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कालसर्प दोष के प्रकोप से संतान सुख में आती है बाधाएं? जानिए कालसर्प दोष निवारण के उपाय 

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कालसर्प दोष के प्रकोप से संतान सुख में आती है बाधाएं? जानिए कालसर्प दोष निवारण के उपाय

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट,मो 9822550220

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वैदिक सनातन धर्म अंतर्गत ज्योतिष विज्ञान के अनुसार जातक की जन्मपत्रिका में लग्न से पंचम भाव में राहु व गुरु का अभाव रहता है। राहु व गुरु की युति होने पर काल सर्प दोष के प्रकोप से भी संतान बाधा उत्पन्न होनेञमे बाधा निर्माण होती है। पंचमेश या पंचम अर्थात नवम स्थान से भी संतान का विचार किया जाता है। पत्नी स्थान अर्थात सप्तम भाव से एकादश भाव पंचम होता है, इसलिए वह भी स्त्री का संतान भाव हुआ। सतानहीनता दाम्पत्य जीवन का दुखद पहलू है।

 

ज्योतिष शास्त्र में संतान सुख का विश्लेषण जातक की जन्म कुंडली में पंचम भाव, पंचमेश एवं गुरु की स्थिति का आकलन कर किया जाता है। संतान सुख से जुड़ा एक महत्व पूर्ण योग है काल सर्प योग जो संतान सुख से वंचित रखने में अहम भूमिका अदा करता है।

 

काल सर्प योग का प्रभाव शनि जैसे क्रूर ग्रह के प्रभाव से भी कहीं अधिक पीड़ादायक होता है। सर्प को काल कहा गया है और काल का अर्थ नकारात्मक पक्ष से है। राहु का जन्म नक्षत्र भरणी है तथा उसके देवता सर्प हैं। ज्योतिष शास्त्र में राहु को सर्प का मुख एवं केतु को उसकी पूंछ कहा गया है।

 

संतान कारक गुरु मंगल से युक्त हो, लग्नेश राहु से युत हो या लग्न में राहु हो तथा संतानेश त्रिक भाव में हो, तो संतान बाधा उत्पन्न हो जाती है। संतान भाव अर्थात पंचम भाव में सूर्य, मंगल, शनि व राहु हों तथा संतानेश एवं लग्नेश दोनों ही बलहीन हों, तो संतान बाधा की संभावना होती है। कर्क या धनु लग्न में संतान भावस्थ राहु बुध से युति या दृष्टि संबंध रखता हो, संतान कारक गुरु राहु से युत हो तथा संतान भाव पर पंचम शनि से दृष्ट हो तो संतान बाधा उत्पन्न होती है।

 

यदि जातक की जन्मपत्रिका में लग्न से पंचम भाव में राहु व गुरु का अभाव रहता है। राहु व गुरु की युति होने पर सर्प दोष से भी संतान बाधा उत्पन्न होती है। पंचमेश या पंचम अर्थात नवम स्थान से भी संतान का विचार किया जाता है। पत्नी स्थान अर्थात सप्तम भाव से एकादश भाव पंचम होता है, इसलिए वह भी स्त्री का संतान भाव हुआ। कुटंुब स्थान से परिवार के सदस्यों की संख्या का पता चलता है। इस प्रकार संतान का विचार पंचम, नवम, एकादश एवं द्वितीय भावों तथा उनके स्वामियों के बलवान होने और गुरु की स्थिति के आधार पर किया जाता है।

 

यदि जन्मपत्रिका में अष्टम भाव में शुक्र, गुरु एवं मंगल की युति हो, तो भी संतान का अभाव होता है। इन सभी का बली होना संतान प्राप्ति के लिए आवश्यक है। जन्मपत्रिका में यदि काल सर्प योग का संबंध पंचम भाव या पंचमेश से हो, तो संतान सुख में बाधा आती है।

 

