भाग:245) श्री लक्ष्मण जी के हाथों मेघनाद का वध, सुलोचना सती का सती होना? राम लीला मंचन
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट
राम लीला के दौरान दिखाया गया कि रावण को जब पता चला कि उसका भाई युद्ध में मारा गया तो वह व्याकुल हो उठा। इसके बाद रावण का पुत्र मेघनाद युद्ध के मैदान में फिर से पहुंच जाता है। मेघनाद स्वयं की विजय न होते देख अजेय यज्ञ करने निकुम्भला देवी मंदिर में चला गया। इधर गुप्तचरों के माध्यम से यह जानकारी विभीषण को प्राप्त होती है। इस पर वह चिंतित हो प्रभु राम के पास पहुंचे और गुप्तचरों की बात सुनाई।
कहा कि मेघनाद अजेय यज्ञ कर रहा है यदि उसने अपना यह यज्ञ पूर्ण कर लिया तो वह युद्ध में व्यवधान उत्पन्न कर सकता है। इस पर प्रभु राम ने लक्ष्मण को सेना के साथ यज्ञ विध्वंस करने को भेजा। इस पर मेघनाथ क्रोधित होकर मायावी शक्ति का इस्तेमाल करने लगा। लक्ष्मण और मेघनाद के बीच भीषण युद्ध होता है। तभी लक्ष्मण ने अपने वेग से उसके मस्तक को धड़ से अलग कर दिया। उसकी एक भुजा जाकर पत्नी सुलोचना के पास गिरती है। जिससे उसे पता चल जाता है कि उसका पति युद्ध में मारा गया। इस पर सुलोचना अपने पति का मस्तक लेने श्रीराम के पास पहुंचती है। वह मेघनाद का मस्तक लेकर लंका में पहुंचकर सती हो जाती है। इसके पश्चात मेघनाद का पुतला दहन किया गया। पुतला दहन के मुख्य अतिथि विधान परिषद सदस्य सुधीर गुप्ता एवं पूर्व क्षेत्रीय उपाध्यक्ष विजय गंगवार रहे। इस मौके पर आतिशबाजी का प्रदर्शन भी हुआ। इस मौके पर महंत ओमकार नाथ, सुनील मिश्रा, संजीव मिश्रा, भानु प्रताप सिंह, प्रेम सिंह, नरेश शुक्ला, अमरीश शर्मा, रमाकान्त पाण्डेय, संजीव मोहन अग्रवाल, संजय पाण्डेय, ओमकार सिंह, निशानत तिवारी,प्रदीप शर्मा, विनीत शर्मा, विनीत शर्मा आदि मौजूद रहे। बीसलपुर मेले में हुआ सेतुबंध, अंगद रावण संवाद और लक्ष्मण शक्ति लीला का मंचन हुआ । रामलीला मेले में सोमवार को तुबंध, अंगद रावण संवाद और लक्ष्मण शक्ति लीला का मंचन हुआ।राम लीला में दर्शाया जाता है कि भगवान राम ने रास्ता देने के लिए तीन दिन तक समुद्र की प्रार्थना की। कोई नतीजा न निकलने पर राम ने समुद्र सुखाने के लिए कमान पर बाण साध दिया। तभी समुद्र देव हाथ जोड़कर सामने आ गए और लंका जाने का रास्ता दे दिया। भगवान राम के सुझाव पर अंगद रावण को एक बार और समझाने गए। दरबार में रावण और अंगद का काफी देर तक संवाद हुआ, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। अगले दिन से युद्ध प्रारंभ हो गया। मेघनाथ ने लक्ष्मण को शक्ति बाण से बेहोश कर दिया। यहीं पर लीला का समापन हो गया। लीला का संचालन मेला कमेटी के लीला प्रबंधक गोपाल कृष्ण अग्रवाल और मनोज त्रिपाठी ने किया।
सुलोचना मेघनाथ की पत्नी व भगवान विष्णु के शेषनाग वासुकी की पुत्री थी। चूँकि लक्ष्मण शेषनाग के ही अवतार थे इसलिये वे सुलोचना के पिता व मेघनाथ के ससुर लगते थे। सुलोचना को नाग कन्या कहा जाता था व कुछ पुस्तकों के अनुसार उसका नाम प्रमीला भी बताया गया है। युद्धभूमि में जब मेघनाथ लक्ष्मण के हाथो वीरगति को प्राप्त हो गया था तब सुलोचना अपने पति के शरीर के साथ सती हो गयी थी।
हालाँकि इस कथा का उल्लेख ना तो वाल्मीकि रचित रामायण व ना ही तुलसीदास रचित रामचरितमानस में मिलता है। कुछ अन्य भाषाओँ मुख्यतया तमिल भाषा की कथाओं में इसका प्रमुखता से उल्लेख मिलता है । इसलिये आज हम आपको सुलोचना का चरित्र व उसके सती होने की कथा के बारे में बताएँगे।
सुलोचना का मेघनाथ के सिर के साथ सती होना
सुलोचना व मेघनाथ का अंतिम मिलन था।
तीसरी बार युद्ध में जाते समय मेघनाथ को यह ज्ञात हो गया था कि श्रीराम व लक्ष्मण कोई साधारण मानव नही अपितु स्वयं नारायण का रूप है तो वह अपने माता-पिता व सुलोचना (Sulochana Sati) से अंतिम बार मिलने आया। वह अपने माता-पिता से मिलकर जाने लगा तब उसने सुलोचना को देखा। सुलोचना से वह इसलिये नही मिलना चाहता था क्योंकि उसे लग रहा था कि कही सुलोचना के आंसू देखकर वह भी भावुक हो जायेगा व युद्ध में कमजोर पड़ जायेगा किंतु जब उसने सुलोचना का मुख देखा तो अचंभित रह गया।
