घर में मौजूद माँ की सेवा से मंदिर की देवी होती है प्रसन्न
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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सिवनी। सबसे पहले जो जाग्रत माता है, घर में मौजूद अपनी माँ जिसने आपको जन्म दिया है उसको प्रसन्न कीजिए। मंदिर में रहने वाली माता को जल चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। घर की माँ जब प्रसन्न रहती है तो मंदिर की माँ देवी अपने आप प्रसन्न हो जाती है। उक्ताशय की बात शुक्रवार को ग्राम पिपरियाकला (साठई-केवलारी) में चल रही श्रीमद देवी भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ-चंडीयज्ञ में कथा व्यास आचार्य श्री हितेन्द्र पाण्डेय जी काशी मातृधाम ने उपस्थित श्रद्धालुजनों से कही।
उन्होंने आगे कहा कि जो भगवती का भक्त होता है, जो भगवती की सेवा करता है, सेवा करने वाले भक्त को यदि कोई कष्ट पहुंचाता है। तो ऐसे व्यक्ति को भगवान शंकर जी भी नहीं रोक पाते। भले वह शिव का भक्त ही क्यों न हो। अर्थात उसका अनिष्ट तो होना ही होता है।
उन्होंने आगे कहा कि बेटी की शादी के बाद जिस घर में मायके से मां के द्वारा संदेश पहुंचता हो, मायके से बार-बार फोन से बात करके बेटी को संदेश भेजा जाता है। ससुराल के लोगों के हिसाब से नही चलने की बात कही जाती हो। ऐसे घर में आपकी बेटी कभी सुखी नहीं रह सकती।
उन्होंने आगे कहा कि पुराणों के अनुसार देवी अनुसुइया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके पास साधु का वेश धारण कर भिक्षा मांगने पंहुचे। साधु के वेश में आए त्रिदेव ने उन्हें निर्वस्त्र आकर भिक्षा देने को कहा। देवी अनुसुइया ने अपने प्रताप से उन्हें बाल रूप में बदलकर स्तनपान कराया। देवी अनुसुइया के पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर तीनों ने उनकी गर्भ से जन्म लेने का वरदान उन्हें दिया
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