जन्म कुंडली में पूर्ण काल सर्प योग हो, राहु पंचमेश के साथ हो और पंचम भाव में पापी ग्रह हों या पंचम भाव को देख रहे हों, तो भी जातक को संतान सुख प्राप्त नहीं होता। जन्म कुंडली में काल सर्प योग होते हुए यदि पंचमेश भाव 6, 8 या 12 में तथा पापी ग्रहों की दृष्टि में हो, तो संतानोत्पत्ति में बाधा आती है।

 

उपाय नाग पंचमी के दिन काल सर्प योग की शांति पूजा तथा यज्ञ अनुष्ठान आदि करने चाहिए। इससे पूर्व जन्मकृत दोष मिट जाते हैं। यह पूजा दो तीन बार करनी चाहिए।।

 

यदि किसी स्त्री की कुंडली इस योग से ग्रस्त हो, तो उसे नागपंचमी के दिन वट वृक्ष की 108 प्रदक्षिणा लगानी चाहिए। पति-पत्नी को नियमित रूप से सर्प सूक्त का पाठ करना चाहिए। नागपंचमी का व्रत और नवनाग स्तोत्र का पाठ करें। सायंकाल पीने का पानी रखने के स्थान पर तेल का दीपक 45 दिनों तक प्रतिदिन जलाएं।

 

यदि जातक के शत्रु अधिक हों या उसके कार्य में निरंतर बाधा आती हो, तो जिस वैदिक मंत्र से जल में सर्प छोड़ते हैं उसका नित्य तीन बार, स्नान, पूजा-पाठ करने के बाद जप करें। भगवान भोले नाथ की कृपा से उसके सभी शत्रु शीघ्र शांत हो जाएंगे। यह मंत्र अद्भुत व अमोघ है परंतु इसका प्रयोग गुरु की आज्ञा लेकर ही करना चाहिए।

 

शिव मंदिर में तुलसी के पांच पौधे या पांच शिव मंदिरों में एक-एक बेल या रुद्राक्ष का पौधा लगाना चाहिए। अपने घर में मोर पंख लगाएं। पक्षियों को अनाज डालें या अनाज जल में प्रवाहित करें। चींटियों को आटा या शक्कर का बूरा डालें। अमावस्या के दिन अग्नि को भोजन कराएं। पितरों को अमावस्या पूर्व चतुर्दशी को नियमित धूप दें। अमावस्या को ब्राह्मण भोजन कराएं।

 

जानिए जीवन को कष्टमय कर देता है काल सर्प दोष, 12 तरह के हैं कालसर्

 

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार 12. प्रकार के होते है जो संतान सुख मे वहुत कष्टमय होता है ।

कुंडली में काल सर्प दोष होना किसी भी जातक के लिए परेशानी की बात हो सकती है। इस योग में जीवन कष्टमय होता है जानिए इसके बारे में।

 

सनातन धर्म में किसी व्यक्ति की कुडंली देखकर ग्रहों का आकलन किया जाता है औऱ जातक की जिंदगी में दोष और योग की गणना की जाती है। कुंडली में कालसर्प दोष होने पर विवाह, संतान, सम्मान, पैसा, बिजनेस आदि संबधी कई समस्याओं की आशंका बनती है

 

क्या है काल सर्प योग किसी जातक की कुंडली में जब राहु एवं केतु सदा वक्री (उल्टी चाल) रहते हैं और बाकी के सभी ग्रह राहु एवं केतु के बीच में आ जाते हैं तो व्यक्ति कालसर्प दोष से पीड़ित माना जाता है। हर राशि की कुंडली में काल सर्प दोष का प्रभाव अलग अलग तरीके से पड़ता है।

 

काल सर्प योग के 12 प्रकार होते है। हर दोष का अलग-अलग प्रभाव और इससे राहत पाने के लिए विशेष ज्योतिषीय उपाय होते है। इन उपायों को अपनाकर काल सर्प दोष का प्रभाव कम किया जा सकता है।

