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नास्तिक सूतक व्याधिदोष के प्रकोप से वैवाहिक जीवन तबाह

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नास्तिक सूतक व्याधिदोष के प्रकोप से वैवाहिक जीवन तबाह

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नई दिल्ली। भारतीय आयुर्विज्ञान(शरीर रचना शास्त्र) आयुर्विज्ञान और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, विवाह के पूर्व या पश्चात अशुभ समय-तिथी- नक्षत्र और अपवित्र स्थानों में अवैध यौन संबंध की वजह से महिला -पुरुषों में ग्रह व्याधिदोष जन्य प्रकोप बढता है. व्याधिदोष युक्त पुरुषों के साथ अनैतिक शारीरिक संबंध के कारण महिलाओं का वैवाहिक जीवन तबाह हो सकता हैं? मानवधर्म शास्त्र के अनुसार विवाह पूर्व या विवाह के पश्चात असाध्य व्याधिदोष जन्य पुरुषों से यौन संबंध से बचना चाहिए. क्योंकि असाध्य व्याधिदोष जन्य व्याभिचारी पुरुषों स्त्रियों-पुरुषों के मुंह, होंठ, कान, नाक, गाल, गले का पशीना और लार में 2% रक्त कैंसर, 3% एड्स, 2% क्षय रोग, 3% चर्मरोग, 2% सुगर, 15% सेक्स फीवर (कामरोग) 5% वात-पित्त कफ जन्य सन्निपात और अन्य संक्रमण की संभावना है.और नास्तिक सूतक व्याधिदोष जन्य तरुण महिलाएं कभी मां नहीं बन सकती है. यदि संयोगवश मां बन भी गई तो होनहार संतान मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग हो सकती है या आयू पूर्ण होने के पूर्व संतान की अकाल मृत्यू होऊ सकती है.

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वस्तुतः व्याधिदोष ग्रस्त शब्द का संबंध ज्योतिष और सनातन हिंदू धर्म की धार्मिक मान्यताओं से है। “सूतक पातक व्याधिदोष ” का तात्पर्य अनैतिक यौन संबंध के दौरान यौनांग मे जीवित शुक्राणु को कुचलकर मर जाते हैं. इससे होने वाली अशुद्धता से है। “ग्रह” का अर्थ ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति है और “व्याधि” का अर्थ है असाध्य लाइलाज बीमारी है. ये शब्द अक्सर धार्मिक और ज्योतिषीय संदर्भों में उपयोग किए जाते हैं और विभिन्न दोषों और प्रभावों से जुड़े होते हैं।

इन शब्दों का प्रयोग अक्सर धार्मिक आयुर्विज्ञान, प्रसूति विज्ञान और ज्योतिषीय संदर्भों में किया जाता है और ये विभिन्न प्रकार के सूतक पातक ग्रह व्याधि दोषों के प्रभावों से जुड़े होते हैं।

उदाहरण: कुछ लोग नास्तिक हैं और धार्मिक विश्वासों में विश्वास नहीं करते हैं। और यौन दुर्भावनाओं के प्रभाव में आकर वे किसी के साथ भी अवैध और अनैतिक शारीरिक संबंध बना लेते हैं। परिणामस्वरूप, बहुमूल्य शुक्राणु बर्बाद हो जाते हैं। अनैतिक यौन संबंधों के कारण वीर्य गंदा और अशुद्ध होकर नष्ट हो जाता है, जिससे भयंकर यौन रोग से बांझपन ग्रहजन्य रोग उत्पन्न होते हैं। सूतक पातक दोष

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार पितृदोष पूर्वजों के कर्मों से उत्पन्न दोष है।

इसलिए इसप्रकार के व्याधिदोष से पीड़ित स्त्री-पुरुषों को अवैध एवं अनैतिक अंतरंग संबंधों से सदैव बचना चाहिए तथा व्याधिदोष के अत्यधिक प्रकोप बढने से पहले ही समय पर आयुर्विज्ञान चिकित्सा विशेषज्ञों, ज्योतिषियों, ऋषियों एवं मनोचिकित्सकों की सलाह से उपचार और शुद्धिकरण करानी चाहिए.उपरोक्त गोपनीय विषय की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की सलाह जरुरी है.

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