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(भाग:163) गोबर की ढेरी से निकले श्रीगुरुगोरक्षनाथाय नम: हनुमान नरसिंह वाराह दंताय भैरवाय, हर हर महादेव सर्वांंगरक्षा कुरु कुरु स्वाहा:?

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(भाग:163) गोबर की ढेरी से निकले श्रीगुरुगोरक्षनाथाय नम: हनुमान नरसिंह वाराह दंताय भैरवाय, हर हर महादेव सर्वांंगरक्षा कुरु कुरु स्वाहा:?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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क्यों कहीं नहीं मिलती गुरु गोरखनाथ की समाधि स्थली? जो आजन्म रहे ब्रह्मचारी गोरख ने स्त्री रूप क्यों धारण किया ? गुरुनानकदेवजी से कबीर तक का क्या है गोरख से नाता जानिए?
नाथ संप्रदाय के सबसे बड़े विस्तारक और शिव अवतारी माने जाने वाले गुरु गोरक्षनाथ के गोरखपुर स्थित मंदिर में मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा है। इस परंपरा का निर्वहन करने वालों में सबसे आगे है नेपाल राजपरिवार। कहा जाता है कि गोरखभक्त नेपाल में एक समय नाथ योगियों की भिक्षा पर रोक लगा दी गई थी। तब गोरखनाथ ने योगबल से बादलों पर ऐसा नियंत्रण साधा कि वहां बारिश ही रुक गई और अकाल पड़ गया।

नेपाल में बढ़ती दुर्दशा से चिंतित राजा उपाय तलाशने लगा, तो लोगों ने उन्हें गोरख के गुरु बाबा मत्स्येंद्रनाथ के पास जाने की सलाह दी। कहा गया कि समाधिस्थ बाबा गोरक्षनाथ को योगासन से उठाकर मेघों को मुक्त कराना किसी और के लिए संभव नहीं था। आखिरकार, गुरु मत्स्येंद्र जब गोरखनाथ के पास पहुंचे, तो वह उनके स्वागत के लिए अपनी साधना से उठे और मेघ मुक्त हुए। नेपाल में आज भी गोरख का मेघमालासनी स्वरूप पूरा जाता है और इस घटना की स्मृति में मत्स्येंद्रनाथ की हर वर्ष रथयात्रा निकाली जाती है।

कनफटा साधुओं सहित योग, अध्यात्म और समाज सुधार की अनेक परंपराओं से जुड़े नाथ पंथ का विस्तार भारत के अलग-अलग कोनों में है। गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मठ इसकी सबसे प्रमुख पीठ है, जिसके महंत इस समय यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हैं।

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गुरु गोरक्षनाथ को देशज भाषा में कहा जाता है गोरख। मान्यता है कि उन्होंने त्रेतायुग में यहां के जंगलों में तपस्या की थी और अपनी धुनी रमाई। इसी तपोस्थल पर यह गोरखनाथ मठ विराजमान है। आज भी यहां हर समय धुनी जलती रहती है, जिसमें लकड़ी और गाय के गोबर के उपलों का उपयोग होता है।

अहम बात यह है कि गोरखनाथ की तपोस्थली तो पड़ोसी देश से लेकर भारत के अलग-अलग प्रदेशों में मिलती है, लेकिन कहीं भी उनकी समाधि स्थल नहीं है। महायोगी गुरु गोरक्षनाथ विश्वविद्यालय के कुलसचिव और नाथ पंथ के जानकार डॉ. प्रदीप राव कहते हैं कि नाथ परंपरा में गोरखनाथ अमर माने जाते हैं। अलग-अलग युगों में उनके अवतारों और कथाओं का आध्यात्मिक संदर्भों और नाथ संप्रदाय से जुड़ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। यही कारण है कि उनकी तपोस्थली तो कई जगह है, लेकिन कहीं भी समाधि स्थल नहीं बना। ख़ुद गोरख ने लिखा है,
‘मरो वै जोगी मरौ, मरण है मीठा।
मरणी मरौ जिस मरणी, गोरख मरि दीठा।।’

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इसका मतलब यह है कि योगी तुम इस प्रकार मरो, जिस मृत्यु से गोरख ने मरकर ब्रह्म को देखा है यानी संसार से विरक्ति ही आनंद है। तुम उसी प्रकार विरक्त हो जाओ जैसे गोरख हो गया है।

गुरु गोरक्षनाथ के जन्म को लेकर भी कई कथाएं प्रचलित हैं। जो लोककथा सबसे अधिक प्रचलित है, वह गोरख के जन्म को उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ से जोड़ती है। कथा के अनुसार, मत्स्येंद्रनाथ गोदावरी नदी के किनारे बसे चंद्रगिरि से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने एक निसंतान स्त्री सरस्वती से भिक्षा मांगी। सरस्वती जब भिक्षा लेकर आईं, तो मत्स्येंद्रनाथ उनके दुख का कारण समझ गए। उन्होंने एक विभूति दी और कहा कि इसे खा लेना, तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। अविश्वास था या लोकनिंदा का डर, सरस्वती ने वह विभूति खाने के बजाय पास के गोबर के एक ढेर पर डाल दी।

करीब 12 साल बाद जब मत्स्येंद्रनाथ वहां दोबारा पहुंचे, तो उन्होंने सरस्वती से बालक के बारे में पूछा। सरस्वती ने पूरी घटना बताई, तो मत्स्येंद्रनाथ उसे लेकर उस गोबर की ढेरी पर गए। उन्होंने ‘अलख निरंजन’ की आवाज़ लगाई और वहां 12 साल का एक बालक प्रकट हो गया। गोबर से निकलने के चलते गुरु ने उन्हें गोरख नाम दिया और अपने साथ लेकर दीक्षित किया। हालांकि गोरक्ष नाम को इंद्रिय रक्षक और गोरक्षक संदर्भ से भी जोड़ा जाता है।

अलौकिक चमत्कारों और सिद्धियों वाले जिस गुरू मत्स्येंद्रनाथ ने गोरख को शिक्षा-दीक्षा दी, उनको ही उबारने के लिए एक बार गुरु गोरक्ष को कई वर्जनाएं तोड़नी पड़ीं। नाथ पंथ के ग्रंथों और कथाओं में ऐसे ही एक वाकये का ज़िक्र है। नाथ संन्यासियों को स्त्री का साथ वर्जित है। वह पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। कहा जाता है कि एक बार मत्स्येंद्रनाथ कामरूप (वर्तमान असम) की रानी से मिलने गए। वह उनके प्रभाव में आ गए और वहीं बस गए। लंबे समय के बाद जब वह वहां से नहीं आए, तो नाथ परंपरा को लेकर प्रश्न खड़े होने लगे। इसके बाद गुरु गोरखनाथ ने उन्हें इस माया से उबारने का फैसला किया।

गोरखनाथ जब कामरूप पहुंचे, तो उनका उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं हो पाया। दरअसल, वहां रानी की इच्छा के विपरीत पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। स्त्रियों से दूरी बनाए रखने की परंपरा का निर्वहन करने वाले गोरखनाथ को गुरु के उद्धार के लिए आखिरकार नारी का ही रूप धारण करना पड़ा। कथाएं बताती हैं कि गोरखनाथ नृत्यांगना बनकर दरबार में गए। वहां, उनकी ढपली से आध्यात्म के सुर फूटे, गूंजा, ‘जाग मच्छंदर गोरख आया…।’ मत्स्येंद्रनाथ की चेतना लौटी। उन्हें अपने कर्म का आभास हुआ और वह गोरखनाथ के साथ वहां से लौट आए।

आध्यात्मिक संदर्भों और नाथ पंथ की कथाओं में गुरु गोरखनाथ का नाता हर युग से जोड़ा जाता है। उनके द्वारा प्रवर्तित उपसंप्रदायों की संख्या 12 मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों में आठवीं से 11वीं शताब्दी में गोरख का उल्लेख मिलता है। इतिहासकार नौंवी-10वीं शताब्दी में उनके कालक्रम को जोड़ते हैं। राजवंशों में उनकी शिष्य परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। भक्तिकालीन साहित्य में भी गोरखनाथ की रचनाओं का अलग स्थान है। वहीं, गुरु नानक देव से लेकर कबीर तक की लेखनी में गोरखनाथ का ज़िक्र बड़े ही सम्मान के साथ आता है।
कबीर ने कहा है,
सनक सनंदन जैदेउ नांमां। भगति करी मन उनहुं न जाना…
गोरख भरथरी गोपी चंदा। ता मन सौं मिलि करैं अनंदा।

कहने का भाव यह है कि सनक, जयदेव, नामदेव जैसों ने भी साधना की] लेकिन मन की गति को नहीं समझ सके। लेकिन, गोरख, भरथरी ने मन को साधकर आनंद की अनुभूति की। मलिक मोहम्मद जायसी ‘पद्यावत’ में लिखते हैं, ‘जोगी सिद्ध होई तब, जब गोरख सौ भेंट’।

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