Breaking News

(भाग:212) निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र कपट न भावा।यह बात श्रीराम ने हनुमान जी महाराज से कहा है।

Advertisements

भाग :212) निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र कपट न भावा।यह बात श्रीराम ने हनुमान जी महाराज से कहा है।

Advertisements

टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

Advertisements

निर्मल मन जन मोहि पावा मोहे छल छिद्र कपट नहीं भावा । अर्थात मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहते हैं कि हे हनुमान हमे झूठ छल छिद्र कपट ईर्ष्या जलनखोरी चोरी चुगलखोरी चापलूसखोरी,हत्या, मांसाहार, नशापान, विश्वासघात,पर स्त्री गमन, व्यभिचार कतई बर्दास्त नहीं है। भगवान श्रीराम कहते हैं कि भक्त निष्पाप और निष्कलंक होता है ? भगवान निरंतर अपने भक्त को देख रहा है। श्रीराम कहते हैं कि भगवान का भक्त मुझे बहुत प्रिय है।कहने का मतलब है कि जब तक मन शुद्ध नहीं होगा, तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती है।मन अगर शुद्ध हो गया तो चरित्र भी शुद्ध हो जाएगा और अगर चरित्र शुद्ध होगा तो भगवान तक अवश्य पहुंच जाओगे। बाल सुलभ सरलता एवं निश्छलता ही ईश्वर प्राप्ति की सच्ची योग्यता हैं । भगवान अजर अमर अजन्मा अगोचर और अविनाशी है,पृत्थ्वी निसर्ग रुपी परमात्मा की कृपा से ही बिना भेद-भाव के सभी जीवधारी जीव जन्तुओं,जलचर धलचर और नभचर जीव जन्तुओं, अर्थात चराचर जगत प्राणियों और वनोषधीय वनस्पति को जीवन प्राणदायिनी जलवायू और प्राणवायू उपलब्ध करवा रहा है। परंतु प्रकृति किसी को माफ नहीं करती है। परमात्मा किसी को दण्ड नहीं देता परंतु कर्म और अकर्म का फल भुगतना ही पडता है।

क्योंंकि परमात्मा का स्मरण, उनकी भक्ति और उनकी उपासना, हम उनके अनुग्रह के बिना नहीं कर सकते| साधना तो एक बहाना यानि साधन मात्र है जिस से हमारा अन्तःकरण शुद्ध होता है, पर मुख्य चीज तो भगवान की कृपा है जो करुणावश वे स्वयं ही करते हैं| हमारे अज्ञान का निराकरण भी उनकी कृपा से ही होता है| भगवान स्वयं ही कहते हैं कि जिनका मन निर्मल होता है वे ही उन्हें पा सकते हैं, उन्हें छल-कपट पसंद नहीं है| साधना से हमारा मन निर्मल होता है| साधना भी बिना प्रेम के नहीं हो सकती अतः सबसे पहिला कार्य तो भगवान के प्रति प्रेम जागृत कर उसे विकसित करना है|
धर्म शास्त्रों के अनुसार छल कपट पूर्वक धनार्जन करना वर्जित माना गया है।क्योंकि पाप और पाखंड के जरिए कमाया हुआ धन नर्क यातना दिलाता है।

ब्रह्मा जी ने जब यह सृष्टि रची तब ब्रह्मज्ञान सर्वप्रथम अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्व को दिया| अब इस पर ज़रा विचार कीजिये कि ब्रह्मा जी के ज्येष्ठ पुत्र अथर्व कौन थे| थर्व का अर्थ होता है …. कुटिलता| अथर्व वे सारे ऋषि-मुनि थे जिनके मन में कोई कुटिलता नहीं थी| अथर्व ने वह ब्रह्मज्ञान सत्यवाह को दिया| सत्यवाह का अर्थ होता है जो सत्य का वहन करते हैं, यानि सत्यनिष्ठ होते हैं| तत्पश्चात वह ब्रह्मज्ञान सत्यवाह ऋषियों को मिला| अतः प्रभु का अनुग्रह पाने के लिए स्वयं को ही अथर्व और सत्यवाह बनना पड़ता है| हमारे मन में कोई कुटिलता नहीं हो और हम सत्यनिष्ठ हों| तभी हम प्रभु की कृपा को पाने के पात्र हैं| वह पात्रता साधना से आती है| परमात्मा के सर्वश्रेष्ठ साकार रूप आप सब को नमन !

