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(भाग:278) जीव पर ईश्वर की असीम कृपा होती है तभी जीव को मनुष्य योनि प्राप्त होती है। 

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भाग:278) जीव पर ईश्वर की असीम कृपा होती है तभी जीव को मनुष्य योनि प्राप्त होती है।

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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जब जीव पर ईश्वर की असीम कृपा होती है तभी जीव को मनुष्य योनी प्राप्त होती है। मनुष्य मानव जीवन के सहारे अपने पिछले वर्तमान व भविष्य को ठीक कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। मानव अपने कर्मों से नर से निशाचर तथा मानव से महामानव व देवमानव बन सकता है।

 

यह बात भिटरिया दरियाबाद रोड स्थित कत्यानी प्रसाद मिश्र के आवास पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन हरिद्वार से पधारे पथिक जी के शिष्य स्वामी अक्षयानंद जी महराज ने कही। उन्होंने कहा कि मानव योनि अकेली ऐसी योनि है जिसमें मनुष्य अपने शरीर के विभिन्न अंगों से परमार्थ करके अपना मानव जीवन धन्य बना सकता है। स्वामी जी ने कहा कि गृहस्थ जीवन मनुष्य योनी का सर्वोत्तम आश्रम माना गया है। गृहस्थ द्वारा किए जाने वाले दैनिक कार्य ही उसकी पूजा होते हैं। तमाम कर्मों, कर्तव्यों एवं झंझावतों के मध्य ईश्वर की मौजूदगी का अहसास होना ही भक्ति है। यही कारण है कि मनुष्य योनि पाने के लिए देवता भी तरसते हैं और किसान को अन्नदाता, अन्नपूर्णा भगवान भी कहा जाता है। भगवान ने मनुष्य योनि परमार्थ करने के लिए बनाया है। सत्संग व भागवत कथा बड़ी भाग्य से प्राप्त होते हैं। जिनके कई जन्मों के भाग्य उदय होते हैं तभी यह अवसर मिल पाता है। कथावाचक ने कहा कि भागवत कथा पापी को भी मोक्ष प्रदान करने वाली होती है। भागवत कथा इंसान को इंसानियत की राह पर चलकर मानव जीवन को सार्थक करने की राह दिखाती है। कथा सुनने का फल तभी मिलता है जबकि कथा को इतने ध्यान से सुना जाए कि अपनी सुध-बुध ही न रह जाए। कुछ लोग कथा सुनने नहीं बल्कि अपनी कथा कहने आते हैं और कथावाचक के साथ ही वह भी अपनी कथा किया करते हैं। कुछ लोग कथा सुनने नहीं बल्कि सोने आते हैं और जब कथा शुरू होती है तब उन्हें गहरी नींद आ जाती है। इसीलिए श्रोता तीन तरह के बताए गए हैं। एक को श्रोता तो दूसरे की सोता तथा सरौता कहते हैं। सोता और सरौता को कथा का कोई लाभ नहीं मिलता है।

मनुष्य शरीर दुर्लभ, परमात्मा की कृपा से ही मिलता है: महंत राज गिरी

मानव शरीर अन्य सभी शरीरों से श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है। यह जीव को भगवान की विशेष कृपा से जन्म मृत्यु के इस संसार रूपी समुद्र से तरने के लिए ही मिलता है।

मानव शरीर अन्य सभी शरीरों से श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है। यह जीव को भगवान की विशेष कृपा से जन्म मृत्यु के इस संसार रूपी समुद्र से तरने के लिए ही मिलता है। मां कामाक्षी दरबार कमाही देवी में पौष संक्रांति के अवसर पर तपोमूर्ति महंत राज गिरि ने धर्म चर्चा करते हुए कहा कि यही वह शरीर रूपी काया है जिसमें हम भगवान को स्मरण कर सकते हैं। भक्ति कर सकते हैं। पूजा द्वारा उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं, अपनी गलतियों के लिए उनसे क्षमा मांग सकते हैं। इस जीवन में पुण्य कर्म करके मोक्ष की प्राप्ति भी केवल मानव शरीर द्वारा की गई साधना से ही संभव है।

महंत जी ने आगे कहा कि ऐसे शरीर को पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मों को ईश्वर की पूजा के लिए समर्पण नहीं करते और किसी भी प्रकार से केवल विषयों की प्राप्ति और उनके उपभोग में ही लगे रहते हैं वे वस्तुत: अपनी आत्मा की हत्या करने वाले ही होते हैं। इन काम, भोग, परायण लोगों को चाहे वे कोई भी क्यों न हो, उन्हें चाहे संसार में कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों, मरने के बाद कर्मों के फलस्वरूप बार- बार उन्हें अन्य योनियों और भयानक नरकों में भटकना पड़ता है। जो परमेश्वर संपूर्ण जगत में व्याप्त है जिनका सतत स्मरण करते हुए व उनकी पूजा के लिए ही समस्त कर्म करने चाहिए क्योंकि मानव शरीर ही एकमात्र योनि है, जिसमें हम प्रभु की अपनी पूजा द्वारा वंदना कर सकते हैं। इसलिए हिदू पथ के अनुसार जीवन में सुख, समृद्धि, सफलता व प्रभु की कृपा पाने के लिए अपने हर काम को पूजा द्वारा प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए।