 

अनंत कालसर्प दोष

 

कुंडली में राहु लग्न में हो और केतु सप्तम भाव में स्थित हो तथा सभी अन्य ग्रह सप्तम से द्वादश, एकादशी, दशम, नवम, अष्टम और सप्तम में स्थित हो तो यह अनंत कालसर्प योग कहलाता है। ऐसे जातकों के व्यक्तित्व निर्माण में कठिन परिश्रम की जरूरत पड़ती है। उसके विद्यार्जन व व्यवसाय के काम बहुत सामान्य ढंग से चलते हैं और इन क्षेत्रों में थोड़ा भी आगे बढ़ने के लिए जातक को कठिन संघर्ष करना पड़ता है।

 

कुलिक कालसर्प दोष

 

राहु द्वितीय भाव में तथा केतु अष्टम भाव में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के बीच में हो तो कुलिक नाम कालसर्प योग होगा। हु दूसरे घर में हो और केतु अष्टम स्थान में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के बीच में हो तो कुलिक नाम कालसर्प योग होगा। जातक को अपयश का भी भागी बनना पड़ता है। इस योग की वजह से जातक की पढ़ाई-लिखाई सामान्य गति से चलती है और उसका वैवाहिक जीवन भी सामान्य रहता है। लेकिन आर्थिक परेशानियों के कारण आपके दापत्यं जीवन में खलबली मची रहती है।

 

शेषनाग कालसर्प दोष

 

कुंडली में राहु द्वादश स्थान में तथा केतु छठे स्थान में हो तथा शेष 7 ग्रह नक्षत्र चतुर्थ तृतीय और प्रथम स्थान में हो तो शेषनाग कालसर्प दोष का निर्माण होता है। शेषनाग कालसर्प योग बनता है। शास्त्रों के अनुासर व्यवहार में लोग इस योग संबंधी बाधाओं से पीड़ित अवश्य देखे जाते हैं। इस योग से पीड़ित जातकों की मनोकामनाएं हमेशा विलंब से ही पूरी होती हैं। ऐसे जातकों को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए अपने जन्मस्थान से दूर जाना पड़ता है और शत्रु षड़यंत्रों से उसे हमेशा वाद-विवाद व मुकदमे बाजी में फंसे रहना पड़ता है।

 

विषधर कालसर्प दोष

 

केतु पंचम और राहु ग्यारहवे भाव में हो तो विषधर कालसर्प योग बनाते हैं। इस दोष के चलते व्यक्ति धन की हानि से गुजरता है। जातक को ज्ञानार्जन करने में आंशिक व्यवधान उपस्थित होता है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने में थोड़ी बहुत बाधा आती है एवं स्मरण शक्ति का हमेशा ह्रास होता है। जातक को नाना-नानी, दादा-दादी से लाभ की संभावना होते हुए भी आंशिक नुकसान उठाना पड़ता है। चाचा, चचेरे भाइयों से कभी-कभी झगड़ा- झंझट भी हो जाता है। बड़े भाई से विवाद होने की प्रबल संभावना रहती है।

 

वासुकी कालसर्प दोष

 

राहु तृतीय भाव में स्थित है तथा केतु नवम भाव में स्थित होकर जिस योग का निर्माण करते हैं तो वह दोष वासुकी कालसर्प दोष कहलाता है। वह भाई-बहनों से भी परेशान रहता है। अन्य पारिवारिक सदस्यों से भी आपसी खींचतान बनी रहती है। रिश्तेदार एवं मित्रगण आपको हमेशा धोखा देते रहते हैं। घर में हमेशा कलह रहता है। साथ ही आर्थिक स्थिति भी असामान्य रहती है। अर्थोपार्जन के लिए जातक को विशेष संघर्ष करना पड़ता है।

 

शंखपाल कालसर्प दोष

 

