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(भाग:237)श्रीलंका की हिन्दू संस्कृति का इतिहास में राम-रावण युद्ध का साक्षी है रावणबोडा पर्वतीय परिक्षेत्र 

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भाग:237)श्रीलंका की हिन्दू संस्कृति का इतिहास में राम-रावण युद्ध का साक्षी है रावणबोडा पर्वतीय परिक्षेत्र

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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श्रीलंका में राम-रावण युद्ध का साक्षी है रामबोडा तथा रावणबोडा पर्वत का इतिहास जानिएगा।

श्रीलंका का नगर नुवारा एलिया में राम-रावण युद्ध का साक्षी रामबोडा तथा रावणबोडा पर्वतीय परिक्षेत्र इस बात का गवाह है।

अनेक अभ्यासी तथा इतिहास विशेषज्ञों ने अभी तक श्रीलंका के ९ प्रांतों में रामायण से संबंधित अनेक स्थान ढूंढ लिए हैं । उनमें से अधिकतम स्थान श्रीलंका के मध्य प्रांत में हैं । इन प्रांत का सबसे बडा और प्रमुख नगर है ‘नुवारा एलिया’ ! इस नगर के निकट अशोक वाटिका, रावण गुफा, रावण जलप्रपात, हनुमानजी के पदचिन्ह, रावणपुत्र मेघनाद का तपश्‍चर्या का स्थान, राम-रावण युद्ध से संबंधित क्षेत्र, ऐसे अनेक स्थान हैं । ‘नुवारा एलिया’ का वातावरण ठंडा है; क्योंकि यह प्रदेश ऊंचे पर्वत पर स्थित है । आईए, इस परिसर के कुछ स्थानों के विषय में देखते हैं ।

१. रामबोडा पर्वत : हनुमानजी जब सीतामाता की खोज कर रहे थे, तब उन्होंने इस पर्वत पर विश्राम तथा सैर भी किया था

अब आध्यात्मिक संस्था चिन्मय मिशन द्वारा १६ फुट ऊंचाईवाली हनुमानजी की मूर्तिवाले मंदिर का निर्माण किये जाने की। योजना है।

श्रीरामजी के अनन्य सेवक वायुपुत्र हनुमानजी रामेश्‍वरम् के समुद्र से उडान भरकर आकाशमार्ग से उत्तरी लंका में प्रवेश करते हैं । अशोक वाटिका लंका के मध्यभाग में अर्थात ‘नुवारा एलिया’ नगर के निकट होने से हनुमानजी उस दिशा में अपनी यात्रा करते हैं । हनुमानजी एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर छलांग लगाते जाते हैं । अशोक वाटिका के ३५ कि.मी. पहले हनुमानजी, जहां विश्राम के लिए रुके थे, वह स्थान है आज का रामबोडा पर्वत ! यहां हनुमानजी कुछ समय श्रीरामजी का स्मरण करते हुए ध्यान लगाए बैठे थे । उसके पश्‍चात अंतप्रेरणा से हनुमानजी ने आकाशमार्ग से अशोक वाटिका की ओर उडान भरी । अब इसी स्थान पर भारत की एक आध्यात्मिक संस्था चिन्मय मिशन ने १६ फुट ऊंची हनुमानजी की मूर्तिवाले मंदिर का निर्माण किया है । यहां श्रीरामनवमी तथा हनुमानजयंती के दिन उस परिसर के हिन्दू एकत्र होते हैं ।

 

२. रावणबोडा पर्वत : इस पर्वत पर राम-रावण युद्ध आरंभ होना है

यहां रामबोडा पर्वत की भांति अनेक पर्वत हैं । रामबोडा पर्वत के सामने जो पर्वत है, उसे रावणबोडा पर्वत कहते हैं । श्रीरामजी तथा लक्ष्मण अपनी वानरसेना के साथ जब लंका आए, तब वे प्रवास करते-करते अंततः रामबोडा पर्वत पहुंचे । वहां उन्होंने वानरसेना के लिए सेना-शिविर लगाया । रावण की सेना ने रामबोडा पर्वत के सामनेवाले पर्वत पर अपना शिविर लगाया । इसलिए उसे रावणबोडा पर्वत कहा जाता है । इसकी विशेषता यह है कि रामबोडा तथा रावणबोडा, ये दोनों पर्वत चाहे एक-दूसरे के सामने हों परंतु कोई भी सहजता के साथ एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर नहीं जा सकता; क्योंकि इन दोनों पर्वतों के मध्य में महावेली गंगा नदी है । स्थानीय लोग तथा चिन्मय मिशन के पदाधिकारियों ने हमें बताया कि श्रीरामजी की सेना तथा रावण की सेना के मध्य यहां पहला युद्ध आरंभ हुआ । रावणबोडा पर्वत में रावण ने अपनी मायावी शक्ति से अनेक सुरंगमार्ग बनाकर अपने सेना के छिपने का प्रबंध किया था । रावण की सेना ने अनेक दिनों तक इस प्रदेश में रहकर मायावी युद्ध किया था । सबसे आश्‍चर्य की बात यह कि स्थानीय लोगों ने हमें बताया कि रावणबोडा पर्वत की ओर देखने पर ऐसा लगता है मानो वहां हनुमानजी सोए हुए हैं । (छायाचित्र देखें ।)

 

हनुमानजी के रामभक्ति की महानता !

श्रीलंका के रामबोडा तथा रावणबोडा पर्वतों पर श्रीरामजी की वानरसेना तथा रावणासुर की मायावी सेना के मध्य ६ मास तक (महिने) युद्ध चला । इस युद्ध में एक बार श्रीरामजी तथा लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं, तब जांबुवंत बिभीषण के पास आकर कहते हैं,

 

तस्मिञ्जीवति वीरे तु हतमप्यहतं बलम् ।

 

हनूमत्युज्झितप्राणे जीवन्तोऽपि वयं हताः ॥

 

– वाल्मीकिरामायण, कांड ६, सर्ग ६१, श्‍लोक २२

 

अर्थ : यदि श्रीरामजी की सभी सेना मृत हो गई, तब भी श्रीरामजी की सेना जीवित है; परंतु यदि हनुमानजी ने अपना शरीर त्याग दिया, तो हम सभी जीवित होते हुए भी प्राणविहीन हैं । इससे श्रीरामभक्त हनुमानजी की महानता ध्यान में आती है । भक्त अपनी भक्ति के बल पर युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है, इसकी शिक्षा देनेवाले हनुमानजी के चरणों में तथा रामायण करवानेवाले श्रीमन्नारायणजी के अवतार श्रीरामजी के चरणों में हम सभी साधक नतमस्तक हैं

श्रीरामचरितमानस और अनेकों रिसर्चर्स के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से शुरू करते हुए श्रीलंका में खत्म की थी। इस दौरान उनके साथ जिस जगह भी जो घटनाएं हुई, उन 200 स्थानों की पहचान की गई

श्रीरामचरितमानस और अनेकों रिसर्चर्स के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से शुरू करते हुए श्रीलंका में खत्म की थी। इस दौरान उनके साथ जिस जगह भी जो घटनाएं हुई, उन 200 स्थानों की पहचान की गई है। यहां आज हम आपको उनमें से 7 ऐसी प्रमुख जगहों के बारे में बताने वाले हैं, जहां 14 साल वनवास के दौरान प्रभु होकर गए थे या ठहरे थे। चलिए उन जगहों के बारे में जानते हैं।

अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान अयोध्या से लंका के बीच इन 7 जगहों पर रुके थे भगवान राम, देवी सीता और लक्ष्मण

 

अगर आपको रामायण के बारे में अच्छे से जानना है, तो एक बार अयोध्या जरूर जाएं। अयोध्या, उत्तर प्रदेश में फैजाबाद के पास एक जगह है, जो भगवान राम के जन्मस्थान के रूप में जानी जाती है। यहां कई मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल हैं, जो इन्हें रामायण से जोड़ते हैं। कनक भवन मंदिर, हनुमान गढ़ी मंदिर, सरयू नदी घाट यहां की कुछ देखने लायक जगहें, जहां घूमने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

 

माना जाता है कि यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक, चित्रकूट में भगवान राम, और लक्ष्मण और देवी सीता 11 साल से यहां रुके थे। यहीं पर राम और सीता की मुलाकात सात अमर संतों में से एक अत्री और उनकी पत्नी अनुसूया देवी से हुई थी। वर्तमान चित्रकूट में सब कुछ राम से संबंधित है। रामघाट, हनुमान धारा, कामदगिरी, जानकी कुंड, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी, सीता की रसोई, देवी अनुसूया मंदिर यहां की कुछ देखने लायक जगहों में आते हैं।

रामायण में नासिक का उल्लेख पंचवटी के रूप में मिलता है। नासिक का ये नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि यहीं पर लक्ष्मण ने सुपर्ण्खा की नाक काटी थी। यह हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए भारत में सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां कला राम मंदिर पंचवटी के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में जाना जाता है। अन्य स्थानों के अलावा, आप सीता गुफा (सीता की गुफा) और कपालेश्वर मंदिर भी जा सकते हैं। हर 12 साल में तीर्थयात्री यहां कुंभ मेला देखने आते हैं।

 

लेपाक्षी आंध्र प्रदेश का एक प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल है। रामायण में, यहीं पर जटायु रावण से सीता को बचाने के लिए उससे लड़ने की कोशिश करता है। लेकिन आखिर में वो घायल होकर नीचे गिर जाता है। ऐसा कहा जाता है कि लेपाक्षी ही वही जगह है, जहां ये घटना हुई थी। यहां आप जब भी आएं, तो एक बार वीरभद्र मंदिर जरूर जाएं। यहां दुनिया की सबसे बड़ी नंदी मूर्ती स्थापित है।

 

श्रीलंका में ये वही जगह है, जहां राम ने रावण का वध किया था। इसके बाद, राम के कहने पर, रावण के भाई विभीषण लंका के राजा घोषित किए गए थे। इसके तुरंत बाद, सीता, राम और लक्ष्मण अपने परिवार के साथ फिर से अयोध्या के लिए रवाना हो गए थे। वर्तमान में यह स्थान मन्नार द्वीप के उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित है। आप मन्नार से सड़क मार्ग से यहां पहुंच सकते हैं जो द्वीप को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।

सभी स्थानों में सबसे प्रसिद्ध, रामेश्वरम वो जगह है, जहां राम की सेना द्वारा भारत और श्रीलंका के बीच पुल का निर्माण किया गया था। यह स्थान सुंदर विवेकानंद मंदिर और शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। ऐसा भी माना जाता है कि सीता ने श्रीलंका से लौटते समय यहां एक शिवलिंग की स्थापना भी की थी

किष्किंधा जो अब हम्पी के नाम से जाना जाता है, उस समय ये जगह वानरों के राज्य के रूप में स्थापित थी। यह वह स्थान है जहां रामायण के दौरान सुग्रीव बाली का प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। आज हम्पी यूनेस्को की साइटों में से एक है। यही राम और लक्ष्मण किष्किंधा में ही हनुमान और सुग्रीव से मिले थे। हम्पी घूमने के लिए आएं तो विरुपाक्ष मंदिर, विट्ठल मंदिर जरूर घूमने जाएं। तुंगभद्रा नदी के तट पर एक गुफा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यही सुग्रीव ने सीता के गहने छिपाए थे। चट्टानों पर निशान और धारियां हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि ये सीता के आभूषणों से बनी थी।

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