परमात्मा की कृपा से मनुष्य का शरीर मिला है। यह शरीी बडा ही दुर्लभ है। शरीर धारी मनुष्य ही ईश्वर भजन कर परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं। इसकी युक्ति पहुंचे हुए संत के शरण में जाने के बाद मिलता है। उक्त प्रवचन नवरात्रा के अवसर पर संतमत सत्संग आश्रम मधुबनी में आयोजित ध्यान शिविर में संत सदगुरू महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के शिष्य कुप्पाघाट भागलपुर से आये स्वामी केदार बाबा दे रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य का शरीर दुर्लभ है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो ईश्वर भजन कर आवागमन के चक्र से छूट सकता है। जो मानस जप, मानस ध्यान, दृष्टि साधन करते हैं यानी संध्या करते हैं वे ही परमात्मा से साक्षात्कार भी कर सकते हैं। संध्या करने से आत्मा को शांति मिलती है। मनोविकार से मुक्ति मिलती है और परम सुख को पाता है। इसके लिए पवित्रता होनी चाहिए। पहुंचे हुए संत महात्मा से संध्या करने की विधि जाननी होगी और मनोयोग से नियमित संध्या करनी होगी तभी कल्याण है। भगवान राम ने सबरी माई को नवधा भक्ति का ज्ञान दिये थे। उसमें आया है कि मनुष्य का शरीर दुर्लभ है, इसी में ईश्वर की प्राप्ति होती है। जो संत महात्मा से युक्ति जानकर नियमित सत्संग व ध्यान करेंगे उनका कल्याण होगा। उन्होंने कहा कि ध्यान की बहुत महत्ता है। शिविर में संतमत सत्संग अश्रम के व्यवस्थापक पूज्य शैलेन्द्र बाबा, अध्यक्ष कुमार उत्तम सिंह, सचिव सुधाकर प्रसाद सिंह, सुरेश साह, डा.विष्णुदेव भगत ,संजय कुमार , सोपाल साह, सहित अन्य सत्संगप्रेमी उपस्थित थे। संतमत सत्संग आश्रम मधुबनी के अध्यक्ष कुमार उत्तम सिंह ने बताया कि ध्यान शिविर का समापन 14 अक्टूबर को होगा।

मानव जीवन का उद्देश्य स्वयं को जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त करना है। इसका सही उपयोग करके, हम स्वयं को 84 लाख पुनर्जन्मों के दुष्चक्र से हमेशा के लिए मुक्त कर सकते हैं।

हमारे पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार 84 लाख विभिन्न योनियों में जन्म लेने के बाद, भगवान ने दया की वर्षा की और हमें मानव शरीर में जन्म दिया, जिसे “मुक्ति योनि” (मोक्ष प्राप्त करने के लिए सशक्त शरीर) भी कहा जाता है। मानव शरीर में जन्म देना प्रभु की महान दया का कार्य है क्योंकि मानव शरीर का उपयोग हम मोक्ष प्राप्ति के लिए कर सकते हैं। मानव जीवन में ज्ञान की उपस्थिति के कारण ही हम मानव जीवन के उद्देश्य को भलीभांति सुनिश्चित व परख सकते हैं।

यदि हम जानवरों की प्रजातियों का विश्लेषण करें, चाहे वे जलीय, नभ या स्थलीय हों, तो हम देख सकते हैं कि वे अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा भोजन की तलाश में और बड़ी प्रजातियों से खतरे के खिलाफ अपने जीवन के लिए आत्मरक्षा के उपाय करने में बिताते हैं। यदि हम कौए या गिलहरी को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि वे सुबह भोजन की तलाश में निकलते हैं। पूरे दिन उन्हें अपनी जान की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना होगा क्योंकि किसी भी चूक से उनकी जान जा सकती है। एक कौआ या गिलहरी भोजन का एक निवाला खाने से पहले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनगिनत बार इधर-उधर देखती है। छोटी प्रजातियों को बड़ी प्रजातियों से डर लगता है. बड़ी प्रजातियों को इंसानों से डर लगता है. (पैसे के लालच में मनुष्यों द्वारा बाघ की खाल उड़ाने के कारण कई बाघ अपनी जान गंवाते रहते हैं।) इसलिए पशु शरीर में भगवान को याद करना या उनकी पूजा करना लगभग असंभव है। बहुत कम पशु प्रजातियाँ अपने पिछले अच्छे कर्मों के कारण इतनी भाग्यशाली होती हैं कि उन्हें मंदिरों के पास आश्रय मिल पाता है। आपने मंदिरों के पास बंदरों, पवित्र गायों और कबूतरों को देखा होगा, ये जानवरों में से कुछ भाग्यशाली हैं जो पशु शरीर में मोक्ष के लिए प्रयास करते हैं। ऐसा करने से उन्हें मोक्ष भले ही न मिले लेकिन उन्हें अगला जन्म मानव शरीर में अवश्य मिलता है ताकि वे मोक्ष प्राप्त करने के अपने प्रयासों पर दोबारा गौर कर सकें।

