केंद्र से नाराज जनता : अब गडकरी को PM बनाना चाहती है
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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नागपुर। केंद्रीय सडक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को भावी प्रधान मंत्री के रुप मे आंका जाने लगा है. जिसके फलस्वरूप केंद्रीय आलाकमान के दो गुजरातियों के पसीने छूटने लगे और उनके के पेट मे दर्द होने लगा है.
नितिन गडकरी को प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकता
नितिन गडकरी को प्रधानमंत्री पद का एक प्रबल दावेदार माना जाता है,चुंकि उन्हें भाजपा और संघ दोनों में पसंद किया जाता है, खासकर अगर कोई राजनीतिक संकट पैदा हो। उनके सहयोगी और कुछ विश्लेषक उन्हें नरेंद्र मोदी के बाद एक प्रमुख विकल्प के रूप में देखते हैं, जो अपनी योग्यता और धैर्य के लिए जाने जाते हैं। केंद्रीय सडक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के बारे में मुख्य बातें यह है कि उनकी सामाजिक छबि और राजनीतिक स्थिति बहुत ही अच्छी है और उन्हें भाजपा के भीतर एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता के रूप में देखा जाता है, जो संघ के करीब हैं।
उनके लाखों करोडों समर्थकों का मानना है कि यदि कभी ऐसी स्थिति आती है जहाँ वर्तमान नेतृत्व को बदला जाना हो, तो गडकरी एक मजबूत उम्मीदवार होंगे।
कामकाजी शैली के संबंध मे बतादें कि उन्हें उनके विकास कार्यों, विशेष रूप से बुनियादी ढांचे और सड़कों के निर्माण के लिए जाना जाता है, जो उनकी एक मजबूत छवि बनाती है।
हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री का चुनाव पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है, और नितिन गडकरी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं को लेकर विभिन्न राजनीतिक राय हैं।
एक सर्वेक्षण के अनुसार PM
नरेन्द्र मोदी के प्रति नापसंदगी के पीछे जनता के बीच प्रमुख कारणों में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, और कुछ सरकारी नीतियों (जैसे विमुद्रीकरण) का असर शामिल हो सकता है। इसके अलावा, ध्रुवीकरण की राजनीति, आलोचकों को दबाने के आरोप, और प्रमुख निर्णयों में पारदर्शिता की कमी भी असंतोष का कारण बन सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी के प्रति जनता के बीच असंतोष के संभावित कारण यह है कि वर्तमान परिवेश में देश को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड रहा है.लगातार बढ़ती महंगाई (महँगाई) और बेरोजगारी की उच्च दर से जनता का एक वर्ग प्रभावित है, जिससे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र भाई के प्रति असंतोष पैदा हो रहा है।
नीतिगत मुद्दे के संबंध मे बता दें कि विमुद्रीकरण (नोटबंदी) जैसे फैसलों से उत्पन्न आर्थिक मुश्किलों को लेकर सरकार की आलोचना की गई है।
सामाजिक/राजनीतिक मुद्दे के बारे मे कहते हैं कि सरकार पर देश को धार्मिक या राजनीतिक रूप से विभाजित करने (ध्रुवीकरण) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करने के आरोप लगते रहे हैं।
निर्णय लेने की प्रक्रिया के संदर्भ मे समझा जा रहा है कि
कुछ आलोचक सरकार की निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की कमी को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हैं।
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