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भाग:203) प्रिय भ्राता श्रीरामचंद्र जी की चरण पादुका सिरोधार्य कर भरतकुमार लौटे अयोध्याधाम

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भाग:203) प्रिय भ्राता श्रीरामचंद्र जी की चरण पादुका सिरोधार्य कर भरतकुमार लौटे अयोध्याधाम

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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काफी मनाने के वाबजूद भी श्रीराम वापस अयोध्या आने के लिए तैयार नहीं हुए तौ आखिर श्रीराम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे ही। पिता के वचन की लाज उनको रखना तो था ही, सूर्यवंश की रीति नीति भी निभानी थी। सूर्यवंश की रीति नीति यही कहती है कि वचन के लिए प्राण दे देना ही उत्तम है। उधर त्याग के प्रतिमूर्ति बन चुके भरत कहां पीछे रहते। राम के बिना उन्हें अयोध्या सुहाती नहीं थी तो मांग लिया श्रीराम का खड़ाऊं और उसे लाकर अयोध्या के सिंहासन पर प्रतिस्थापित कर चले गए नंदीग्राम निवास करने। रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला के पंद्रहवें दिन इन्हीं प्रसंगों का मंचन किया गया।

प्रसंग के मुताबिक अभी सब इस विमर्श में व्यस्त थे कि आखिर होगा क्या। श्रीराम भरत का प्रस्ताव मानेंगे या नहीं। श्रीराम भरत को समझाते हुए कहते हैं कि रघुकुल की रीति तो तुम जानते ही हो। वचन निभाने से बढ़कर कुछ भी नहीं है। फिर तुमको भी सिर्फ एक अवधि भर की कठिनाई है। राम के समझाने पर भरत मान तो जाते हैं लेकिन श्रीराम से उनकी खड़ाऊं मांग लेते हैं। भरत अयोध्या लौटने के लिए तैयार हो गए। अयोध्या लौटने से पूर्व भरत चित्रकूट के पावन स्थलों को देखने की इच्छा व्यक्त करते हैं। अत्रि मुनि के कहने पर भरत ने पहाड़ के समीप स्थित एक कूप में श्रीराम के राज्याभिषेक के लिए लाए गए सभी तीर्थों का जल रख दिया। मुनि ने उसको भरत कूप नाम दिया। जिसकी महिमा राम ने सब को बताते हुए कहा कि इस कूप के जल के सेवन से मनुष्य रोग व्याधि मुक्त रहेगी।
श्रीराम की चरण पादुका लेकर अयोध्या लौटे भरत
जासं, चंदौली : सैयदराजा में चल रही रामलीला के आठवें दिन बुधवार को भरत द्वारा राम की चरण

श्रीराम की चरण पादुका लेकर अयोध्या लौटे भरत

जासं, चंदौली : सैयदराजा में चल रही रामलीला के आठवें दिन बुधवार को भरत द्वारा राम की चरण पादुका का ¨सहासन, जयंत नेत्र भंग व सती अनुसूइया मिलन का मंचन किया गया। रामलीला देखने को दर्शकों की भीड़ उमड़ी थी।

मंचन में प्रभु श्री राम को वन से वापस लाने को लोग कई प्रकार की सवारियां सजाने लगे। माताओं के लिए पालकी सजाई गई। सबको रवाना करके शत्रुघ्न के साथ भरत पैदल ही ही जाना चाह रहे थे। माता कौशल्या के कहने पर भरत रथ पर सवार होकर चल दिए। प्रथम दिन तमसा और दूसरे दिन गोमती के तीर विश्राम कर श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुंचे। भरत जी के साथ सेना होने के कारण निषादराज को दुख हुआ कि उनके हृदय में कुछ कपट है। भरत जी से भेंट होने पर उनका भ्रम समाप्त हो गया। भरत जी गंगा नदी के किनारे पहुंच गए। गंगा व त्रिवेणी में स्नान कर उन्होंने वरदान मांगे फिर भारद्वाज मुनि के पास आए। यहां से चित्रकूट पहुंचने पर प्रभु श्री राम को बैठा देख भरत जी प्रसन्न हुए। भरत जी को देखते ही प्रभु श्री रामचंद्र जी उन्हें हृदय से लगा लिया। भरत जी प्रभु श्री राम की चरण पादुका लेकर लौट आए। चरण पादुका को ¨सहासन पर रखकर उसकी आज्ञा अनुसार राजकाज करने लगे। प्रभु श्री रामचंद्र माता सीता के साथ शिला पर बैठे थे। उसी समय देवराज इंद्र का मूर्ख पुत्र जयंत कौवे का रूप धारण कर सीता जी के चरणों में चोंच मार कर भाग निकला। मां सीता के पैरों से रक्त बहता देख श्री रघुनाथ ने उसे दंडित करने को तीर चलाई। जयंत इंद्र व दुर्वासा ऋषि के पास गया लेकिन शरण नहीं मिला तो नारद के कहने पर वह प्रभु श्री राम की शरण में पहुंचा। श्रीराम ने उसकी एक आंख फोड़ने के बाद छोड़ दिया। फिर मुनियों से विदा ले अभी जी के आश्रम में गए। ऐसी अति सुंदर रामलीला देखकर लोग भाव विभोर हो गए

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