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(भाग:294) देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के सबसे परमभक्त है पं दशानन रावण महाराज

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भाग:294) देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के सबसे परमभक्त है पं दशानन रावण महाराज

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के सबसे परम् भगत कौन था? तो उसे महान प्रकाण्ड विद्धान पं दशानन रावण महाराज कानाम आता है

नन्दी जी।। वो सबसे प्रिय थे शिव जी को।। किसी

भक्त की पूजा हो ना हों नन्दी जी की पूजा होती हैं बाकी भक्त तो बहुत हैं शिव जी के।। ये मेरा मत हैं नन्दी जी ने बिना स्वार्थ बिना कोई मांग के भक्ति की हैं।।

सच पूछो तो भक्त बड़े या छोटे नहीं होते.वैसे तो आप सभी को पता है कि दशानन रावण भगवान भोलेनाथ का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। पौराणिक शास्त्रों के सबसे बड़े खलनायक की उपाधि रखने वाला रावण अपने अंदर कई अच्छाई भी रखता था।रावण बहुत बड़ा पंडित था और इसी कारण भगवान राम ने उससे विजय यज्ञ करवाया था। रावण ने शिवतांडव स्त्रोत की रचना की, जो आज भी शिव अराधना का सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है। रावण

को शिव का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद भगवान शिव ने कही थी कि रावण बहुत बड़ा शिवभक्त है, उसकी भक्ति पर भगवान राम को भी शक नहीं था।

 

पार्वती जी नंदी जी गणेश ji वासुकि जी जिन को भगवान ने गले में धारण किए ।

कैसे हुआ था “महादेव भोलेनाथ ” का जन्म?

भगवान महादेव जी की कितनी आंखें थीं?

महादेव (शिव) के सबसे परम भगतो में से महर्षि मार्कण्डेय ऋषि को माना जाता है उन्हें शिवपुराण में भी विशेष महत्व दिया गया है। विश्व की रचना के अग्रदूत के रूप में माने जाने वाले मार्कण्डेय ने शिव के प्रतिष्ठान, महिमा, और अनंत शक्ति को अनुभव् किया था। उन्होंने तपस्या और ध्यान द्वारा अपने मन को शिव के प्रतीक रूप में स्थिर किया था और उन्होंने आत्मज्ञान और प्रेम के माध्यम से भगवान शिव का पारम्य दर्शाया।

 

महादेव का सबसे परम भक्त माना जाता है भगवान शिव के द्वारा। शिव के अनेक भक्त थे और उनमें से कई प्रमुख भक्तों के नाम मान्यताओं में प्रस्तुत हैं। हालांकि, एक व्यक्ति को ‘महादेव का सबसे परम भक्त’ कहना किसी निश्चित रूप से संभव नहीं है, क्योंकि भक्ति और आध्यात्मिकता व्यक्ति की आंतरिक अनुभवों पर आधारित होती हैं और इसे मापना असम्भव है।

 

हालांकि, शिव के एक विशेष भक्त का उल्लेख महाकवि कालिदास द्वारा किया गया है। मान्यताओं के अनुसार, कालिदास ने अपने काव्य में शिव के प्रति अद्वैत भक्ति का वर्णन किया है और वे शिव के उच्च स्तरीय भक्त माने जाते हैं।

 

विभिन्न पुराणों और ग्रंथों में भी शिव के प्रमुख भक्तों के चरित्

महादेव का सबसे बड़ा भक्त कौन था?

परम शिवभक्त रावण से जुड़ी वो 10 बातें जो आप नहीं जानते होंगे

यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद भगवान शिव ने कही थी कि रावण बहुत बड़ा शिवभक्त है…

 

श्रावण का पावन माह भगवान शिव की भक्ति के लिए जाना जाता है। अगर महादेव अपने गुस्सैल स्वभाव के लिए जाने जाते है तो सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले भी वही हैं। भक्त भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए जल ओर बेल पत्र से उनका अभिषेक करते हैं।

 

वैसे तो आप सभी को पता है कि दशानन रावण भगवान भोलेनाथ का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। पौराणिक शास्त्रों के सबसे बड़े खलनायक की उपाधि रखने वाला रावण इन सबके इतर अपने अंदर कई अच्छाई भी रखता थी। आइए रावण के जीवन से ऐसे ही कुछ बातों को जानने की कोशिश करते हैं जो हम सभी को सीखना चाहिए।

10. रावण को लेकर आज भले चाहे जो माना जा रहा हो लेकिन वह बहुत बड़ा और अच्छा राजा माना जाता था, रावण की लंका में उसके राज्यवाले बहुत ज्यादा खुश रहते थे। आपको ज्ञात तो इसी कारण भगवान राम ने लक्ष्मण को भेजा था उसके पास राजनीति के टिप्स लेने को। यही नहीं उसकी सोने की लंका में किसी को कोई भी कष्ट नहीं था। रावण की प्रजा उससे खुश और संतुष्ट थी।

 

9. यही नहीं रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भी रावण को भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त और उनके अच्छे गुणों के बारे में काफी लिखा है।

 

8. रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ बहु-विद्याओं का जानकार था।

 

7. देश के कम ही लोग हैं जो यह जानते हैं कि मध्यप्रदेश के मंदसौर सहित देश के कई कोनों में रावण पूजा उसकी अच्छाईयों के कारण किया जाता है।

 

6. रावण को मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसने युद्ध के दौरान राम को बहुत बार छकाया था।

 

5. रावण बहुत बड़ा पंडित था और इसी कारण भगवान राम ने उससे विजय यज्ञ करवाया था। रावण ने शिवतांडव स्त्रोत की रचना की, जो आज भी शिव अराधना का सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार रावण को कई भाषाओं का ज्ञान था।

 

4. रावण को लोग बहुत बढ़िया कवि कहते थे, उसने कई रचनाएं भी लिखी हैं। रावण ने तांडव स्तोत्र, अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी।

 

3. रावण को शिव का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद भगवान शिव ने कही थी कि रावण बहुत बड़ा शिवभक्त है, उसकी भक्ति पर भगवान राम को भी शक नहीं था।

 

2. बहन सूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने सीताहरण किया था। उसके पीछे रावण का तर्क था कि वह भाई का धर्म निभा रहा है। उसने वो ही किया जो एक भाई को करना चाहिए। लेकिन उसका तरीका गलत था।

 

1. रावण ने सीता का अपहरण जरूर किया था लेकिन उसने कभी भी अपने पौरूष का गलत फायदा नहीं उठाया, उन्होंने दो साल तक सीता को बंदी बनाये रखा लेकिन कभी भी सीता को हाथ नहीं लगाया। रावण ने सीता के सामने

शुद्ध सनातन धर्म में दो महान ग्रंथो रामायण और महाभारत दोनों में ही भगवान श्री हरि विष्णु के दो महावतों श्री राम और श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं और कथाओं का वर्णन है। वैष्णव मत प्राचीन काल से ही इन दोनों ग्रंथों में अपने मत के सबसे महान ग्रंथ शामिल हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इन दोनों ग्रंथों में देवाधिदेव महादेव शिव की महिमा का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। असली अगर गौर से देखें तो पूरी तरह से महाभारत के दो ही प्रमुख नायक हैं – पहले भगवान कृष्ण और दूसरे देवाधिदेव महादेव शिव।

 

रामायण में शिव भक्ति:

रामायण के दो पात्र श्रीराम और रावण दोनों ही भगवान शिव के महान भक्त के रूप में आज भी प्रचलित हैं। जहां रावण को उस काल का सबसे महान शिवभक्त कहा गया है वहीं रावण को एक प्रकांड विद्वान के रूप में भी दिखाया गया है। रावण ने ही शिव भक्ति में शिवतांडव स्त्रोत की रचना की थी जिसे आज भी पिकोरो में और शिवालयों में गाया जाता है।

 

भगवान श्री राम के भी शिव भक्त रूप दिखाए गए हैं। रामकथाओं में शिव को राम का प्रिय और श्रीराम को शिव को प्रिय दर्शाया गया है। रामसेतु निर्माण से पहले तमिल में समुद्र तट पर भगवान श्री राम के शिव लिंग की स्थापना का विवरण मिलता है। रिवाल्वर स्थित शिवलिंग की महिमा प्राचीन काल से ही चली आ रही है।

 

महाभारत में शिव भक्ति:

व्यास रचित महाभारत में एक नहीं कई स्तोत्रों को महान शिव भक्तों के रूप में दर्शाया गया है। महाभारत में शिव जी की सक्रिय भूमिका सामने आई है। महाभारत में शिव जी द्वारा त्रिपुर राक्षसों के वध की कथा कई स्थानों पर प्रकट हुई है। कैसे भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षसों को एक ही बाण से मारा था और शिव कैसे आदि और अनंत थे यह बार बार दिखाया गया है।

 

महाभारत में शिव जी के कई स्थानों पर संसार की रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता के रूप दिखाए गए हैं। भगवान शिव का विवाह, गंगा को अपनी जटाओं में लेना, उनके पुत्र कार्तिकेय का जन्म, स्वयं भगवान शिव के जन्म की कथा, समुद्र मन्थन में भगवान शिव के द्वारा हलाहल विष के पान की कथाएँ विस्तार से दी गई हैं। इसके अलावा भगवान शिव के कई महान भक्तों के रूप भी दिखाए गए हैं।

 

भगवान शंकर के महान भक्त श्रीकृष्ण :

महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान शिव के महान भक्त का रूप दिखाया गया है। महाभारत में भगवान कृष्ण को नारायण का अवतार बताया गया है। कथा है कि नारायण रूप में भगवान विष्णु ने बद्रीकाश्रम में भगवान शिव की तपस्या की थी और उन्हें अनेक पुष्प प्राप्त हुए थे। यह कथा आदि पर्व, वन पर्व और द्रोण पर्व में कई बार बताई गई है।

 

जब अर्जुन जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा लेते थे तो कृष्ण चिन्तित हो जाते थे क्योंकि जयद्रथ भगवान शिव के भक्त थे और उन्हें आभूषण प्राप्त थे। ऐसे में श्रीकृष्ण अपने साथ सपने में अर्जुन को कैलाश पर्वत पर ले गए हैं। श्रीकृष्ण भगवान शिव की स्तुति करते हैं और भगवान शिव से अर्जुन को विजय का आशीर्वाद दिलाते हैं। भगवान शिव अर्जुन को पाशुपतास्त्र का जाग्रत कर उसका उपयोग करने की शक्ति देते हैं।

 

भगवान शिव के महान भक्त अर्जुन:

जिस प्रकार के श्रीकृष्ण नारायण के अवतार हैं उसी प्रकार अर्जुन भी भगवान विष्णु के ही नर रूप के अवतार हैं। नर और नारायण दोनों ने ही बद्रीकाश्रम में भगवान शिव की तपस्या की थी और उन्हें अनेकों आशीर्वाद प्राप्त हुए थे।

 

वन पर्व में अर्जुन के द्वारा भगवान शिव के साथ युद्ध कर उन्हें मंत्रमुग्ध करने की भी कथा है। जब भगवान शिव ने भील के रूप में एक शूकर को कुचल दिया और उसी शूकर को अर्जुन ने भी अपने बाण से कुचल दिया। दोनों के बीच शुकर पर आधिपत्य को लेकर युद्ध होता है। अर्जुन की वीरता से प्रिय भगवान शिव उन्हें पाशुपतास्त्र देते हैं।

द्रोण पर्व में जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा लेने के बाद स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कैलाश पर्वत पर ले गए थे, जहां अर्जुन भगवान शिव की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न करते हैं और पाशुपतास्त्र का प्रयोग करने की सलाह लेते हैं।

 

अर्जुन जब द्रोण का वध करते हैं तो उनके आगे भगवान शिव अपना त्रिशूल लेकर आते हैं और शेष सेना का संहार करते हैं। यह कथा द्रोण पर्व में दी गई है।

 

शिव भक्त द्रौपदी :

द्रौपदी को संपूर्ण महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण की साखी और भक्त के रूप में दिखाया गया है। लेकिन महाभारत में कथा है कि पूर्वजन्म में द्रौपदी भगवान शिव के भक्त थे। भगवान शिव की तपस्या के फलस्वरुप ही उन्हें अगले जन्म में पांच देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

शिव भक्त शिखंडी:

