना। परंतु, प्रकृति का यह मूलभूत सत्य, जो परमात्मा का ही स्वरूप है, किसी भी भौतिक या काल्पनिक ‘असलियत’ से बदला नहीं जा सकता, क्योंकि वह स्वयं ही परम सत्य है। जैसे एक डांसर रस्सी पर चलकर अपने आप को और अपने क्रिया -प्रतिक्रियाओं को संतुलित रखती है, वैसे ही प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चलती है। प्रकृति के ये नियम, जिनमें जीवन और मृत्यु का चक्र शामिल है, अटल हैं और कोई भी इन्हें बदलने का प्रयास नहीं कर सकता है। जब मनुष्य अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है, तो वह अपने भाग्य का निर्माण करता है। यह वाक्य इस विचार को बढ़ावा देता है कि हम अपने जीवन के निर्माता स्वयं हैं, और हमें अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना चाहिए।

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