सुलोचना के आँख में एक भी आंसू नही था तथा वह अपने पति को गर्व से देख रही थी। हालाँकि उसे भी पता था कि आज उसका अपने पति के साथ अंतिम मिलन है लेकिन एक पतिव्रता व कर्तव्यनिष्ठ नारी होने के कारण उसने अपने पति को युद्ध में जाने से पूर्व उनके कर्तव्य में उनका साथ दिया व अपनी आँख से एक भी आंसू नही गिरने दिया।
मेघनाथ का वध होना (Meghnath Vadh Sulochana Sati Ramayan)
जब लक्ष्मण मेघनाथ का वध करने जाने लगे तब भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि चूँकि सुलोचना एक पतिव्रता नारी है इसलिये मेघनाथ का मस्तक भूमि पर ना गिरे। इसलिये जब लक्ष्मण ने मेघनाथ का मस्तिष्क काटकर धड़ से अलग कर दिया तो उसे श्रीराम के चरणों में रख दिया।
मेघनाथ की भुजा पहुंची सुलोचना के पास
भगवान श्रीराम लंका व सुलोचना को यह बता देना चाहते थे कि युद्ध में मेघनाथ वीरगति को प्राप्त हो चुका है। इसी उद्देश्य से उन्होंने मेघनाथ की दाहिनी भुजा को काटकर धनुष-बाण से सुलोचना के पास पहुंचा दिया। जब सुलोचना ने मेघनाथ की भुजा देखी तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास नही हुआ। उसने उस भुजा से युद्ध का सारा वृतांत लिखने को कहा। उसके बाद एक कलम की सहायता से मेघनाथ की भुजा ने युद्ध मे घटित हुई हर घटना का वृतांत सुलोचना को लिखकर बता दिया।
सुलोचना पहुंची रावण के पास (Sati Sulochana Ki Katha In Hindi)
इसके बाद सुलोचना अपने पति की भुजा लेकर रावण के पास पहुंची व उनसे अपने पति के साथ सती होने की आज्ञा मांगी। रावण ने उसे यह आज्ञा दे दी किंतु पति के सिर के बिना वह सती नही हो सकती थी। इसलिये उसने रावण से मेघनाथ के धड़ की मांग की किंतु रावण ने शत्रु के सामने याचना करने से मना कर दिया।
चूँकि राम एक मर्यादा पुरुषोत्तम पुरुष थे व उनकी सेना में ऐसे अनेक धर्मात्मा थे इसलिये उसने सुलोचना को स्वयं श्रीराम के पास जाकर मेघनाथ का मस्तिष्क लेकर आने की आज्ञा दे दी। सुलोचना लंका नरेश से आज्ञा पाकर श्रीराम की कुटिया की और प्रस्थान कर गयी।
सुलोचना ने माँगा मेघनाथ का सिर (Sulochna Asked For Meghnaad Head)
जब सुलोचना भगवान श्रीराम के पास पहुंची तो श्रीराम व उनकी सेना के द्वारा उनका उचित आदर-सम्मान किया गया व श्रीराम ने उनकी प्रशंसा की। सुलोचना ने भगवान को प्रणाम किया व अपने पति का मस्तिष्क माँगा। श्रीराम ने भी बिना देरी किए महाराज सुग्रीव को मेघनाथ का सिर लाने को कहा किंतु सभी के मन में यह आशंका थी कि आखिर सुलोचना को यह सब कैसे ज्ञात हुआ। तब सुलोचना ने मेघनाथ की भुजा के द्वारा उसे सब बता देने की बात बतायी।
सुग्रीव ने किया अनुरोध (Meghnaad Head Laughing Ramayan)
यह सुनकर मुख्यतया वानर राजा सुग्रीव हतप्रभ थे व उन्होंने सुलोचना से मांग की कि यदि उसके पतिव्रत धर्म में इतनी शक्ति है तो वह इस कटे हुए धड़ को हंसाकर दिखाएँ। यह सुनकर सुलोचना ने उस मस्तिष्क को अपने पतिव्रत धर्म की आज्ञा देकर उसे सबके सामने हंसने को कहा। इतना सुनते ही मेघनाथ का कटा हुआ सिर जोर-जोर से हंसने लगा। सब यह देखकर आश्चर्य में पड़ गये किंतु भगवान श्रीराम सुलोचना के स्वभाव व शक्ति से भलीभांति परिचित थे।
उन्होंने उस दिन युद्ध विराम की घोषणा की व लंका की सेना को अपने युवराज का अंतिम संस्कार करने को कहा ताकि सुलोचना के सती होने में किसी प्रकार का रक्तपात ना हो। इसलिये उस दिन कोई युद्ध नही हुआ था।
सुलोचना का सती होना (Sulochna Ka Sati Hona)
अपने पति का कटा हुआ सिर लेकर सुलोचना लंका आ गयी व समुंद्र किनारे सभी मृत सैनिकों व मेघनाथ की अर्थी सजा गयी। सुलोचना धधकती अग्नि में अपने पति का सिर लेकर बैठ गयी व सभी के सामने सती हो गयी
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