महाभारत में भीष्म पितामह के वध का कारण शिखंडी को बताया गया है। कथा है कि शिखंडी के पूर्व जन्म में काशीराज की पुत्री अम्बा थीं जिन्हें हरण भीष्म पितामह ने अपने भाई के लिए विचित्रवीर्य के लिए लिया था। लेकिन अम्बा को शल्यक्रिया पसंद थी। भीष्म अम्बा को राजा शल्यचिकित्सा के पास भेज देते हैं। लेकिन राजा उन्हें नशे की लत से लाचार कर देते हैं। अम्बा भीष्म के पास वापस आ जाते हैं और उनकी पत्नी के रूप में विरोध का आग्रह करते हैं। भीष्म लाचार कर देते हैं। अम्बा भीष्म के वध की प्रतिज्ञा लेकर भगवान शिव की आराधना करते हैं और भगवान शिव उन्हें अगले जन्म में भीष्म के वध का आशीर्वाद देते हैं।

 

महादेव भक्त द्रुपद :

राजा द्रुपद को जब द्रोण के शिष्य अर्जुन ने परास्त कर बंदी बना लिया तब उस अपमान से द्रुपद भी भगवान शिव के शरण में चले गए। भगवान शिव की तपस्या करते हैं। भगवान शिव ने द्रुपद को एक कन्या का रूप देकर प्रसन्न किया। इस श्रृंगार के फलस्वरुप द्रुपद के यहाँ शिखंडी का जन्म होता है। शिखंडी के जन्म के बाद ही धृष्टद्युम्न और द्रौपदी का जन्म हुआ। धृष्टद्युम्न ही द्रोण का वध करते हैं। शिखंडी भीष्म का वध करते हैं और द्रुपद का बदला पूरा करते हैं।

 

जयद्रथ की शिव भक्ति :

दुर्योधन की बहनोई जयद्रथ एक बार द्रौपदी के अपमान का प्रयास करता है तो पांडव उसे कड़ी सजा देते हैं और उसके सिर मूंड देते हैं। इस अपमान से आहत जयद्रथ भगवान शिव की पूजा करते हैं। भगवान शिव से वो महिमा मांगते हैं कि वो पांडवों को हराना चाहते हैं। शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि भगवान एक दिन के लिए अर्जुन के सभी शत्रुओं की हार दूर कर सकते हैं। महाभारत के जिस दिन चक्रव्यूह की रचना होती है उसमें अर्जुन त्रिगर्तों की सेना को परास्त करने के लिए युद्ध क्षेत्र से दूर निकल जाते हैं और उस दिन जयद्रथ पांडवों के शेष शत्रुओं को युद्ध में परास्त कर देते हैं। इसी दौरान अभिमन्यु का वध भी होता है। जयद्रथ शिव जी के वैभव का फलस्वरुप ऐसा करने में सफल होता है। जब अर्जुन को अपने पुत्र के वीरगति की सूचना प्राप्त हुई तब उन्होंने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा की। अर्जुन भगवान शिव की कृपा से जयद्रथ का वध होता है।

 

अश्वत्थामा की शिव भक्ति :

द्रोण पुत्र अश्वत्थामा भी भगवान शिव के महान भक्त थे। उन्होंने अपने पिछले जन्म में भी भगवान शिव की कड़ी तपस्या की थी और उन्हें अनेक सौभाग्य प्राप्त हुए थे। इस जन्म में जब उनके पिता का वध हुआ था और दुर्योधन को भीमसेन ने मारा था तब वो एक बार फिर से भगवान शिव की स्तुति कर उन्हें मोहित करते हैं और पांचों के विनाश का श्रृंगार प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के श्रृंगार का फलस्वरुप ही वो शिखंडी, धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पांचों पुत्रों और कई अन्य वीरों की हत्या कर देता है।

 

शिव भक्त गांधारी :

महाभारत में दुर्योधन की माता गांधारी को महान शिव भक्त दर्शाया गया है। भगवान शिव की कृपा से ही उन्हें सौ पुत्रों का आभूषण प्राप्त होता है। भगवान शिव की कृपा से ही दुर्योधन का आधा शरीर वज्र बन जाता है। शिव की भक्ति गण भगवानि सदैव सत्य का पालन करती है और महान पतिव्रता नारी है।

क्या अमर

शुद्ध सनातन, सनातन धर्म के शुद्धतम स्वरूप को पुनः परिभाषित करने का एक मिशन है। सदियों से सनातन धर्म के सार को सर्वोच्च भगवान और महान संतों द्वारा मानवता के मूल्यों को उजागर करने के लिए परिभाषित किया गया है। सनातन धर्म का लक्ष्य मानव आत्माओं को मोक्ष या सभी पापों से मुक्ति पाने के लिए मार्गदर्शन करना है।

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