मैं नित्य प्रातः का सूर्योदय देख पा रहा हूँ, और भगवान हर पल मुझे पर अपनी स्मृति में रखते हैं, यह निश्चित रूप से उन कुछ गिनी चुनी महान आत्माओं का पुण्यप्रताप है जो इस पुण्य धरा पर अब भी बिराजमान हैं| उनके पुण्यों और आशीर्वाद से ही मैं जीवित हूँ| मेरी हर सांस उन्हीं का आशीर्वाद है, अन्यथा मेरा अपना कुछ भी नहीं है|

उक्त बातें पंचदेवरी प्रखंड के बनकटिया स्थित वैष्णवमठ में आयोजित विष्णु महायज्ञ के छठवें दिन प्रसिद्ध कथाव्यास अच्युतानंद शास्त्री वेदांती जी ने कहा । उन्होंने कहा कि प्रतीक पुतनादिक असुरों की संघार लीला,हमारे हृदयस्थ दुर्गुण रूपी दैत्यों का संघार रूप, शरणागत भक्तों का आध्यात्मिक उद्धार हैं,हमसभी को अपने जप तप व्रत सेवारूप साधना को सफल बनाने के लिये,आत्म कल्याण के लिये,ब्रजवासियों की भांति ईश्वर के शरण मे रहना चाहिए,तथा निर्भर निश्चिन्त एवं प्रेममय जीवन जीना चाहिए

गोसेवा साक्षात गोपाल की ही सेवा है

वेदांती जी ने भगवान के गोचारण एवं माखनचोरी लीला का तात्विक भाव बताते हुवे कहा कि भगवान भावुक भक्तों के निर्मल मख्खन जैसे मन को चुराकर प्रभु अपना निवास बनालेते है,भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए,हम सभी को गोपाल प्रभु के सबसे प्रिय कार्य गोसेवा को अवश्य करना चाहिए, गोसेवा साक्षात गोपाल की ही सेवा हैं,गोमाता के शरीर मे समस्त देवताओं का नित्य निवास होता हैं, हम सभी को गोवंश के रक्षण पोषण एवं सम्वर्धन में तन मन धन से निरत रहना चाहिए।

पंचदेवरी म प्रवचन सुनते श्रोता

महायज्ञ में प्रवचन देते महाराज जी

प्रभु के शरण में जाने पर सब भार उठा लेते है

वेदांती जी ने चीरहरण कलियमर्दन एवं गोवर्धनधारण लीला के प्रसंङ्ग में कहा कि साधक जब भव भय हरण गिरिराजधरण की पावन शरण स्वीकार करता है, तब प्रभु अपने शरणागत सेवकों को संसार के भय से निर्भय कर,सदा के लिए अपना बना लेते है,भक्त के जीवन कर्तव्य रूप सारे भार को गोवर्धन पर्वत की भांति उठा लेते हैं। मोके पर आयोजन समिति के सदस्य स्थानीय मुखिया पुत्र मुन्ना यादव , संत पदम दास जी महाराज , उपेन्द्र तिवारी , प्रभुनाथ सिंह , हाकिम यादव सरपंच सुदामा लाल श्रीवास्तव , शम्भू पांडेय सहित तमाम श्रद्धालु मौजूद थे

निष्काम भाव से भक्ति
गुरु नानक ने मालिक भागो के छत्तीस प्रकार के भोजन का त्याग करके भाई लालो का रूखा-सूखा भोजन स्वीकार करके उन्हें आशीर्वाद दिया। भगवान राम ने आसपास के ऋषि-मुनियों की सेवा को त्याग कर शबरी के बेर स्वीकार किए क्योंकि भक्ति में भावना की महत्ता होती है। हनुमानजी निष्काम भाव से भगवान राम की भक्ति में संलग्र रहे, उनके सभी अद्भुत कार्य अपने स्वामी रामजी के निमित्त थे। समुद्र पार करते समय मैनाक पर्वत की प्रार्थना (कुछ देर विश्राम कर लो) पर कहने लगे, राम काज किए बिना मो को कहां विश्राम। सेवा में ऐसा भाव कि पहले आज्ञा पालन होना चाहिए। संजीवनी बूटी का लाना, सीता जी का पता लगाना, लंका दहन आदि कार्य केवल सेवा भाव से किए और अपने सद्गुरु को प्रसन्न किया। भगवान राम ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर कहा।

सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहि कोई सुर नर मुनि तनुधारी।
प्रीति उपकार करौं का तोरा।
समनुख होइ न सकत मन मोरा।

भगवान श्रीराम जी के अपने प्रति भाव भीने वचन सुनकर हनुमान जी की आंखों में आंसू आ गए और कहने लगे।

सुनि प्रभु वचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि-त्राहि भगवंत।।

सेवा भाव का इससे बड़ा मूल्यांकन कौन कर सकता है। संत निरंकारी मिशन में सत्य के प्रचार प्रसार हेतु स्थान-स्थान पर संत समागमों का आयोजन किया जाता है, उनकी सारी व्यवस्था और प्रबंध सेवा दल के नौजवान भाई व बहनें करती हैं।
दयालु सद्गुरु मिशन के प्रत्येक संत को इस सेवा में भागीदार बनाकर सुखी करने का सुअवसर देते हैं जिस से पूरे निरंकारी जगत का सांझा गौरव बन सके। चाचा प्रताप सिंह जी के मन में हर समय सेवा का ध्यान रहता था। उनका कहना था कि हम सेवा करने के लिए पैदा हुए हैं और बाकी सब हमसे सेवा लेने के लिए पैदा हुए हैं। किसी भी प्रकार से गई सेवा खाली नहीं जाती। कबीर जी कहते हैं।

कबीरा सेवा साध की खीझ करो या रीझ।
जो बोओगे सो उगेगा उल्टा सीधा बीज।।

बीज धरती में उल्टा पड़े या सीधा उसने तो उगना ही है। इसी प्रकार सेवा खुशी से करो या मजबूरी में, उसका फल तो मिलता ही है। सेवा के लिए सद्गुरु से प्रार्थना करनी चाहिए। इसकी कृपा हो तभी सेवा हो सकती है। अवतार बाणी में कहा गया है।
साध दी सेवा ओह कर सके, जिस तो आप करावे एह। अवतार ओ गावे सिफत हरि दी जिस तो आप गवावे एह।।
इतिहास साक्षी है कि जिन भक्तों ने सद्गुरु को निरंकार मान, हर आदेश को अपनाया, वे पैगंबर के रूप में भी प्रकट हुए और विशेष गुरसिख के रूप में भी पूजनीय बने, जिन्हें हम आज भी श्रद्धा से याद करते हैं। सेवा करते हुए भाई लहणा जी श्रीगुरु अंगद देवजी के रूप में प्रकट हुए। भाई अमरू जी ने भी 73 वर्ष की आयु तक गुरु की सेवा की, हर हुक्म का पालन किया और वह श्री गुरु अमरदास जी के रूप में प्रकट हुए, युगपुरुष कहलाए। ऐसे अनेक संत हुए जिन्होंने अपने-अपने वक्त के सद्गुरु के समक्ष अपने जीवन को सेवा में समर्पित किया। भाई लालो, मीआं मीर, भाई कन्हैया, हनुमान जी, चाचा प्रताप सिंह और भी अनेको गुरसिख हुए जिन्होंने निष्काम सेवा करके सद्गुरु के आदेश का पालन किया और अपना और अपने पूर्वजों का नाम रोशन करते हैं।
नगर के धौर्रा मंदिर में चल रही श्री रामकथा का संगीतमय आयोजन चल रहा है। श्री राम कथा में रोज सैकड़ों रामभक्त श्रोतागण कथा का रसपान कर आनंद की अनुभूति कर धर्म लाभ ले रहे हैं।

युग तुलसी के नाम से मशहूर कथा वाचक रामकिंकर महाराज के शिष्य कथा वाचक पंडित उमाशंकर व्यास द्वारा श्री राम कथा का वाचन किया जा रहा है। इस 5 दिवसीय श्रीरामकथा का बीते रोज विश्राम हो गया। अंतिम दिन कथा वाचक व्यास उमाशंकर व्यास ने भगवान शिव पार्वती विवाह की कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। पांचवें दिन श्रीरामकथा के प्रारंभ में मंगलाचरण कर कथा सुनाते हुए उमाशंकर व्यास ने कहा कि कलयुग में भक्ति का सबसे सरल मार्ग भगवान नाम संकीर्तन। भगवान को पाने के लिए निष्काम भाव से राम जी की भक्ति करनी चाहिए। क्योंकि राम विष्णु का अवतार हैं, कलयुग में सिर्फ भगवान के नाम मात्र जपने से भवसागर से पार हो जाएंगे।

कथा व्यास उमाशंकर कहा कि रामायण में तुलसीदास जी ने भी कहा है “कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा। “व्यक्ति को हर समय भगवान के नाम का जप करना चाहिए। उन्होंने भगवान शिव और पार्वती के विवाह की कथा सुनाते हुए बताया कि जब शिवजी के विवाह की चर्चा हो रही थी, तब शिवजी कैलाश पर्वत पर समाधि में लीन थे और जब समाधि टूटी तो उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया।

नौगांव। श्रीराम कथा का वाचन करते उमाशंकर व्यास।

बारात में भूत-प्रेत, सांप बिच्छू देख मैना रानी हुईं मूर्छित

भगवान श्रीराम के कहने पर शिवजी विवाह के लिए तैयार हुए, लेकिन जब बारात में हिमांचल नगरी में मैना रानी ने भूत-प्रेत, सांप बिच्छू आदि को देखा तो वह चक्कर खाकर गिर गईं। तब ब्रह्माजी के समझाने पर जब मैना रानी को दर्शन हुए तब शिव का पार्वती के साथ विवाह संपन्न हुआ। इस प्रसंग के साथ ही कथा का विश्राम हो गया। कथा के विश्राम पर आरती और प्रसाद वितरण किया गया। इस अवसर पर जयनारायण अग्रवाल, पंकज अग्रवाल संटू, संतोष अग्रवाल, बीबी साहू, पीएन तिवारी, आरएस नायक, हरिप्रकाश अग्रवाल, लखनलाल असाटी, प्रहलाद अग्रवाल सहित अनेक लोग रहे।

Advertisements

About विश्व भारत

Check Also

(भाग:301)चक्रवर्ती सम्राट दशरथ-कौशल्यानंन्द नंदन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जन्म और रामनवमी की महिमा

(भाग:301)चक्रवर्ती सम्राट दशरथ-कौशल्यानंन्द नंदन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जन्म और रामनवमी की महिमा टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: …

(भाग:300) देवी देवता और असुर भी करते हैं माता सिद्धिदात्री की नवधा भक्ति पूजा अर्चना और प्रार्थना

(भाग:300) देवी देवता और असुर भी करते हैं माता सिद्धिदात्री की नवधा भक्ति पूजा अर्चना …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *