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(भाग:247) मेघनाथ और कुंभकर्ण युद्ध में धराशायी होने से दशानन रावण भयभीत होकर गिर पडा। रामलीला मंचन

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भाग:247) मेघनाथ और कुंभकर्ण युद्ध में धराशायी होने से दशानन रावण भयभीत होकर गिर पडा। रामलीला मंचन

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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कुंभकरण इतना शक्तिशाली तथा विशालकाय शरीर का राक्षस था कि उसके आने से वानर सेना में हाहाकार मच गया था । यहाँ तक कि वानर नरेश महाराज सुग्रीव के प्राण भी संकट में आ पड़े थे। तब श्रीराम स्वयं युद्धभूमि में गए थे तथा कुंभकरण के साथ युद्ध किया था। अंत में श्रीराम की विजय हुई तथा कुंभकरण जैसे आततायी राक्षस का वध हुआ।

कुंभकर्ण, हिंदू पौराणिक कथाओं में एक महान राक्षस (दैत्य) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनकी कहानी महाकाव्य रामायण में विस्तार से बताई गई है। यहां कुंभकर्ण की कहानी का संक्षेप में वर्णन किया गया है:

 

कुंभकर्ण, रावण का भाई और मेघनाद (इंद्रजित) का भाई था। वह एक प्राचीन राक्षस थे जिन्हें वरदान मिला था कि वे अनवरत निद्रा कर सकेंगे। इसलिए उन्हें ‘कुंभकर्ण’ (कुम्भ का अर्णव) नाम दिया गया था, क्योंकि वे एक दिन और रात तक नींद में रह सकते थे।

 

कुंभकर्ण, रावण का वफादार भाई था, लेकिन उनका धर्म और नीति के प्रति समर्पण सभी के बारे में नहीं था। वे रावण की नीतियों के खिलाफ थे, लेकिन उन्होंने अपने भाई के प्रति वफादारी के कारण उनके आदेशों का पालन किया।

 

कुंभकर्ण ने राम और लक्ष्मण के वनवास के दौरान रावण के आदेश पर उन्हें विजयी बनाने के लिए लड़ने की कोशिश की। उन्होंने राम और लक्ष्मण के साथ द्वंद्व युद्ध किया और कठोर योद्धता दिखाई।

 

हालांकि, वे राम के प्रति उनकी देवताओं और धर्म की प्रेम भावना को देखकर मुदित हुए और ब्रह्मास्त्र के बारे में चेतावनी देकर उन्हें वापस लौटने की सलाह दी।

 

कुंभकर्ण की अंतिम लड़ाई राम के साथ हुई, जहां उन्होंने महाराजा दशरथ के शस्त्रों के आगे खड़ा होकर लड़ाई लड़ी। राम ने उन्हें एक विशेष ब्रह्मास्त्र से खत्म कर दिया, जिससे वह मर गए।

 

इस प्रकार, कुंभकर्ण रावण के महान और शक्तिशाली राक्षस भाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिन्होंने अपने नीति और योद्धा कौशल से मशहूरी प्राप्त की। उनकी कथा रामायण का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उन्हें राक्षसों के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में जाना जाता है।

 

कुंभकर्ण कितना शक्तिशाली था?

 

कुंभकर्ण राक्षसों के बीच महान और शक्तिशाली थे। उन्होंने अपने योद्धा कौशल, बल और वीरता के कारण विख्याति प्राप्त की थी।

 

कुंभकर्ण अत्यंत विशाल और मजबूत शरीर वाले थे। उनकी ऊँचाई करीब 70 गज (210 फीट) थी। वे ब्रह्मास्त्र, अग्निशस्त्र, वायव्यास्त्र और अन्य शक्तिशाली आस्त्रों का प्रयोग कर सकते थे। उनका बल और सामरिक योग्यता उन्हें एक अद्वितीय योद्धा बनाता था।

 

कुंभकर्ण रावण के साथ उनकी सेना के प्रमुख सेनापति थे। वे अपनी बहादुरी और लड़ाई कौशल के कारण अनेक देवताओं और ऋषियों को चिंतित करते थे।

 

हालांकि, यद्यपि कुंभकर्ण शक्तिशाली थे, लेकिन उन्होंने धर्म के खिलाफ रावण की नीतियों का पालन किया और भगवान राम के खिलाफ लड़ने में सहायता की।

 

उन्होंने अंत में राम के हाथों में अपनी जान गंवा दी, जब राम ने उन्हें ब्रह्मास्त्र द्वारा मार दिया।

 

इस प्रकार, कुंभकर्ण शक्तिशाली और प्रतिभाशाली राक्षस योद्धा थे जिन्होंने अपनी बल, योद्धा कौशल और वीरता से प्रमुखता प्राप्त की थी।

 

कुंभकरण कितने फुट का था?

 

कुंभकर्ण का वर्णन हिंदू पौराणिक कथाओं में मिलता है, जिसमें उनका विशाल और महान आकार बताया जाता है। कुंभकर्ण को एक राक्षस (दैत्य) के रूप में जाना जाता है और उनकी ऊंचाई विविध पाठकों द्वारा अलग-अलग रूपों में बताई गई है।

 

पुराणों और कथाओं के अनुसार, कुंभकर्ण की ऊंचाई लगभग 70 गज (यानी 210 फुट) तक होती थी। यह उनका अत्यंत महान और विशाल आकार दर्शाता है, जो उन्हें एक शक्तिशाली राक्षस के रूप में चित्रित करता है।

 

कुंभकर्ण को वरदान कहा से मिला?

 

कुंभकर्ण को वरदान मिलने की कथा रामायण में वर्णित है। यहां उस कथा की संक्षेप में वर्णन किया गया है:

 

कुंभकर्ण और उनके भाई मेघनाद (इंद्रजित) रावण के पुत्र थे। एक बार, रावण ध्यान में इतने विलीन हो गए कि उन्हें उठने का समय नहीं मिला। वह देवी ब्रह्माणी के आगे खड़े हुए और उनसे वरदान मांगने लगे।

ब्रह्माणी उनके दर्शन से आकर्षित हो गईं और उन्होंने उन्हें एक वरदान दिया कि वे अनवरत निद्रा कर सकेंगे। इस प्रकार, कुंभकर्ण को ब्रह्माणी ने उनकी इच्छा पूरी करके वरदान दिया कि वे एक दिन और रात तक निद्रा में रह सकेंगे।

यह वरदान कुंभकर्ण के लिए एक दुर्लभ और प्रभावशाली वरदान था, जो उन्हें असाधारण शक्तिशाली बनाता था। इसके कारण उन्हें “कुंभकर्ण” नाम दिया गया, क्योंकि वे अनवरत निद्रा में रह सकते थे। वरदान के कारण ही कुंभकर्ण राक्षसों के बीच में विख्यात हुए और उनका योग्यतापूर्ण योद्धा बना।

 

रामलीला में मेघनाथ, कुंभकरण व अहिरावण वध का मंचन किया गया। मंचन देखकर दर्शक कभी रोमाचित तो कभी भावुक हुए। उधर, कुंभकरण वध से रावण क्रोधित हो जाता है। मेघनाथ ने देवी के आह्वान के लिए यज्ञ शुरू किया। इसका ज्ञान होने पर हनुमानजी ने यज्ञ विध्वंस कर दिया। मेघनाथ युद्ध के मैदान में आ जाता है, जहां लक्ष्मण से युद्ध होता है। युद्ध में लक्ष्मण उसका वध कर देते हैं। रावण पाताल लोक से अहिरावण का आह्वान करता है। पूरा वृतांत सुनने के बाद अहिरावण ने विभीषण का वेश धारण कर श्री राम व लक्ष्मण का हरण कर लिया।

 

प्रात:काल होने पर श्री राम व लक्ष्मणजी को न पाकर सब आश्चर्यचकित हो जाते हैं। इस पर हनुमान यह बताते हैं कि रात्रि में तो विभीषण आए थे। विभीषण को समझते देर नहीं लगता कि यह कार्य अहिरावण का है। इस पर हनुमानजी श्रीराम और लक्ष्मण की खोज में पाताल लोक में जाते हैं। जहां अहिरावण देवी पूजन कर रहा होता है। हनुमानजी देवी के स्थान पर प्रकट होकर अहिरावण का वध कर श्री राम व लक्ष्मण को वापस लाते हैं। अहिरावण वध की सूचना पाकर रावण क्रोधित हो जाता है।

