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कीटनाशक छिड़काव की वजह से विनष्ट हो रहे है रामबाण जैविक औषधीय बीरबहूटी

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कीटनाशक छिड़काव की वजह से विनष्ट हो रहे है रामबाण जैविक औषधीय बीरबहूटी

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

 

लैंगिक लकवा (पेनिस पिरालिसिस)रोग और बन्धत्व, बांझपन निवारण के लिए रामबाण जैविक औषधीय बीरबहूटी कीडे कीटनाशक छिड़काव की वजह से विनष्ट और विलुप्त होने की कगार पर हैं। लैंंगिक लकवा पेनिस पैरालिसीस यानी कमजोर लिंग पेनिस के खड़े न होने में दुर्लभ बीर बहूटी का कीडा इस्तेमाल किया जाता रहा है। प्राचीनकाल में राजवैध इन लाल रेशमी बीरबहूटी लाल रेशमी कीड़ों को चुनकर कांच की बर्नी मे जमा करते थे। बाद मे आवश्यकता पडने पर सूखे बीरबहूटी को इमामदस्ता मे कूटपीसकर महीन पेस्ट बना लेते थे और फिर सरसों या जैतून के तेल में मथकर इसके पेस्ट को 30 दिन तक लैंंगिक लकवा रोगी के लिंग के शिषन पर लेप मालिश करते पश्चात बंगला पान लपेटकर धीमी आंच से शिकाई करने से इस गंभीर समस्या का समाधान तय है।

 

वैदिक कालीन भारतीय आयुर्विज्ञानचरकसंहिता,श्रुश्रुतसंहिता भावप्रकाश,सालिगराम निघन्टू,अमृत सागर और रसराज महोदधी ग्रन्थ के अनुसार आषाढ मास मे वर्षा ऋतु के प्रारंभ होते ही ये लालरेशमी बीरबहूटी जैविक औषधीय चिकनी और गीली मिट्टी में रेंगते व विचरण करते पाया और देखा जाता था? परंतु विगत 15–20 वर्षों से तमाम किसान अपने कृषि उपज बढाने के लिए यूरिया सल्फेड का उपयोग और कीटनाशक छिड़काव की वजह से ये जैविक औषधीय कहे जाने वाले लाल रेशमी बीरबहूटी विनष्ट और विलुप्त होने की कगार पर है?

बीरबहूटी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ विर + वधूटी] एक छोटा रेंगनेवाला लाल रेशमी कीड़ा । उ॰—(क) कोकिल बैन पाँति बग छूटी । धन निसरी जनु बीरबहूटी ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) बीर- बहूटी बिराजहि दादुर धुनि चहुँओर । मधुर गरज धन बरखहिं सुनि सुनि बोलत मोर ।—तुलसी (शब्द॰) । विशेष—यह किलनी जाति का होता है ओर प्रायः बरसात आरभ होने के समय जमीन पर इधर उधर रेंगता हुआ दिखाई पड़ता है । इनका रंग गहरा लाल होता है और मखमल की तरह इसपर छोटे छोटे कोमल रोयें होते हैं । इसे ‘इंद्रवधू’ भी कहते हैं

नदियों के तटीय आस-पास नरम मिट्टी में लाल मखमली चादर फैल जाएगी। अनेक छोटे-छोटे जीव जमीन के अन्दर से प्रगट हो जायेंगे। आमतौर पर इस जीव को बीरबहुटी कहा जाता है। इसे रेन कीट भी कहा जाता है। तकनीकी रूप से कीट या कीट कहलाने के लिए छै पैरो का होना ज़रूरी है। इसके आठ पैर होते हैं क्योंकि इसे मकोड़ा या माइट कहा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम रेड वेलवेट माइट है। मध्य भारत में इसे रानी कीड़ा कहा जाता है। बच्चे का यह पसंदीदा जीव है। वे इसे एकत्रित करके डिबियो मे रख लेते हैं फिर उससे खेलते हैं। इसे मुहैया पर आत्म रक्षा में यह पैरो को सिकोडता है। बच्चे पैर सिकोड़े जीवो को एक मोड़ में रख देते हैं और फिर उनके बीच प्रतियोगिता करवाते हैं। जो पहले पैर बाहर भागता है। आयुर्विज्ञान रसराज महोदधि के मुताबिक 3 तोला बीरबहूटी का पावडर,2तोला सांप की केंचुली का पाउडर, 1तोला सफेद काकजंघा बूटी का पाउडर, में 200 ग्राम बाल गधे का मूत्र में 4 घन्टे तक इमामदस्ता मे घुटाई करना पडता है? पश्चात इसका पेस्ट लिंग के शिसन मे शायं सोने के पूर्व लेप करना पडेगा? पश्चात बंगला पान लपेटकर सो जाएं? 2 महिना के अंदर लैंगिक विकास यानी लिंग की लंबाई, मोटाई और कडक मज़बूत हो सकता है?

हमारे यहाँ से इसे बनारस भेजा जाता है जहाँ से इसका तेल बनकर वापस अन्य राज्यों के आयुर्वेदाचार्यों को बेच दिया जाता है। हमारे प्राचीन आयुर्विज्ञान चरक संहिता, अमृतसागर, श्रुशुत संहिता, रसराज महोदधी,हंसराज निदान, माधव निदान, सालिगराम निघन्टू इत्यादि ग्रंथो αλαλαι ग्रीक चिकित्सा ग्रंथो में इसे सम्माननीय स्थान प्राप्त है। इसकी तासीर गरम मानी जाती है। पक्षाघात और बांझ महिलाओं का बन्द मासिकधर्म शुरु हो जाता है। इसके तेल की मालिश की जाती है। यह कहा जाता है कि भाग विशेष यानी पेनिस में वीर्य स्थूलीकरण कर देता है। आंतरिक दवा के रूप में आप तो ताकत की दवा के रूप में इसका उपयोग अधिक प्रसिद्ध है पर देश के पारंपरिक चिकित्सक 40 से अधिक प्रकार के रोगों में इसका उपयोग करते हैं। इनमें मधुमेह भी शामिल है।

जानकार लोग इसे चंद रुपयों में रानी कीडे को सेहत से इकट्ठा किया करते है, फिर दिल्ली जैसे महानगरों तक बेच देते हैं। वर्तमान परिवेश मे इसकी असली कीमत 50 लाख रुपए प्रति किलो ग्राम में पहुंच गई है। यह पारा में ट्राइंबिडियम के नाम से बिकता है। इसकी कीमत दस गुना अधिक हो जाती है। भारत से ही विश्व भर में इसकी आपूर्ति होती है। जिस साल सूखा पड़ता है उस साल ये कम निकलते हैं। फलस्वरूप इसका दाम आसमान लगता है

मैं इसकी वर्तमान संख्या उपलब्ध नही होने से आयुर्विज्ञान विशेषज्ञ चिंतित हैं। पिछले 3 दशक में इसकी संख्या बहुत तेजी से घटी है। माने इस मकोड़े को विशेष गुणों से परिपूर्ण पाया गया है। पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान यह उन माताओं में से एक थी जिन्होने प्रतिक्रिया दिखाई। इसके गुणों से प्रभावित होकर भूकंप की पूर्व सूचना देने के लिए इसके प्रयोग की सलाह अपने शोध-पत्रों के माध्यम से दी गई। संभवतःआज इस मकोड़े पर विश्व में सबसे अधिक वैज्ञानिक लेख मेरे द्वारा ही तैयार किया गया है। कुछ साल पहले तक श्री धुरु नाम एक ग्रामीण के साथ मिलकर फिल्म बना रहा था। 70 से अधिक उम्र के दौरान यह शक्स जीवित मकोड़े का खाता भी जाता था। उनका दावा था कि अब उन्हें साल भर कोई बीमारी नहीं होगी। आमतौर पर लक्षणों के बाद इसे रोगों को बहिष्कृत कर दिया जाता है और वे इसे गुलकन्द समझकर खा जाते हैं। कई बार केले के अन्दर या गुड़ के साथ भी इसे दिया जाता है। होमियोपैथी चिकित्सा में ट्रांम्बिडियम का प्रयोग आमतौर पर पर किया जाता है।

आयुर्वेद विशेषज्ञ धर्मवीर भारती जी की ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ में ‘बीरबबहूटी’ नामक कीट का जिक्र है। इंग्लैंड और ब्रिटेन जैसे देशों में अत्याधिक कामवासना शक्ति यानी सैक्स पावर बढाने के लिए पुरुषों के लिए “बी हार्सटेक” और महिलाओं के लिए “सी हार्सटेक” नामक टैबलेट तैयार किया जा रहा था? जो भारत सहित अनेक देशों में प्रतिबंधित है? कुछ भी हो वर्तमान परिवेश मे कृषि फसलों मे यूरिया सल्फेड खाध और कीटनाशक छिड़काव की वजह से बहुमूल्य और रामबाण जौविक औषधीय लाल रेशमी बीरबहूटी नष्ट विनष्ट और विलुप्त होती जा रही है?

इस प्रतिनिधि के सर्वेक्षण के मुताबिक वर्तमान परिवेश में यह दुर्लभ जैविक औषधीय बीरबहूटी झारखंड,नेपाल, असम और उत्तरांचल के विहंगम जंगल, पर्वतमालाओं, पहाड़ों की खाईयों-झीलों और नदी तटवर्ती गीली जगहों मे उपलब्ध हो सकती है?

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