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शंकराचार्य कें घोर अनादर से CM योगी का राजनैतिक भविष्य तबाह 

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शंकराचार्य कें घोर अनादर से CM योगी का राजनैतिक भविष्य तबाह

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:

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9822550220

 

लखनऊ। सनातन धर्म के धर्मगुरु आचार्य ज्योतिष पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के साथ घोर अपमानजनक व्यवहार किए जाने की वजह से मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीति भविष्य बर्बाद होते दिखाई दे रहा है. माघ पूर्णिमा के पवित्र स्थल पर शंकराचार्य के स्नान को लेकर यूपी सरकार की पुलिस ने शंकराचार्य के साथ महान विद्वान विभूतियों का भी अनादर हुआ है.इतना ही नहीं उनके साथ बाल ब्रम्हचारी बटुकों के साथ भी अभद्र और बेरहमी से उनकी गोमुख शिखा को काट दिया गया और महानविभूतियों का यू पी पुलिस द्धारा अशोभनीय अपमान किया गया है. इससे UP के CM योगी आदित्यनाथ की साख बुरी तरह गिर चुकी है. यह सबकुछ मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ के दिशानिर्देश के मुताबिक हुआ है.विधि न्याय विशेषज्ञों के अनुसार मुख्य मंत्री पद का दुरुपयोग हुआ है. इसके अलावा यू पी सरकार द्धारा भारतीय संविधान संशोधन अनुच्छेद की धाराएं,भारतीय दण्ड संहिता, भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता. राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून,और भारतीय विधि न्याय संहिता की विविध धाराओं का उलंघन योगी आदित्यनाथ सरकार ने की है.

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच चल रहा विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है। जनवरी 2026 में प्रयागराज माघ मेले में हुई एक घटना के बाद दोनों के बीच तनातनी बढ़ी है, जिसके दूरगामी राजनैतिक परिणाम हो सकते हैं। आरोप है कि पुलिस ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को संगम तट पर पवित्र स्नान करने से रोका और उनके समर्थकों के साथ दुर्व्यवहार किया।

प्रशासन का नोटिस: मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस जारी कर 2022 के सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का हवाला देते हुए उनसे ‘शंकराचार्य’ के पद के इस्तेमाल पर स्पष्टीकरण मांगा है।

शंकराचार्य का रुख के संबंध मे बतादें कि उन्होंने इसे परंपरा का अपमान बताते हुए सरकार से माफी की मांग की और अनशन पर बैठे। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को ‘गौ-विरोधी’ और ‘कालनेमि’ (रामायण का पात्र) ठहराया है. नतीजतन सीएम योगी सरकार का

राजनैतिक भविष्य पर बुरा प्रभाव पड चुका है. चुकि इससे भारतीय संत समाज में असंतोष निर्माण हो चुका है. इस घटना के बाद कई सनातनी संगठनों और साधु-संतों में असंतोष देखा जा रहा है। इसे सनातन धर्म के प्रति प्रशासनिक असंवेदनशीलता के रूप में देखा जा रहा है।

संघ की नाराजगी: रिपोर्ट्स के अनुसार, 6 मार्च 2026 को कानपुर में हुई बैठक में RSS ने इस मामले पर नाराजगी जताई और योगी सरकार को इसे जल्द सुलझाने का निर्देश दिया।

विपक्ष दलों को विरोध प्रदर्शन करने का अच्छा खासा मौका मिल गया है. विपक्षी दल इस मुद्दे को ‘एंटी-ब्राह्मण’ (ब्राह्मण विरोधी) और ‘संत विरोधी’ बताकर योगी सरकार को घेरा जा रहा हैं। इस मामले ने बीजेपी के भीतर भी मतभेद उजागर किए हैं, जहां डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और अन्य नेता इस मुद्दे पर अलग राय रखते दिखते हैं।

योगी का कड़ा रुख यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में कानून का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता और हर कोई शंकराचार्य का दावा नहीं कर सकता। यानी सत्तासुख के अहंकार मे चकनाचूर सीएम योगी आदित्यनाथ सनातन धर्म आचार्य धर्माचार्य के मामूली और हल्के मे ले रहे हैं.

 

निष्कर्ष:

जगतगुरु शंकराचार्य ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज के साथ विवाद ने सीएम योगी आदित्यनाथ के सामने एक नई राजनैतिक चुनौती पेश की है। संघ की नाराजगी और संतों में असंतोष के कारण, यह विवाद आगामी समय में उनकी साख के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। हालांकि, योगी आदित्यनाथ के ‘जीरो टॉलरेंस’ और सख्त प्रशासन की नीति को एक वर्ग का समर्थन भी मिल रहा है, जो कानून का पालन सुनिश्चित करने पर जोर देता है.बतादें कि भारतवर्ष मे चारों मठ के जगतगुरु शंकराचार्यों के लगभग 40 से 45 करोड शिष्य मौजूद हैं जिनमे अधिकांश सघन परिवार व्यवसायिक उधोगपति,बडे से बडा अधिकारी,लाखों अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों का समावेश है.

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