नवश्री रामलीला में कुंभकरण और मेघनाथ वध की लीला का मंचन किया गया। दोनों असुरों को मारने के लिए घमासान युद्ध को दर्शाने के लिए लीला आयोजकों ने युद्ध के दृश्यों को हाईटेक तरीके से जीवंत बना दिया। कुंभकरण और रावण संवाद का दर्शकों ने भरपूर आनंद उठाया। लीला में रावण जैसे विद्वान असुर के अहंकार के कारण के कारण उसके प्रिय और विश्वस्त पुत्र-भ्राता मेघनाथ और कुंभकरण को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है।

 

लवकुश रामलीला में हनुमान जी का मकरध्वज से युद्ध समेत कुंभकरण और अहिरावण वध का मंचन हुआ। रामलीला देखने के लिए लालकिला मैदान में काफी संख्या में लोग उपस्थित रहे। हनुमानजी की लीलाओं को देखकर हर्षित हुए। हनुमानजी का पराक्रम देखकर लोग जय हनुमान का उद्घोष करते रहे। तिकोना पार्क स्थित श्री नवयुवक रामलीला कमेटी में मेघनाथ लक्ष्मण युद्ध, अहिरावण प्रसंग, मेघनाथ वध का मंचन किया गया है। दंगल मैदान के श्री सनातन धर्मलीला लीला मंचन में अहिरावण वध व रावण अंगद संवाद का मंचन किया गया।

 

भगवान के साथ सेल्फी

 

भक्तों में रामलीला के पात्रों के साथ सेल्फी लेने की होड़ मची हुई है। नव श्री धार्मिक लीला कमेटी में रामायण के पात्रों के साथ सेल्फी लेने का मौका दिया जा रहा है। रामलीला देखने आए श्रद्धालु खासकर युवा सेल्फी, गु्रप फोटो पर जोर दे रहे

महाभारत और रामायण को पढ़ते समय हमारे लिए सबसे जरूरी नायक और खलनायक होते हैं. लेकिन कुछ पात्र ऐसे होते हैं जो पूरी तरह से ना नायक की श्रेणी में आते हैं और ना ही खलनायक की. कहीं न कहीं ये पात्र हमारी जिंदगी से भी जुड़े होते हैं क्योंकि हमारे अंदर भी अच्छे और बुरे दोनों गुण होते हैं. ऐसा ही एक पात्र है इंद्रजीत जो बहुत ही शक्तिशाली था. आइए जानते हैं उसकी कहानी.

जब हम महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों को पढ़ते हैं, तो हमारा ज्यादा ध्यान नायकों और खलनायकों पर जाता है. हम उन पात्रों पर कभी ध्यान नहीं देते हैं, जिनका किरदार इन दोनों खांचों में नहीं आता. ऐसा ही एक पात्र था रावण का बेटा इंद्रजीत यानी मेघनाद. इंद्रजीत था तो रावण की सेना में लेकिन वह बहुत ही शक्तिशाली, निपुण और वफादार था. उसके सामने तमाम शक्तिशाली देवता भी कमतर पड़ जाते थे. आइए जानते हैं इंद्रजीत की कहानी

 

1. रावण का निपुण पुत्र

 

जैसा कि हम जानते हैं रावण बेहद शक्तिशाली था. सभी अहंकारी लोगों की तरह वह भी एक निपुण बेटा चाहता था. उस समय रावण ने हर चीज़ जीत ली थी. रावण के डर से ग्रहों ने ऐसा समय तैयार किया, जिससे रावण का बेटा शुभ समय पर पैदा हुआ. इसके कारण रावण के बेटे को अच्छा जीवन मिला.

रावण के बेटे को जन्म रावण की पत्नी मंदोदरी ने दिया था. और जब उसका जन्म हुआ तो उसकी चीखें गड़गड़ाहट की तरह सुनाई दीं. इसलिए उसका नाम मेघनाद रखा गया.

 

3. सबसे शक्तिशाली योद्धा बनने की तैयारी

 

मेघनाद को शुक्र देव ने शिक्षा दी थी. शुक्र असुरों के गुरु थे. उनके कई प्रसिद्ध शिष्य भी थे. उनके कुछ प्रसिद्ध शिष्य थे जैसे प्रह्लाद, बाली और भीष्म. शुक्र ने उन्हें युद्ध के सभी रहस्य सिखाए. मेघनाद ने उनसे सभी हथियारों और रणनीतियों के बारे में सीखा. इसमें उन्होंने महारत हासिल की. युद्ध कलाओं के अलावा मेघनाद ने जादू-टोने की कलाएं भी सीखीं जो उस समय बहुत ही कम लोगों को आती थी.

 

4. इंद्र को हराकर स्वर्ग पर विजय

 

देव और असुर हमेशा से एक दूसरे के खिलाफ लड़ते थे. इनमें से एक युद्ध में रावण और मेघनाद ने भी भाग लिया था. युद्ध के दौरान, रावण हार गया और बेहोश हो गया. मेघनाद ने गुस्से में आकर इंद्र से युद्ध किया. उसने इंद्र को हरा दिया और उसे अपने रथ से बांधकर धरती पर ले गया. ब्रह्मा जी को डर था कि मेघनाद देवताओं के राजा इंद्र को मार सकता है. इसलिए, ब्रह्मा जी ने मेघनाद को वरदान के बदले इंद्र को रिहा करने के लिए कहा.

 

5. किसी भी युद्ध में पराजित न होने का वरदान

 

मेघनाद ने अमरता का वरदान मांगा. ब्रह्मा ने कहा कि यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ है. इसलिए, ब्रह्मा ने उन्हें युद्ध में पराजित न होने का वरदान दिया. मेघनाद को वरदान मिला कि उसे कभी कोई हरा नहीं पाएगा. लेकिन एक शर्त पर कि उसे युद्ध पर जाने से पहले एक यज्ञ करना होगा और अपनी आराध्य देवी की पूजा करनी होगी. इंद्र को हराने के कारण ही ब्रह्मा जी ने मेघनाद का नाम इंद्रजीत रखा था.

 

6. रामायण के युद्ध के समय उसने अकेले वानर सेना को हराया

 

रावण की हार और कुंभकर्ण के मारे जाने के बाद ही इंद्रजीत ने युद्ध में प्रवेश किया. उसने अपने सभी भाइयों को युद्ध में खो दिया था. वह अजेय था. जिस दिन उसने युद्ध में प्रवेश किया, उसी दिन उसने राम की सेना में अपना आतंक फैला दिया. युद्ध के दौरान उसे कोई पराजित नहीं कर पा रहा था.

 

7. उसने हनुमान जी को भी हराया

 

हनुमान जी, जो कि धरती पर सबसे ताकतवर थे. उन्हें भी ब्रह्मास्त्र का उपयोग करके इंद्रजीत ने हरा दिया था.

राम जो कि विष्णु जी के अवतार थे, उनकी हार भी तब हुई. जब इंद्रजीत ने राम जी पर अपने सबसे शक्तिशाली हथियारों में से एक नागपाश को छोड़ दिया. उस हथियार ने राम और लक्ष्मण के शरीर के चारों ओर लपेटे हुए एक लाख सांपों को छोड़ दिया. जिससे वे हार गए. गरुड़ ने उनकी जान बचाई.

 

9. लक्ष्मण भी दो बार हारे

 

राम और लक्ष्मण को दोबारा पराजित करने के लिए उसने अपनी जादू-टोने की कला का सहारा लिया. इससे राम और लक्ष्मण के लिए उसे मारना बहुत कठिन हो गया था क्योंकि इंद्रजीत बार बार गायब हो रहा था. राम और लक्ष्मण अगली बार भी उसे पराजित नहीं कर सके. इंद्रजीत ने ब्रह्माण्ड अस्त्र बनाया था जो कि सबसे खतरनाक हथियार था. उस हथियार ने राम और लक्ष्मण की पूरी सेना को बेहोश कर दिया था. यही कारण था कि हनुमान जी को सब के लिए संजीवनी का पौधा प्राप्त करने के लिए हिमालय जाना पड़ा था.

 

10. राम की सेना का मनोबल टूटा

 

अगले दिन इंद्रजीत को आश्चर्य हुआ कि राम और लक्ष्मण अभी भी जीवित थे. इसलिए उसने पूरी सेना का मनोबल गिराने के लिए एक योजना बनाई. उसने सीता के भ्रम को असली दिखाया. हर कोई उसे सही समझ रहा था. फिर उसने पूरी वानर सेना के सामने सीता के माया रूप का वध कर दिया. यह खबर सुनकर राम वहीं गिर गए. बाकी वानर सेना भी टूट गई.

 

11. राम को इंद्रजीत का रहस्य पता चला

 

इंद्रजीत को लगा कि वह ये युद्ध आसानी से नहीं जीत पाएगा. इसलिए, उसने सोचा कि युद्ध में प्रवेश करने से पहले यज्ञ किया जाए. रावण के भाई विभीषण एक अच्छे व्यक्ति थे. उनका मानना ​​था कि सीता का अपहरण बिल्कुल भी सही नहीं था. उन्होंने राम और लक्ष्मण को इंद्रजीत के अजेय होने का रहस्य बता दिया. जिसके बाद हनुमान ने लक्ष्मण के साथ मिलकर उनका यज्ञ भंग कर दिया था. उस यज्ञ को करने का एक नियम यह भी था कि पूजा स्थल पर शस्त्र न हो. लक्ष्मण ने इस नियम को भी तोड़ने की कोशिश की.

 

12. निडर होकर उसने अगले दिन लक्ष्मण के खिलाफ सबसे भयानक हथियार उतारे

 

लक्ष्मण के अपनी देवी का अपमान करने और विभीषण के धोखे की वजह से इंद्रजीत को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने विभीषण को भी मारने का संकल्प लिया लेकिन लक्ष्मण ने विभीषण को बचा लिया. युद्ध के अंत में इंद्रजीत ने सारी सृष्टि के तीन सबसे शक्तिशाली हथियारों के इस्तेमाल किया – ब्रह्माण्ड अस्त्र, पाशुपतास्त्र और वैष्णवस्त्र. इन परम अस्त्रों में से एक भी लक्ष्मण को छू तक नहीं पा रहा था.

 

13. राम कोई साधारण इंसान नहीं

 

वैष्णवस्त्र – विष्णु का हथियार. जिसने लक्ष्मण को बिना नुकसान पहुंचाए उनकी परिक्रमा की. इंद्रजीत को समझ आ गया कि लक्ष्मण और राम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं. उन्होंने अपनी जादुई शक्तियों का इस्तेमाल करके तुरंत खुद को रावण के सामने पहुंचाया. उसने अपने पिता से सीता को वापस देने की प्रार्थना भी की.

 

14. रावण इंद्रजीत को अपमानित करते हैं

 

शक्ति के नशे में धुत रावण ने अपने ही पुत्र पर ध्यान देने से इंकार कर दिया. जैसे रावण ने विभीषण की उपेक्षा की थी. उन्होंने युद्ध से भागने के लिए इंद्रजीत को कायर कहा. इंद्रजीत ने गुस्से में आकर कहा कि पुत्र के रूप में वह अपना कर्तव्य निभाता रहेगा. जिसके बाद रावण ने भी कह दिया कि वह अपना पक्ष नहीं छोड़ेगा.

 

15. इंद्रजीत अपनी हार स्वीकारता है

 

इंद्रजीत को एहसास होता है कि उसके पिता सीता को कभी नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने यह भी महसूस किया कि राम और लक्ष्मण इंसानों से कहीं ज्यादा हैं. लक्ष्मण के हाथों अपनी मौत को स्वीकारते हुए, वह अंतिम रूप से युद्ध में चला गया. लेकिन फिर भी उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा. लेकिन इस बार, लक्ष्मण ने इंद्रजीत का वध कर दिया था. लक्ष्मण ने पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली योद्धा को समाप्त कर दिया था.

इंद्रजीत पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र व्यक्ति थे जिनके पास तीन परम हथियार – ब्रह्माण्ड अस्त्र, पाशुपतास्त्र और वैष्णवस्त्र एक साथ थे. उन्हें अतिमहारथी के रूप में भी जाना जाता था. जो एक ही समय में 12 महारथियों की शक्ति रखते थे. हालांकि अर्जुन, कर्ण, राम, लक्ष्मण, कृष्ण और हनुमान महारथी थे. वह उन सब को आसानी से पराजित कर सकता था. हालांकि रावण और कुंभकर्ण भी शक्तिशाली थे. लेकिन अंत तक भी उन्होंने अपने पिता का साथ नहीं छोड़ा था. एक अच्छे पुत्र की भूमिका निभाई यानी अपनी मृत्यु होने तक

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