500 वर्ष संघर्ष के बाद राम मंदिर तो बना परंतु रामाचरण का अभाव
टेकचंद्र शास्त्री:
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अयोध्या। पिछले 500 साल तक संघर्ष के पश्चात आयोध्या रामजन्म भूमि पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर निर्माण तो हुआ परंतु देश के कर्ताधर्ता राजनेताओं मे रामाचरण, रामानुसरण और रामानुकरण का अभाव बना हुआ है.यह एक गहन अध्ययन मनन और चिंतन का विषय है. दरअसल में राजनीति की प्रकृति सत्ता
, स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा पर आधारित होती है, जबकि ‘रामाचरण’ (राम के आचरण का अनुसरण) और ‘रामानुसरण’ (राम के मार्ग पर चलना) त्याग, सेवा, और निस्वार्थता की मांग करते हैं। राजनेताओं के इस विरोधाभास के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं.सत्ता की प्रतिस्पर्धा: राजनीति में चुनाव जीतना और सत्ता हासिल करना मुख्य लक्ष्य होता है, जिसके लिए कई बार साम, दाम, दंड, भेद का उपयोग करना पड़ता है। इसके विपरीत, भगवान राम का जीवन सत्य, मर्यादा और नैतिक मूल्यों पर आधारित था। जबकि राजनीति में अहंकार और स्वार्थ छिपा हुआ रहता है. ‘रामानुसरण’ करना यानी अहंकार के त्याग और निष्पक्ष जनसेवा भाव की अपेक्षा करता है, जबकि आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में व्यक्ति-पूजा और पद का लोभ प्रमुख हो जाता है। राजनीति में सत्ता साधन और साध्य का अंतर राजनेताओं के लिए साध्य (जीत) महत्वपूर्ण होता है, जिसके लिए वे किसी भी साधन का उपयोग कर लेते हैं। वहीं, राम के जीवन में मर्यादा और पवित्र साधनों का अत्यधिक महत्व था।सांस्कृतिक प्रतीक बनाम आदर्श: राजनेताओं ने राम मंदिर के निर्माण को एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विजय के रूप में उपयोग किया है, लेकिन उनके व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में राम के आदर्शों (जैसे- प्रजा के लिए त्याग, भाई-प्रेम, और सभी का सम्मान) को आत्मसात करना कठिन हो जाता है।यही कारण है कि 500 वर्षों के संघर्ष के बाद भव्य मंदिर का निर्माण तो संभव हो सका, लेकिन नेताओं के आचरण में वह आध्यात्मिक बदलाव दिखाई नहीं देता। राजनेता स्वार्थ सत्तासुख के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार रहता है.चुंकि राज सत्ता को समस्त संसारिक ऐश्वर्य सुख अधिभौतिक लाभ तथा विलासिता आनन्दानुभूति की जननी है.सत्ता सुख की जननी है.इसलिए राजनेता सत्तासुख हासिल करने के लिए किसी भी हद तक उतरने के लिए बैठे हैं.एक मर्तबा सत्तासुख मिलने के बाद वह अपनी कई पीढिन दर पीढी एसो आराम की जिन्दगी जी सकता है.सत्तासुख भोगी राजनेता शासन और प्रशासन पर अपना दबदबा कायम रख सकता है.हजार गलतियों के बावजूद सतासुखभोगी राजनेताओं पर उचित कार्रवाई नहीं हो पाई है.सत्तासुख भोगी राजनेताओं को सदैव दूसरे के प्रति ईर्श्या जलनखोरी चोरी चुगलखोरी चापलूसखोरी झूठ छल कपट विश्वासघात धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार की छूट मिलते रहती है. सत्तासुख भोगी राजनेता मुल्ला टोपी पहनकर दरगाह मखबरा और मस्जिद मे प्रवेश करता और माथा टेकता रहता है?परंतु मह सनातन हिन्दू धर्म के मठ मंदिरों भे भगवा गणवेश धारण ना करते हुए पाश्चात्य पोशाक मे बेधड़क प्रवेश करने मे सक्षम रहता है.सत्तासुख राजनेताओ का खानपान और रहन सहन भी पाश्चात्य सांस्कृतिक के अनुकूल देखा और पाया जाता है.सत्तासुख भोगी राजनेताओं को सत्य सनातनियों और सज्जनबृन्दों से घ्रणा और नफरत रहती हैं. सत्तासुख भोगी राजनेता भले ही मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के आचरणों का अनुसरण और अनुकरण ना करता हो परंतु वह निर्दोष और निरपराध श्रीराम भक्तों को झूठे बनावटी और बेबुनियाद आरोपों मे गिरफ्तार करवा सकता है.या जेल भी भिजवा सकता है. दरअसल मे सत्तासुख भोगी राजनेता अपने अवसरवादी चमचों और चाटुकारों के इशारों पर घटिया और घिनौनी राजनीति पर उतारु होना पडता है. इसलिए सत्तासुख भोगी राजनेता कच्चे कान के होते हैं.
मानो उसका भगवान भी कुछ बिगाड नहीं सकता हैं.सत्तासुख भोगी अपने आपको भगवान से कम नहीं समझता है.सत्तासुख भोगी मांसाहारी व्यसनी और पर स्री गामी राजनेता को मठ मंदिरों और धार्मिक समारोहों मे प्रवेश करने की पूरी छूट है.
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