राहु चतुर्थ भाव में तथा केतु दशम भाव में स्थित होकर अन्‍य ग्रहों के साथ जो निर्माण करते हैं तो वह कालसर्प दोष शंखपाल के नाम से जाना जाता है। इससे घर- संपत्ति संबंधी थोड़ी बहुत कठिनाइयां आती हैं। जिसके कारण जातक को कभी-कभी तनाव में आ जाता है। जातक को माता से कोई, न कोई किसी न किसी समय आंशिक रूप में तकलीफ मिलती है। चंद्रमा के पीड़ित होने के कारण जातक समय-समय पर मानसिक संतुलन खोया रहता है।

 

पद्य कालसर्प दोष

 

चतुर्थ स्‍थान पर दिए दोष के ऊपर का है पद्य कालसर्प दोष इसमें राहु पंचम भाव में तथा केतु एकादश भाव में साथ में एकादशी पंचांग 8 भाव में स्थित हो तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म कालसर्प योग बनता है। ज्ञान प्राप्त करने पर थोड़ी समस्या उच्पन्न होती है। साथ ही जातक को संतान प्राय: विलंब से प्राप्त होती है, या संतान होने में आंशिक रूप से व्यवधान उपस्थित होता है। जातक को पुत्र संतान की प्राय: चिंता बनी रहती है। साथ ही स्वास्थ्य संबंधी समस्या भी हो सकती है।

 

महापद्म कालसर्प दोष

 

राहु छठे भाव में और केतु बारहवे भाव में और इसके बीच सारे ग्रह अवस्थित हों तो महापद्म कालसर्प योग बनता है। इस योग में जातक शत्रु विजेता होता है, विदेशों से व्यापार में लाभ कमाता है लेकिन बाहर ज्यादा रहने के कारण उसके घर में शांति का अभाव रहता है। इस योग के जातक को एक ही चीज मिल सकती है धन या सुख। इस योग के कारण जातक यात्रा बहुत करता है।

 

तक्षक कालसर्प दोष

 

जन्मपत्रिका के अनुसार राहु सप्तम भाव में तथा केतु लग्न में स्थित हो तो ऐसा कालसर्प दोष तक्षक कालसर्प दोष के नाम से जाना जाता है। इस कालसर्प योग से पीड़ित जातकों को पैतृक संपत्ति का सुख नहीं मिल पाता। ऐसे जातक प्रेम प्रसंग में भी असफल होते देखे जाते हैं। गुप्त प्रसंगों में भी उन्हें धोखा खाना पड़ता है। वैवाहिक जीवन सामान्य रहते हुए भी कभी-कभी संबंध इतना तनावपूर्ण हो जाता है जिससे कि आप अलग होने की कोसिस करते है।

 

कर्कोटक कालसर्प दोष

 

केतु दूसरे स्थान में और राहु अष्टम स्थान में कर्कोटक नाम कालसर्प योग बनता है। ऐसे जातकों के भाग्योदय में इस योग की वजह से कुछ रुकावटें अवश्य आती हैं। नौकरी मिलने व पदोन्नति होने में भी कठिनाइयां आती हैं। इस जातकों को संपत्ति भी आते-आते रह जाती है। कोई भी काम ठीक ढंग से नहीं हो पाता है। साथ ही आपको अधिक परिश्र्म करने के बाद भी लाभ नहीं मिल पाता है।

 

शंखचूड़ कालसर्प दोष

 

सर्प दोष जन्मपत्रिका में केतु तीसरे स्थान में व राहु नवम स्थान में हो तो शंखचूड़ नामक कालसर्प योग बनता है। इस योग से पीड़ित जातकों का भाग्योदय होने में अनेक प्रकार की अड़चने आती रहती हैं। व्यावसायिक प्रगति, नौकरी में प्रोन्नति तथा पढ़ाई-लिखाई में वांछित सफलता मिलने में जातकों को कई प्रकार के विघ्नों का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे कारण वह स्वयं होता है क्योंकि वह अपनो का भी हिस्सा छिनना चाहता है। अपने जीवन में धर्म से खिलवाड़ करता है।

 

घातक कालसर्प दोष

कुंडली में दशम भाव में स्थित राहु और चतुर्थ भाव में

 

स्थित केतु जब कालसर्प योग का र्निमाण करता है तो ऐसा कालसर्प दोष घातक कालसर्प दोष कहलाता है। इस योग में उत्पन्न जातक यदि मां की सेवा करे तो उत्तम घर व सुख की प्राप्ति होता है। जातक हमेशा जीवन पर्यन्त सुख के लिए प्रयत्नशील रहता है उसके पास कितना ही सुख आ जाए उसका जी नहीं भरता है।

 

ये तो हुई 12 प्रकार के काल सर्प दोषों की जानकारी। इनके विनाशकारी प्रभाव जातक को जीवन में तरह तरह की परेशानियों से दो चार करवाते हैं।

 

लेकिन कुछ ज्योतिषीय उपाय इन काल सर्प दोष से राहत दिला सकते हैं। चलिए जानते हैं काल सर्प दोष से राहत पाने के उपाय –

 

कैसे पाएं कालसर्प दोष से निजात

 

भगवान शिव की नियमित पूजा करें।

नागपंचमी पर धातु के नाग नागिन का जोड़ा मंदिर में चढ़ाएं।

अनामिका अंगुली में सोना, चांदी और तांबा से मिली धातु की सर्प की अंगूठी शनिवार को धारण करें।

चौखट पर चांदी स्वास्तिक लगाएं।

दाम्पत्य जीवन में ज्यादा क्लेश हो तो किसी शनिवार को दोबारा सात फेरे लगाकर शादी करें।

500 ग्राम का पारद शिवलिंग बनवा कर रुद्राभिषेक कराएं। घर में मोरपंख रखें। ओम नमो वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। एकाक्षी नारियल पर चंदन से पूजन कर के 7 बार सिर से घुमा कर प्रवाहित कर दें। सांप को सपेरे की मदद से दूध पिलाएं। नव नाग स्तोत्र का जाप करें। राहू यंत्र पास रखें या बहाएं। नाग पंचमी पर वट वृक्ष की 108 प्रदक्षिणा करें

 

संतान सुख में बाधा उत्पन्न कर सकता है कालसर्प योग, जानें किन उपायों को करने से मिलता है संतान सुख

 

कालसर्प दोष निवारण के विशेष उपाय

 

महादेव से की गई प्रार्थना तथा नौ ग्रह शांति से। घर गूंजती है किलकारियां. नाग उपासना से शांत होते हैं कुप्रभाव. जाने किन उपायों को करने से हो सकती है संतान सुख से संबंधित बाधाएं दूर हो सकती है. संतान सुख में बाधा उत्पन्न कर सकता है कालसर्प योग, जानें किन उपायों को करने संतान सुख मिल सकता है ।

 

ज्योतिष शास्त्र- कालसर्प दोष

एक वैवाहिक जीवन तभी सफल होता है, जब उसमें सभी तरह की खुशियां विद्यमान हो. चाहे वह सुख-शांति से संबंधित हो या फिर धन संपत्ति से. इनमें से एक प्रमुख चीज है संतान. जिसके बिना वैवाहिक जीवन और परिवारिक सुख के कोई मायने ही नहीं है. संतानहीनता दांपत्य जीवन का दुखद पहलू है. कुंडली में पांचवा घर संतान का होता है अर्थात संतान सुख कुंडली में पांचवें भाव, पांचवे भाव के स्वामी एवं गुरु की स्थिति का आकलन गहराई से किया जाता है. जिस व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प योग का संबंध संतान के घर से हो जाता है उसको संतान सुख मिलने में बाधा आती है.

