धर्म स्थलों को पर्यटन स्थल यानी भोग स्थल बनने से रोकना चाहिए!:शंकराचार्य
टेकचंद्र शास्त्री:
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जगन्नाथ पुरी। देश के धर्म स्थलों को पर्यटन स्थल बनाया गया तो वह भौतिक सुख केंद्र यानी भोगस्थल बन जाएगा? जगन्नाथ पुरीपीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद जी सरस्वती महाराज का कहना है कि यह एक सामान्य और व्यापक रूप से मान्य धारणा है, जिसमें तर्कपूर्ण आधार है। जब किसी धार्मिक स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाता है, तो निम्नलिखित बदलावों के कारण यह ‘भोग स्थली’ (यानी ऐसी जगह जहां भौतिक सुख-सुविधाएं और व्यावसायिक गतिविधियां हावी हों) में बदल सकता है:
व्यावसायिककरण पर्यटन स्थल बढ़ने से होटल, रेस्तरां, स्मारिका दुकानें और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान उस क्षेत्र में आ जाते हैं। इससे शांतिपूर्ण, आध्यात्मिक वातावरण की जगह भौतिक सुख लिए लेन-देन और मोल भाव का माहौल बन जाता है।इससे भीड़ बढने से अशांति पैदा होने लगेगी. पर्यटकों की भारी संख्या बढने से धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आवश्यक शांति और पवित्रता को भंग कर सकती है।
प्राथमिकताओं में बदलाव के सबंध मे बतला दें कि धार्मिक स्थल का मूल उद्देश्य पूजा, ध्यान और आध्यात्मिकता होता है।जवकि पर्यटन स्थल बनने पर ध्यान आगंतुकों को आकर्षित करने, सुविधाएं प्रदान करने और राजस्व कमाने पर केंद्रित हो जाता है।
अनुशासनहीनता बढने के कारण कई पर्यटक धार्मिक स्थलों के नियमों और पवित्रता का उतना सम्मान नहीं करते जितना कि भक्त करते हैं, जिससे धार्मिक स्थल की गरिमा कम हो सकती है।
संक्षेप में, पर्यटन का उद्देश्य मनोरंजन और आराम है,इस लौकिक और भौगिक सुख सुविधाएं. जबकि तीर्थयात्रा का उद्देश्य भक्ति और त्याग है। इन दोनों उद्देश्यों के मिश्रण से अक्सर धार्मिक स्थल का मूल स्वरूप बदल जाता है. पूज्य शंकराचार्य का अभिकथन यह है कि धर्म स्थलों की छेडछाड नहीं करेंगे तो ही बेहतर होगा?जिसका नतीजा पिछले पांच साल पूर्व देवभूमि केदारनाथ और बद्रीनाथ चमोली ग्वालियर मे जो पृथ्वी और प्राकृतिक का संतुलन बिगड़ने से कितनी खतरनाक और अप्रीय घटना घट चुकी है. इन अप्रिय घटनाओं से सरकार ने सबक लेकर इसकी पुनरावृत्ति होने से रोकना चाहिए? अन्यथा इसकी परिणति भयावह हो सकती है.इसलिए धर्म स्थलों को धर्म स्थल ही रहने दिया जाना चाहिए.धर्म स्थलों को पर्यटन स्थल ना बनने दिया जाना चाहिए.
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