मानव जीवन निश्चित रूप से ईश्वर का सर्वोपरि आशीर्वाद है क्योंकि यह 84 लाख शरीरों में पुनर्जन्म के चक्र से स्थायी रूप से बचने का एक महान माध्यम है। इसलिए हमें प्रभु के निकट रहकर मानव जन्म का सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए ताकि हम 84 लाख योनियों के दुष्चक्र से मुक्त हो सकें। इसी कारण मानव जीवन को संतों ने “मुक्ति योनि” कहा है।

परन्तु हमारा दुर्भाग्य देखिये कि हम इतनी कठिनाई से अर्जित किये गये अपने मानव जीवन को व्यर्थ कर्मों में ही व्यतीत कर देते हैं और नये कर्मबन्ध (अपने किये गये कर्मों का परिणाम) भी पैदा कर लेते हैं। इस प्रकार हम “मुक्ति योनि” में जन्म पाकर भी “मोक्ष” के स्थान पर “बंधन” अर्जित करते हैं। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य तब सामने आता है जब माया के दुष्प्रभाव के कारण हमें अपनी गलती का स्मरण या पूर्वानुमान तक नहीं होता। संत-महात्माओं ने हमें यह चेतावनी देकर सचेत किया है कि मानव जीवन में यह गलती दोबारा न हो। ऐसी चेतावनियों के कई भजन और गीत मिल सकते हैं। श्री कबीरदासजी, भगवती मीरा बाई, श्री सूरदासजी और ऐसे कई संतों ने ऐसी चेतावनियों के साथ भजन गाए हैं, मानव जीवन का सही उपयोग करने की चेतावनी दी है और प्रभु के सानिध्य में जीवन जीने का अनुरोध किया है।

जब हम प्रभु के करीब आते हैं तो हमें ऐसी गलतियों को पहचानने की दृष्टि मिलती है और प्रभु ही हमें मानव जीवन की ऐसी भूलों को सुधारने की प्रेरणा भीतर से देते हैं। अन्यथा हमारा मानव जीवन खाने में, सोने में और मैथुन में बर्बाद हो सकता था। भोजन कमाने, सोने और मैथुन में अत्यधिक लिप्त रहना पशु प्रजाति के लक्षण हैं। मानव जीवन को केवल भोजन (पैसा कमाने) में लगाना, मानव जीवन को केवल सोने (आराम करना) में लगाना, मानव जीवन को केवल मैथुन (संतान पालना) में लगाना मूर्खता का कार्य है। लेकिन आपको ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो अपने जीवनकाल में खूब पैसा कमाने के बाद 65 साल की उम्र में भी पैसा कमाने में लगे हुए हैं। आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्होंने अपना पूरा जीवन मौज-मस्ती में बिताया है। उन्होंने खुद को कुछ न करने के लिए प्रशिक्षित किया है। आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो 6-7 बच्चों के साथ परिवार का पालन-पोषण करना जारी रखते हैं। ऐसी स्थिति में उनके पास मानव जीवन के उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करने की न तो दृष्टि होती है, न ही उनके पास खुद को प्रभु के साथ जोड़ने की प्रवृत्ति होती है और न ही उनके पास ऐसा करने के लिए समय होता है।

लेकिन कुछ भाग्यशाली लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें अपने पिछले जन्मों में किए गए अच्छे कर्मों के कारण प्राप्त भगवान के आशीर्वाद के कारण ऐसी दृष्टि प्राप्त होती है। यह आशीर्वाद क्या है? भक्ति के माध्यम से प्रभु को पाने का संकल्प, भक्ति पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प। एक बड़ा आशीर्वाद है, जो कि भगवान का सर्वोच्च आशीर्वाद है जो भक्ति मार्ग पर चलने वाले भक्तों की हर समय रक्षा करता है। यदि ऐसा न होता तो सांसारिक मोह-माया का तूफ़ान आत्मा को सांसारिकता में डुबाने के लिए काफी है। इस प्रकार भगवान अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं और आत्मा को जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त कर देते हैं। इस प्रकार आत्मा मानव जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में मानव शरीर का उपयोग करने में सक्षम है।

प्रभु का आशीर्वाद या तो पिछले जन्मों में किए गए अच्छे कर्मों के कारण मिलता है या इस जीवन में दृढ़ता से भक्ति करने के कारण मिलता है। इसलिए यदि हमारे अंदर प्रभु के प्रति थोड़ी सी भी भक्ति मौजूद है, तो हमें इसे हमारे ऊपर प्रभु की कृपा के रूप में स्वीकार करना चाहिए और इसे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए ताकि भक्ति का बीज एक बड़े भक्ति वृक्ष के रूप में विकसित हो सके। मानव जीवन के मूल उद्देश्य को पूरा करना।

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