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हे मनुष्य मत कर चिंता और नौटंकी ड्रामा करनी का फल निसर्ग तय करेगा!

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हे मनुष्य मत कर चिंता और नौटंकी ड्रामा करनी का फल निसर्ग तय करेगा

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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बृंदावन। निसर्ग परमात्मा सबकुछ देख रहा है. इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है.वह सब देख रहा और सुन रहा है. उसके सामने कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता है.इसलिए हे मनुष्य किसी भी प्रकार की चिंता और स्वांग करने की आवश्यकता नहीं है.

श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार सिर्फ कर्म कर.जो हमारे हाथ में है.इसमे अपना और पराया कुछ भी नहीं है. हे मनुष्य मत चिंता और मत कर नौटंकी ड्रामा, करनी का फल निसर्ग परमात्मा तय करेगा”हित संत श्री प्रेमानंन्द जी महाराज कहते हैं कि इस वाक्य का समाचार के रूप में कोई सीधा अर्थ यही है. यह एक दार्शनिक विचार है जो भगवद गीता के प्रसिद्ध श्लोक में कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” से आता है, जिसका अर्थ है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है.इस विचार के निहितार्थ है.

यह संदेश आपको फल की चिंता किए बिना अपना काम सत्यासत्य पर आधारित पूरी ईमानदारी निष्ठा और लगन से करने के लिए प्रेरित करता है.

प्रकृति का यही विधान है कि

यहाँ ‘निसर्ग’ का अर्थ प्रकृति या ईश्वर है, जो कर्म के अनुसार फल देता है. इसलिए, कर्म करने के बाद फल की चिंता करने के बजाय, प्रकृति के न्याय पर विश्वास रखना महत्वपूर्ण है.

फल की इच्छा न करने से दुख दूर होता है. जब आप किसी कार्य को बिना किसी अपेक्षा के करते हैं, तो परिणाम कुछ भी हो, आप शांति और संतोष का अनुभव करते हैं.

यदि यह किसी समाचार में प्रयोग किया गया है, तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि किसी घटना या व्यक्ति के कर्मों का परिणाम स्वाभाविक रूप से सामने आएगा. या फिर, यह लोगों को यह याद दिलाने के लिए है कि उन्हें अपने सत्यासत्य काम पर ध्यान देना चाहिए और परिणामों की चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अंतिम परिणाम निसर्ग परमात्मा के नियम के अनुसार तय होंगे.जय जय श्री राधे राधे

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