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आजादी पूर्व प्रेेस मीडिया पत्रकारों की भूमिका का मूल्यांकन जरुरी

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आजादी पूर्व प्रेेस मीडिया पत्रकारों की भूमिका का मूल्यांकन जरुर

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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नई दिल्ली। आजादी की लड़ाई के दौरान दीनबंधु सीएफ एंड्रयूज ने लाला लाजपत राय से आग्रह किया कि वह अपना ध्यान भारत को एक ऐसा दैनिक पत्र देने के लिए केंन्द्रीत करें, जो भारतीय जनमत के लिए वैसा ही करे जैसा कि सीपी स्कॉट के मांचेस्टर गार्डियन ने ब्रिटिश जनमत के लिए किया। लाला लाजपत राय और उनके सहयोगियों ने सीएफ एंड्रयूज के राष्ट्रवादी सुझाव को सिर-माथे लिया और एक राष्ट्रवादी दैनिक पत्र के प्रकाशन के निमित्त जुट गए।

शीध्र ही लाला लाजपत राय और उनके सहयोगियों ने अक्टुबर, 1904 में समाचार पत्र द पंजाबी का शुभारंभ कर दिया। द पंजाबी ने अपने प्रथम संस्करण से ही आभास करा दिया कि उसका उद्देश्य महज एक दैनिक पत्र बनना नहीं बल्कि ब्रिटिश हुकूमत से भारतमाता की मुक्ति के लिए देश के जनमानस को जाग्रत करना और राजनीतिक चेतना पैदा करना है।

द पंजाबी ने रुस की जार सरकार के विरुद्ध जापान की सफलता की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के साथ ही बंगाल में गर्वनर कर्जन द्वारा प्रेसीडेंसी को दो भागों में विभाजित करने तथा पंजाब में उपराज्यपाल इब्बटसन के भूमि तथा नहर कालोनी कानूनों के मसले पर देशवासियों को जाग्रत किया।

द पंजाबी ने यह भी सुनिश्चित कर दिया कि स्वतंत्रता आंदोलन में मीडिया की भूमिका और उसका सरोकार क्या होना चाहिए। द पंजाबी के अलावा लाजपत राय ने यंग इंडिया, यूनाइटेड स्टेट आॅफ अमेरिका, ए हिंदूज इन्प्रेशंस एंड स्टडी, इंगलैंड डैट टू इंडिया, पोलिटिकल फ्यूचर आॅफ इंडिया जैसे ग्रंथों के माध्यम से जनता को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया और राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नींव डाली।

कहना गलत नहीं होगा की पत्रकारिता का वह जहरीला बीज आजादी के 68 साल बाद आज निकृष्ट पत्रकारिता के रुप में वट वृक्ष बन चुका है जिसकी टहनियां भारत माता की आंचल को खरोंच रही है। मीडिया का यह वर्ग आज राष्ट्रविरोधी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी और नकली प्रगतिशीलता का कवच पहनाकर नायक बनाने पर आमादा है।

बीते दिनों जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्रों के एक वर्ग द्वारा भारत विरोधी नारे लगाए गए और भारत के कई टुकड़े करने की हिमायत की गयी। दुर्भाग्य से मीडिया का यह वर्ग इन राष्ट्रद्रोही छात्रों की जुबान बनता नजर आया। पत्रकारिता का यह वर्ग अपने को राष्ट्रवादी या लोकतांत्रिक होने की चाहे जितनी दुहाई दे लेकिन सच यही है कि उसने अपने नकारात्मक विचारों और तेवरों से राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खंडित किया।

पत्रकारिता के तथाकथित इन अलंबरदारों को गौर करना होगा कि आजादी के दौरान पत्रकारिता के अग्रदूतों ने मूल्य आधारित राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नींव इसलिए डाली कि आजादी के लक्ष्य को हासिल करने के साथ लोकतंत्र का चैथा स्तंभ देश के नागरिकों विशेषकर युवाओं में राष्ट्रीय भावना का संचार करेगा।

कॉरपोरेट कम्युनिकेशन की सुनामी में समा चुकी इस पत्रकारिता के पैरोकारों में न तो सच लिखने का माद्दा है और न ही राष्ट्र के प्रति कोई जवाबदेही और जिम्मेदारी। उनका सिर्फ एक मकसद देश को भ्रमित करना है। उचित होता कि मौजुदा पत्रकारिता के ये सिरमौर लाला लाजपत राय, महामना मदनमोहन मालवीय, विपिनचंद्र पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल सरीखे आजादी के दीवानों की पत्रकारिता को अपना आदर्श मूल्य व विचार बनाते। बाल गंगाधर तिलक ने जब मराठी भाषा में केसरी और अंग्रेजी भाषा में मराठा नामक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ किया तो उन्होंने राष्ट्रीय व सामाजिक सरोकारों को आगे रखा।

उनके आंखों में भारत की आजादी और समतामूलक समाज का सपना था, जो उनके पत्रों में स्पष्ट परिलक्षित और प्रतिबिंबित होता था। उन दिनों कोल्हापुर रियासत के शासन में बड़ा अंधेर मचा था। लाल-पाल-बाल की तिकड़ी के तीसरे नायक व क्रांतिकारी विचारों के जनक विपिन चंद्र पाल ने अपनी धारदार पत्रकारिता के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन में जोश भर दिया। उन्होंने अपने गरम विचारों से स्वदेशी आंदोलन में प्राण फूंका और अपने पत्रों के माध्यम से ब्रिटेन में तैयार उत्पादों का बहिष्कार, मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़ों से परहेज तथा औद्योगिक तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल इत्यादि हथियारों से ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी।

उन्होंने 1880 में परिदर्शक, 1882 में बंगाल पब्लिक ओपिनियन, 1887 में लाहौर ट्रिब्यून, 1892 में द न्यू इंडिया, 1901 में द इनडिपेंडेंट इंडिया, 1906-07 में वंदेमातरम्, 1908-11 में स्वराज, 1913 में हिंदू रिव्यू, 1919-20 द डैमोक्रैट और 1924-25 में बंगाली के जरिए आजादी की लड़ाई को धार दिया और भविष्य की पत्रकारिता के मूल्यों को परिभाषित किया।

राष्ट्रवादी संपादकों, पत्रकारों एवं लेखकों ने अपने संपादकीय, लेखों और खबरों के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिलानी शुरू कर दी। उनका लक्ष्य ब्रिटिश पंजे से भारत को मुक्ति दिलाना ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता बाद एक लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज का निर्माण करना भी था। 18 वीं शताब्दी में जब भारतीय समाज बहु-विवाह, बाल-विवाह, जाति प्रथा और पर्दा-प्रथा जैसी सामाजिक बुराईयों से अभिशप्त था उस दरम्यान भी पत्रकारिता के अग्रदूतों ने समाज को संस्कारित करने का काम किया।

इन अग्रदूतों में से एक राजाराम मोहन राय ने संवाद कौमुदी और मिरातुल अखबार के जरिए भारतीय जनमानस को जाग्रत किया। नवजागरण के परिणाम स्वरुप देश में अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिन्होंने आजादी की जंग में अपनी महती भूमिका निभायी है।

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