 

यह योग संतान सुख से वंचित रहने में अहम भूमिका अदा करता है. कालसर्प योग का प्रभाव शनि जैसे क्रूर ग्रह के प्रभाव से भी अधिक पीड़ादायक हो सकता है. आज हम आपको विस्तृत रूप से जानकारी देने जा रहे है कि कुंडली में किन दोषों और समस्याओं के कारण कभी-कभी कुछ लोगों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो पाती. आइए जानते हैं –

संतान कारक ग्रह गुरु, मंगल ग्रह के साथ हो या लग्न का स्वामी राहु ग्रह के साथ हो अथवा लग्न में राहु और सप्तम में केतु कालसर्प योग बना रहा हो तो संतान बाधा उत्पन्न हो सकती है. संतान भाव (पंचम भाव) में सूर्य, मंगल, शनि व राहु हो तो संतान में बाधा होती है.

कर्क या धनु लग्न में संतान भाव में राहु ग्रह, बुध ग्रह के साथ हो या दृष्टि संबंध रखता हो अथवा संतान कारक ग्रह गुरु राहु के साथ हो तो संतान उत्पत्ति में बाधा होती है.

संतान भाव अर्थात पंचम भाव में राहु कालसर्प योग बना रहा हो और उस पर शनि की दृष्टि पड़ रही हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होती है.

जन्मपत्रिका में राहु व गुरु की युति होने पर सर्प दोष से भी संतान बाधा होती है.

जन्मपत्रिका में अष्टम भाव में शुक्र, गुरु एवं मंगल की युति हो तो भी संतान का अभाव होता है.

जन्मपत्रिका में यदि कालसर्प योग का संबंध पंचम भाव या पंचम भाव के स्वामी से हो तो संतान सुख में बाधा आती है.

जन्मकुंडली में पूर्ण कालसर्प योग हो या राहु पंचम भाव के स्वामी के साथ हो और पापी ग्रह पंचम भाव को देख रहे हों, तो भी व्यक्ति को संतान सुख प्राप्त नहीं होता है.

जन्म कुंडली में कालसर्प योग होते हुए यदि पंचमेश यानी पंचम भाव का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों और साथ ही पापी ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों तो संतान प्राप्त में दिक्कतें होती है.

संतान सुख प्राप्ति के लिए कारगर उपाय

जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं उनको यह उपाय इस समस्या के समाधान में सहायक हो सकते हैं. आइए जानते है किन उपायों से संतान सुख मिल सकता है। नाग पंचमी के दिन कालसर्प योग की शांति पूजा करनी चाहिए. इससे पूर्व जन्म कृत दोष मिट जाते हैं. प्रत्येक नागपंचमी को नाग उपासना करनी चाहिए. यदि किसी स्त्री की कुंडली इस योग से ग्रस्त हो, तो उसे नागपंचमी के दिन वट वृक्ष की 108 प्रदक्षिणा लगानी चाहिए.

पति-पत्नी को नियमित रूप से सर्प-सूक्त का पाठ करना चाहिए.

शिव मंदिर में तुलसी के पांच पौधे या पांच शिव मंदिरों में एक-एक बेल का पौधा लगाना घर में किलकारी की गूंज कराने में कारगर साबित हो सकता है.

कालसर्प योग से ग्रसित दंपत्ति को पलाश के पुष्प को सुखाकर उसका चूर्ण बना लें और फिर एक चुटकी नहाने के पानी में डाल कर नहाना चाहिए. ऐसा करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और उनके आशीर्वाद से संतान बाधा समाप्त हो जाती है.

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कन्या राशि वालों को काम में परफेक्शन के लिए ग्रह शांति करना आवश्यक होता है।

 

संकलन एवं प्रस्तुति:- टेकचंद्र शास्त्री,संपर्क क्रं 9822550220, वाटशप:-9130558008

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