Breaking News

(भाग:244) श्री लक्ष्मण जी के हाथों मेघनाद का हुआ बध जोर-जोर से हंसने लगा था मेघनाद का कटा हुआ सिर? 

Advertisements

भाग :244) श्री लक्ष्मण जी के हाथों मेघनाद का हुआ बध जोर-जोर से हंसने लगा था मेघनाद का कटा हुआ सिर?

Advertisements

टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

Advertisements

पौराणिक कथा के अनुसार, युद्ध में लक्ष्मण ने अपने घातक बाण से मेघनाद का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया था और उस सिर को श्रीराम के चरणों में रख दिया. श्रीराम को मेघनाद की पत्नी सुलोचना को संदेश देना था कि उसका पति युद्ध में मारा जा चुका है.

भगवान श्रीराम और लक्ष्‍मण के अगाध प्रेम को तो सभी जानते हैं। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि एक बार भगवान राम के मन में भी अपने अनुज को लेकर शंका उठी। वह भी तब जब ऋषि अगस्‍त्‍य ने कहा कि रावण के पुत्र इंद्रजीत को स्‍वयं राम भी नहीं मार सकते, उन्‍हें तो केवल लक्ष्‍मण ही ने मारा है

अगस्त्य मुनि ने बताया सबसे बड़े योद्धा लक्ष्मण

 

कथा मिलती है कि एक बार अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया। तभी रामजी ने बताया कि किस तरह से उन्होंने रावण और कुंभकर्ण जैसे वीरों का वध किया और अनुज लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा। तभी अगस्त्य मुनि बोले कि इसमें कोई संशय नहीं है कि रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर इंद्रजीत ही था। उसने इंद्र से अंतरिक्ष में युद्ध किया और बांधकर उन्‍हें लंका लेकर गया। ब्रह्माजी ने जब इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा, तब वह मुक्त हुए। लक्ष्मण ने उसका वध किया और केवल वही उसका संहार भी कर सकते थे।

जान‍िए क्‍यों दशानन रावण ने भी पकड़ लिए थे अंगद के पैर और सहम गया था पूरा दरबार

 

अगस्त्य मुनि ने बताया यह भेद

 

अगस्त्य मुनि के मुंह से लक्ष्‍मण की वीरता की प्रशंसा सुनकर राम प्रसन्‍न तो बहुत हुए। लेकिन अचंभित भी हुए कि, ऐसा क्‍या था कि केवल लक्ष्‍मण ही उन्‍हें मार सकते थे। यह जिज्ञासा उन्‍होंने अगस्त्य मुनि के सामने जाहिर की। तब अगस्त्य मुनि ने कहा कि प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो चौदह वर्षों तक न सोया हो। जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो। जिसने चौदह साल तक भोजन न किया हो।

 

जान-बूझकर रामजी ने पूछा यह सवाल

 

श्रीराम बोले मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा। उन्‍होंने कहा कि मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है? अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए। प्रभु से कुछ छिपा है भला। दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे, लेकिन भगवान चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो।

 

विभीषण महाराज ने भी की पुष्टि

 

जिस प्रकार अगस्त्य मुनि कहा कि लक्ष्‍मण के अलावा कोई और इंद्रजीत को नहीं मार सकता था। ठीक उसी प्रकार उसके मारे जाने पर महाराज विभीषण ने भी श्रीराम से कहा था। उन्‍होंने कहा कि रावण के पुत्र इंद्रजीत का वध देवताओं के लिए भी संभव नहीं था। उसे तो केवल लक्ष्‍मणजी जैसा कोई महायोगी ही मार सकता था।

 

लक्ष्मण ने बताया यह रहस्य

अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से कहा कि क्यों न लक्ष्मणजी से यह पूछ लिया जाए। लक्ष्मणजी आए तो रामजी ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा। प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा? फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे? और 14 साल तक सोए नहीं? यह कैसे हुआ? तब लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत पर गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा था। आपको स्मरण होगा मैं उनके पैरों के आभूषण के अलावा कोई अन्‍य आभूषण नहीं पहचान पाया था क्‍योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं।

 

इस तरह लक्ष्मण ने नींद पर किया था काबू

 

चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में लक्ष्‍मण ने कहा कि आप और माता एक कुटिया में सोते थे। मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था। निद्रा देवी ने मेरी आंखों पर पहरा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था। निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेंगी। आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था।

 

इसलिए जानबूझकर देवी सीता सहती रहीं रावण के अत्याचार तो ऐसे रहे 14 सालों तक लक्ष्‍मण अनाहारी रहे है।

लक्ष्‍मण जी ने आगे बताया कि जब मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे। एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो।आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे? मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया। सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे। प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया। फलों की गिनती हुई लेकिन 7 दिनों के फल नहीं थे। तब श्रीराम ने पूछा कि तुमने 7 दिन का आहार लिया था?

तब लक्ष्‍मणजी ने बताया 7 द‍िन का रहस्‍य

श्रीराम के पूछने पर लक्ष्‍मण जी ने 7 दिनों के फल न होने का भी रहस्‍य बताया। उन्‍होंने बताया कि जिस दिन पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे। इसके बाद जब रावण ने माता सीता का हरण किया उस दिन भी हम न‍िराहारी रहे। उन्‍होंने कहा कि जिस दिन आप समुद्र की साधना कर उससे राह मांग रहे थे उस दिन भी हम निराहारी रहे। जब इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे हम उस दिन भी और जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता का सिर काटा था उस दिन हम शोक में थे। इसके अलावा जिस द‍िन रावण ने मुझे शक्ति मारी और जिस द‍िन आपने रावण का वध‍ किया। इन 7 दिनों में हम न‍िराहरी रहे।

युद्ध में लक्ष्मण ने अपने बाण से मेघनाद का सिर धड़ से अलग कर दिया था. लक्ष्मण ने उस सिर को श्रीराम के चरणों में रख दिया था।

रामायण में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और वीर हनुमान के अलावा कई महत्वपूर्ण चरित्रों का वर्णन मिलता है, जिसमें लंकापति रावण और उसके पुत्र मेघनाद भी थे. मेघनाद का एक नाम इंद्रजीत भी था. दोनों नाम उसको पराक्रम और बहादुरी के लिए दिए गए थे. राम और रावण के बीच युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया था. लक्ष्मण ने अपने बाण से मेघनाद का सिर धड़ से अलग कर दिया था. लेकिन सुलोचना के सतीत्व परीक्षा के समय मेघनाद का कटा हुआ सिर भी जोर&जोर से हंसने लगा था, जिसकी कथा इस प्रकार

सुलोचना को देनी पड़ी सतीत्व परीक्षा

पौराणिक कथा के अनुसार, युद्ध में लक्ष्मण ने अपने घातक बाण से मेघनाद का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया था और उस सिर को श्रीराम के चरणों में रख दिया. श्रीराम को मेघनाद की पत्नी सुलोचना को संदेश देना था कि उसका पति युद्ध में मारा जा चुका है. इसके लिए जब श्रीराम ने मेघनाद की एक भुजा काटकर सुलोचना को भेजी तो उसे यकीन नहीं हुआ कि ये उसके पति मेघनाद की भुजा है. तब सुलोचना के कहने पर मेघनाद की कटी हुई भुजा ने लिखकर उसे यकीन दिलाया था. यह जानकर सुलोचना रोने लगी और कहा कि वह अब सती होना चाहती है.

श्रीराम के पास पहुंची सुलोचना

पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि सुलोचना मंदोदरी के पास पहुंची. मंदोदरी ने कहा कि तुम श्रीराम के पास जाओ. इसके बाद सुलोचना श्रीराम के पास पहुंची. सुलोचना ने श्रीराम से कहा, हे राम! आप मुझे मेरे पति का सिर लौटा दें ताकि मैं सती हो सकूं. सुलोचना की दशा देखकर श्रीराम बेहद दुखी हुए और कहा कि मैं तुम्हारे पति को अभी जीवित कर देता हूं. लेकिन सुलोचना ने मना कर दिया.

 

जोर-जोर से हंसने लगा सिर

इसी बीच सुग्रीव को आशंका हुई कि मेघनाद ने अपनी कटी हुई भुजा से लक्ष्मण का गुणगान कैसे किया. उन्होंने इसके बारे में सुलोचना से पूछा और कहा कि यह बात तब मानेंगे जब ये नरमुंड हंसेगा. इसके बाद सुलोचना ने कटे हुए सिर से कहा कि हे स्वामी! हंस दीजिए. इतना कहते ही मेघनाद का कटा हुआ सिर भी जोर-जोर से हंसने लगा. इसके बाद सुलोचना सती हो गई.

 

मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश मे बँधना

दोहा :

* मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।

गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥72॥

 

भावार्थ:-मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरों की सेना में भय छा गया॥72॥

चौपाई :

 

* सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥

डारइ परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥1॥

 

भावार्थ:- वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, शास्त्र एवं वज्र आदि बहुत से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत से बाणों की वृष्टि करने लगा॥1॥

 

* दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥

धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥2॥

 

भावार्थ:- आकाश में दसों दिशाओं में बाण छा गए, मानो मघा नक्षत्र के बादलों ने झड़ी लगा दी हो। ‘पकड़ो, पकड़ो, मारो’ ये शब्द सुनाई पड़ते हैं। पर जो मार रहा है, उसे कोई नहीं जान पाता॥2॥

 

* गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥

अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥3॥

 

भावार्थ:- पर्वत और वृक्षों को लेकर वानर आकाश में दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुःखी होकर लौट आते हैं। मेघनाद ने माया के बल से अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वतों-कन्दराओं को बाणों के पिंजरे बना दिए (बाणों से छा दिया)॥3॥

 

* जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥

मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥4॥

 

भावार्थ:-अब कहाँ जाएँ, यह सोचकर (रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गए। मानो पर्वत इंद्र की कैद में पड़े हों। मेघनाद ने मारुति हनुमान्‌, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानों को व्याकुल कर दिया॥4॥

 

* पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥

पुनि रघुपति सैं जूझै लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥5॥

 

भावार्थ:-फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषण को बाणों से मारकर उनके शरीर को छलनी कर दिया। फिर वह श्री रघुनाथजी से लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं॥5॥

 

* ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥

नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥6॥

 

भावार्थ:- जो स्वतंत्र, अनन्त, एक (अखंड) और निर्विकार हैं, वे खर के शत्रु श्री रामजी (लीला से) नागपाश के वश में हो गए (उससे बँध गए) श्री रामचंद्रजी सदा स्वतंत्र, एक, (अद्वितीय) भगवान्‌ हैं। वे नट की तरह अनेकों प्रकार के दिखावटी चरित्र करते हैं॥6

 

 

* रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥7॥

 

भावार्थ:-रण की शोभा के लिए प्रभु ने अपने को नागपाश में बाँध लिया, किन्तु उससे देवताओं को बड़ा भय हुआ॥7॥

दोहा :

* गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।

सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥73॥

 

भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसी को काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्व निवास (विश्व के आधार) प्रभु कहीं बंधन में आ सकते हैं?॥73॥

 

चौपाई :

* चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥

अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥1॥

 

भावार्थ:-हे भवानी! श्री रामजी की इस सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचार कर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं, वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्री रामजी का भजन ही करते हैं॥।1॥

 

* ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥

जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥2॥

 

भावार्थ:- मेघनाद ने सेना को व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन कहने लगा। इस पर जाम्बवान्‌ ने कहा- अरे दुष्ट! खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध बढ़ा॥2॥

 

* बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥

अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥3॥

 

भावार्थ:-अरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था। अरे अधम! अब तू मुझे ही ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जाम्बवान्‌ उसी त्रिशूल को हाथ से पकड़कर दौड़ा॥3॥

 

* मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥

पुनि रिसान गहि चरन फिरायो। महि पछारि निज बल देखरायो॥4॥

 

भावार्थ:-और उसे मेघनाद की छाती पर दे मारा। वह देवताओं का शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जाम्बवान्‌ ने फिर क्रोध में भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वी पर पटककर उसे अपना बल दिखलाया॥4॥

 

* बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥

इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥5॥

 

भावार्थ:-(किन्तु) वरदान के प्रताप से वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवान्‌ ने उसका पैर पकड़कर उसे लंका पर फेंक दिया। इधर देवर्षि नारदजी ने गरुड़ को भेजा। वे तुरंत ही श्री रामजी के पास आ पहुँचे॥5॥

 

 

दोहा :

* खगपति सब धरि खाए माया नाग बरुथ।

माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥74 क॥

भावार्थ:-पक्षीराज गरुड़जी सब माया-सर्पों के समूहों को पकड़कर खा गए। तब सब वानरों के झुंड माया से रहित होकर हर्षित हुए॥74 (क)॥

 

* गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।

चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥74 ख॥

 

भावार्थ:- पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किए वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किले पर चढ़ गए॥74

Advertisements

About विश्व भारत

Check Also

(भाग:294) देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के सबसे परमभक्त है पं दशानन रावण महाराज

भाग:294) देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के सबसे परमभक्त है पं दशानन रावण महाराज टेकचंद्र सनोडिया …

गायत्री परिवारतर्फे महादुला येथे गुडीपाडवा साजरा

गुडीपाडव्या निमित्त ग्रामगीता भवन आश्रम महादुला येथे वंदनीय राष्ट्रसंतांची ध्यान -प्रार्थना करुन श्रीगुरुदेव सेवा मंडळ …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *